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खबरें सुर्खियों में है कि अयोध्या में राजस्थान से पत्थरों की खेप नए शिविर में पहुंच गई है। फिलहाल इस पर मंदिर निर्माण समिति की ओर से कहा गया कि पिछली बार शिलादान हुआ था..
Author नई दिल्ली | December 24, 2015 02:34 am
विहिप के मीडिया प्रभारी शरद शर्मा ने बताया कि 2007 के बाद पत्थरों की आमद फिर शुरू की गई है, एक ट्रक में 15 टन पत्थर तीन बडे टुकड़ों में लाए गए हैं। (Express Photo by: Vishal Srivastav)

खबरें सुर्खियों में है कि अयोध्या में राजस्थान से पत्थरों की खेप नए शिविर में पहुंच गई है। फिलहाल इस पर मंदिर निर्माण समिति की ओर से कहा गया कि पिछली बार शिलादान हुआ था, नया शिला पूजन का काम पुराने का ही अंग है। अब इन पत्थरों के शिला पूजन के नाम पर जो कार्यक्रम हो रहा है, मीडिया में उसी का उद्देश्य अयोध्या में मंदिर निर्माण कार्य प्रचारित किया गया। यह दूसरा मौका है जो मंदिर निर्माण की जमीन को पुख्ता कर रहा है। अब सवाल है कि अगर अयोध्या में पत्थरों की खेप पहुंची है और कारसेवकपुरम के नजदीक बने नए शिविर रामसेवकपुरम में कुछ गतिविधियां चल रही हैं तो उसके क्या निहितार्थ हैं!

सच यह है कि जिस तरह कारसेवकपुरम में कोई भीड़ नहीं दिख रही है, अयोध्या में गंगासागर से लौटी भीड़ भी दो दिन वाली है और उसे भी जाने की जल्दी है, उसमें पत्थरों की खेप पहुंचने की खबर ‘तिल का ताड़’ ही लग रही है। हालांकि इस स्थल पर कानून-व्यवस्था के मद्देनजर प्रशासन की ओर से एहतियात बरती जा रही है। प्रशासन को गुप्त सूचना देने के लिए खुफिया अधिकारी तैनात किए गए हैं और स्थानीय अधिकारियों का दौरा होता रहता है, जिससे वास्तविक स्थिति को जाना जा सके।

अयोध्या में राममंदिर और बाबरी मस्जिद के संबंध में लखनऊ उच्च न्यायालय के सामने प्रश्नगत विवादित भूमि नौ हजार छह सौ अस्सी वर्गफुट है। इसमें भीतरी और बाहरी आंगन भी शामिल है। निर्णय के मुताबिक इसे तीन भागों में बांट दिया गया है, यानी हर पक्ष को तीन हजार दो सौ सत्ताईस वर्गफुट भूमि मिलनी है। जबकि नए मंदिर के लिए विहिप के नक्शे के अनुरूप तीन गुना ज्यादा जमीन चाहिए। फिलहाल यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। अभी इसकी सुनवाई की कोई तारीख न निर्धारित है, न प्रस्तावित। जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के पहले किसी भी पक्ष द्वारा इस स्थल पर किसी प्रकार के निर्माण की संभावना नहीं है। वहां अचानक भीड़ जमा करके कुछ करने की कोशिश भी आसान नहीं है, क्योंकि विवादित स्थल को गिराया तो कुछ घंटों में जा सकता है, लेकिन निर्माण में लंबा वक्त लगेगा।

अब सवाल उठता है कि मंदिर निर्माण का प्रचार, उसकी घोषणा और चल रहे अभियान के वास्तविक निहितार्थ क्या हैं? ऐसी जानकारी भी मिली कि अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए पत्थरों की कटाई-छंटाई वाली जगह पर कुल चार या छह कारीगर हैं। जाहिर है, इस सबसे किसी बड़ी गतिविधि या जल्दबाजी का संकेत नहीं मिलता। इसके बावजूद यह मानना पड़ेगा कि इस दिशा में चुपचाप शायद कुछ कोशिशें चल रही हैं। इसके पीछे की राजनीति क्या है और नए संदर्भों में सरकार पर इसका क्या दबाव है, यह सामने आने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। लेकिन अयोध्या मुद्दे पर ताजा गहमागहमी से क्या किसी राजनीतिक लाभ की संभावना है? अगर हां, तो यह लाभ किसे मिलेगा? ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के साथ चलती सरकार के सामने किस तरह की चुनौतियां खड़ी होंगी?

उत्तर प्रदेश में इस समय समाजवादी पार्टी की सरकार है। इसके पहले पांच वर्षों के दौरान बहुजन समाज पार्टी सत्ता में थी। 1990 में विश्व हिंदू परिषद के आंदोलन के दौरान गोली चलने और इसमें मरने वालों की संख्या को बढ़ा-चढ़ा कर बताने के कारण उसका लाभ भाजपा को मिला था। लेकिन जब छह दिसंबर 1992 को विवादित स्थल गिराया गया, उसके बाद कम से कम मंदिर मुद्दे पर भाजपा का समर्थन बढ़ने के बजाय घटा ही है। पिछले दस सालों में तो वह राज्य में तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है। अब अगर 2017 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के लिए इस मुद्दे को तूल दिया जा रहा है तो इसके प्रभाव और लाभ-हानि की संभावनाओं का आकलन करना पड़ेगा। खासतौर पर ऐसी स्थिति में जब लोकसभा चुनावों में भाजपा की जबर्दस्त जीत के बावजूद विधानसभा चुनाव के बारे में यह माना जा रहा है कि मुख्य लड़ाई सपा और बसपा के बीच ही होगी। अब सवाल उठता है कि भाजपा अपनी रणनीति में परिवर्तन करके मंदिर मुद्दे को फिर अपनी लड़ाई में शामिल करे तो क्या उसे कुछ लाभ मिलेगा? क्या एक घटते प्रभाव वाले मुद्दे को भाजपा जिंदा करने में समर्थ होगी, जिससे जनता एक राजनीतिक मुद्दा मान कर एक तरह से अलग हो चुकी है?

जहां तक संवाद माध्यमों का संबंध है, उसमें कहीं यह मुद्दा किसी दैनिक में सबसे ज्यादा महत्त्व की खबर है तो कहीं टीवी चैनलों में इसे एक बड़े अभियान के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत पर गौर करने के बाद ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ भी नहीं दिख रही है।

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