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दुनिया मेरे आगेः स्मृति में अयोध्या

विवादित स्थल करीब दो सौ गुणे डेढ़ सौ गज का एक परिसर था, जिसमें एक प्रवेश द्वार, तीन गुंबद तथा एक निकास द्वार था। परिसर ऊंची चारदीवारी से घिरा था तथा अंदर से बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता था।

छह दिसंबर को सुबह तड़के से ही विवादित स्थल के अंदर तैनात सीआरपीएफ अपनी ड्यूटी पर चाक-चौबंद थी।

राजेंद्र कुमार स्वामी

सेवा निवृत्ति के लगभग बीस वर्ष बाद आज अयोध्या के विवादित ढांचे को गिराए जाने का मंजर एक बार फिर आंखों के सामने तैर उठा। विवादित ढांचे के विध्वंस को लेकर दायर मुकदमों पर अदालत का निर्णय आखिरकार आ ही गया। एकाएक अट्ठाईस साल पहले के छह दिसंबर का वह दिन मानस पटल पर घूम गया। उस वक्त मैं रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवादित ढांचे के भीतर उसकी सुरक्षा के लिए अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा था। शायद ऐसे बहुत-से लोग होंगे, जिन्होंने राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवादित ढांचे को काफी करीब से देखा होगा, पर मैं उन गिने-चुने लोगों में से हूं, जो छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचे के अंदर मौजूद थे।

उस दिन भी वातावरण इतना ही राममय था, जितना इन दिनों है। अंतर केवल इतना है कि वह विध्वंस का दिन था और आज नवनिर्माण के उत्साह का दिन है। अक्तूबर, 1992 में विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा भारतीय जनता पार्टी ने अयोध्या में रामजन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवादित परिसर में सांकेतिक कारसेवा का राष्ट्रव्यापी आह्वान किया था। उसे लेकर समाज के एक हिस्से में विरोध का स्वर उभरने लगा था, तो राज्य और केंद्र सरकार में हड़कंप मच गई थी।

विवादित ढांचे की सुरक्षा के लिए राम मंदिर परिसर के भीतर सेंट्रल रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ और बाहरी घेरे में यूपी पुलिस तथा पीएसी तैनात की गई थी। अक्टूबर, 1992 से मैं उस विवादित ढांचे की सुरक्षा में तैनात सीआरपीएफ की टुकड़ी का नेतृत्व कर रहा था। वहां हो सकने वाली तमाम घटनाओं की सभी संभावनाओं और आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए प्रशासन, शासन तथा केंद्र सरकार ने अपनी ओर से किसी भी प्रकार की अनहोनी से निपटने की बढ़-चढ़ कर तैयारी की थी। सभी आंदोलनकारी नेता भरोसा दिला रहे थे कि वह आंदोलन महज सांकेतिक है और वे किसी भी तरह का कोई अनुचित काम नहीं करेंगे। उनके आश्वासनों से लगने लगा था कि अब सब कुछ शांति से गुजर जाएगा। हालांकि वैसा हुआ नहीं। वहां वह सब हो गया, जिसकी कल्पना आंदोलनकारी नेताओं ने भी न की थी।

विवादित स्थल करीब दो सौ गुणे डेढ़ सौ गज का एक परिसर था, जिसमें एक प्रवेश द्वार, तीन गुंबद तथा एक निकास द्वार था। परिसर ऊंची चारदीवारी से घिरा था तथा अंदर से बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता था।

छह दिसंबर को सुबह तड़के से ही विवादित स्थल के अंदर तैनात सीआरपीएफ अपनी ड्यूटी पर चाक-चौबंद थी। चारदीवारी के बाहर लगभग बीस फीट की दूरी पर प्रस्तावित सांकेतिक कारसेवा स्थल था। पूरे परिसर में खूब गहमागहमी थी। सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ का जायजा लेने के लिए मैं मुख्य द्वार से बाहर आया तो देखा कि पूरा परिसर कारसेवकों से पटा पड़ा था। मानस भवन, रामकथा कुंज, लक्ष्मण मंदिर, जहां तक भी दृष्टि जाती थी, कारसेवकों और श्रद्धालुओं के अलावा और कुछ भी नजर नहीं आता था।

श्रद्धा, भक्ति, संकल्प और विश्वास का ऐसा जनसमुद्र मैंने पहले कभी नहीं देखा था। रामभक्ति से ओतप्रोत भजनों और नारों से आकाश गुंजायमान हो रहा था। पूरा वातावरण जैसे राममय हो गया था। वहां एकत्र हुए सबकी आंखों में बस एक ही विश्वास झलकता था कि अब राम का जर्जर मंदिर टूटेगा और वहां नया भव्य मंदिर बनेगा।

छह दिसंबर को सुबह करीब ग्यारह बजे तक सब कुछ सामान्य था। उसके बाद जो हुआ, वह पूरा देश जानता है। लाखों रामभक्तों और कारसेवकों की संकल्पित, श्रद्धा तथा भक्ति की भावना से ओतप्रोत वह भीड़ जब अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए आगे बढ़ी, तो सुरक्षा के सारे प्रबंध तिनकों की तरह उड़ गए। उस भीड़ पर काबू कर पाना सुरक्षाबलों के वश की बात नहीं रह गई थी। आज भी वह नजारा मेरी आंखों में सजीव हो उठता है। मैंने देखा कि सुरक्षा के लिए लगाई हुई कांटेदार तारों को रामभक्त अपने नंगे हाथों से खींच कर उखाड़ रहे थे। उनके हाथों से रक्त और मांस छिटक कर गिर रहा था, पर उनके मुंह से उफ तक नहीं निकल रही थी। ऐसी दृढ़ निश्चयी, आत्मबलिदानी और भक्ति भावना से ओतप्रोत भीड़ को बल प्रयोग करके उसके लक्ष्य से विमुख नहीं किया जा सकता था, ऐसा मेरा मानना है। उस दृढ़ निश्चयी, अनुशासित, बलिदानी भीड़ ने मात्र कुछ घंटों में विवादित ढांचे को भूमिसात कर दिया।

विवादित स्थल से जुड़े मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद करीब महीना भर पहले हुए भूमि पूजन कार्यक्रम के बाद बड़ी सुखद अनुभूति हुई कि पांच सदियों के संघर्ष तथा प्रतीक्षा के बाद देश के करोड़ों रामभक्तों को अपने आराध्य का मंदिर पुन: प्राप्त होगा। अब तो अदालत ने विवादित ढांचे को गिराए जाने के संबंध में दायर मुकदमों का भी निपटारा कर दिया है।

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