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दुनिया मेरे आगेः शरद के शौक

शारदीय ऋतु में जितने उत्सव होते हैं, उतने पूरे साल में नहीं होते। शरद जिजीविषा, संघर्ष और हमारे सामूहिक हर्ष और कल्लोल का प्रतीक है।

सबसे पहले शरद के आने का ऐलान करती है हवा में सरकती बदलते मौसम की खुशबू।

चैतन्य नागर

शरद के कदमों की आहट सुनाई दे रही है? थोड़ा गौर कीजिए, हवा में आर्द्रता कम हुई है। तड़के उठें तो हवा में बदलते मौसम का एक कोमल, सौम्य स्पर्श महसूस होता है। देर रात की हवा भी बदल रही है। पहले की तुलना में सुकून देने वाली और सुखदायी है! बाहर जब शरद आता है, तो भीतर का मौसम भी अपने आप ही करवट लेने लगता है। उमस से उचाट मन में उल्लास की मीठी तरंगें उठनी शुरू होती हैं। गर्मी अब अपनी जलती हुई ढेरों वेदनाओं के साथ शरद के आलिंगन में बस ढह जाने के लिए आतुर है। आकाश में बारिश के और मन में मायूसी के उद्दंड, अनुशासनहीन बादल कम होने लगे हैं; उम्मीद के सूरज की रोशनी झांक रही है। मौसम के साथ समूची कुदरत भी खिल रही है। नई-टटकी सुरभियां मन को सहला रही हैं। मधुमालती के बचे हुए फूल जाते-जाते भी हंसी का पैगाम दे रहे हैं। शरद वर्ष की पहली, सबसे प्यारी मुस्कान है। इंसान की दुनिया में इन दिनों भले ही डर और संदेह की गंध हो, फिर भी कुदरत अपनी खास अदाओं से लगातार सकारात्मक इशारे करती रहती है, भले ही अपनी बेहोशी में हम उन्हें अनदेखा, अनसुना करते रहें।

आसमान में इन दिनों रंगों का अपना अनूठा खेल चल रहा है। बारिश के बादल एक लंबी पारी खेल कर अब वापस जा रहे हैं, विश्राम के लिए या फिर धरा के उन कोनों को भिगोने के लिए जहां अब उनकी व्याकुलता से प्रतीक्षा की जा रही है। सूफी रहस्यवादी जलालुद्दीन मोहम्मद रूमी कहते थे कि आसमान को आंखों से नहीं, हृदय से देखा जाता है। उन्होंने जरूर शरद के आकाश को देख कर ही यह कहा होगा। जब बादल छितरा जाते हैं, तो पीछे छिपा आकाश सामने आ जाता है। मन कितना भी उदास हो, खुले आकाश को देखते ही खिल उठता है। धरती और आकाश के बीच एक गोपनीय समझौता होता है सूने मानव मन को आह्लादित करने ले लिए। सितंबर के महीने में शरद से ठीक पहले का आकाश अद्भुत होता है। अनगिनत रंग, छितराए हुए बादलों पर यहां-वहां से पड़ती रोशनी, आकाश का विराट खालीपन, उसकी स्वच्छता, सब कुछ मन को अज्ञात के प्रति अव्यक्त कृतज्ञता से भर देता है। दूर और पहुंच के बाहर होते हुए भी यह आकाश कितना अपना लगता है! त्रिलोचन ने इसे देख कर ही कहा होगा- ‘शरद का यह नीला आकाश, हुआ सब का अपना आकाश।’

शरद का आकाश ध्यानी ऋषि के मन की तरह होता है। बादल सुलझे हुए विचारों की तरह बस कहीं-कहीं, कभी-कभी दिखते हैं। बाकी समूचा आसमान बुद्ध और महाकाश्यप के संवाद की तरह मौन में डूबा प्रतीत होता है। आसमान में बस उतने ही बादल दिखते हैं, जितने मन में विचार होने चाहिए। बस उतने ही, जितने आवश्यक हैं। न आपस में टकराते हैं, न कोई कलह होता है उनके बीच। प्रकृति ने मन की हर सूक्ष्म अवस्था के लिए एक स्थूल वाह्य नमूना हमारे सामने पहले से ही रखा हुआ है। हमें बस उसे देखना है, उससे सीखना है और अपने अंतस में उतार लेना है।

सबसे पहले शरद के आने का ऐलान करती है हवा में सरकती बदलते मौसम की खुशबू। धरती का खिलना शुरू होता है और हमारे समाज की विषाक्तता के बीच भी धरती अपना शृंगार नहीं तजती। आपने गौर किया कि सप्तपर्णी इस साल समय से थोड़ा पहले ही खिल रही है? अपनी मादक सुगंध से उन राहगीरों को पुकारती है, जिनके पास थोड़ा ठहरने और इसे निहारने की फुर्सत है। सात पत्तों के बीच फूलों के गुच्छे शरद के स्वागत में अर्पित सप्तपर्णी का उपहार और नैवेद्य हैं। शरद यानी हरसिंगार, कमल और कुमुदिनी के खिलने का मौसम भी। वसंत से जो संबंध बेला का है, हरसिंगार के साथ वही शरद का है। शरद यानी नवजीवन, गरिमा, वैभव, उल्लास, फूलों और त्योहारों का मौसम।
शारदीय ऋतु में जितने उत्सव होते हैं, उतने पूरे साल में नहीं होते। शरद जिजीविषा, संघर्ष और हमारे सामूहिक हर्ष और कल्लोल का प्रतीक है। उमस भरे दिनों से जब मन बाहर निकलता है तो त्योहारों की एक शृंखला उसकी प्रतीक्षा में होती है। इस साल माहौल में शंकाएं है, भय है, पर त्योहार का उल्लास तो मन के भीतर ही मनता है।

पुराने को छोड़ कर नूतन की ओर निहारने का मौसम है शरद। मैदानी इलाकों में, शहर के बाहर इन दिनों कास के सफेद फूल दिखाई पड़ते हैं। धरा ने आसन्न शीत के लिए तैयारी करने के लिए प्रयोग के तौर पर सफेद चादर ओढ़ ली हो जैसे। कास के फूल जब हवा से झूमते हैं, तो मन भी झूमता है उनके संग। शरद पूर्णिमा का चांद अपने सौंदर्य के लिए कला और साहित्य जगत में ‘कुख्यात’ है! उसे देखकर तो समय ही थम जाता है। कथाओं में बताते हैं इसमें सभी सोलह कलाएं होती हैं। कथाओं के अनुसार यह कृष्ण और गोपियों की रास का समय होता है। निराला इस समय गगन से चुंबन झरते देखते हैं। क्या कहने शरद के सौंदर्य के! अल्बेयर कामू ने कहा था- ‘शरद तो एक और वसंत है, जब हर पत्ती फूल होती है।’

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