नीलामी का चलन

सभी क्षेत्रों में नीलामी में बोली लगाने का चलन आम है।

सांकेतिक फोटो।

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

सभी क्षेत्रों में नीलामी में बोली लगाने का चलन आम है। फिर वह बाजार हो या फर्म या फिर खेल। मार्केटिंग के इस दौर में सभी जगह बोली लगाई जा रही है और सबसे अधिक बोली लगाने वालों की जीत हो रही है। हर जगह थोक की मंडी होती है और खेरची की भी। फल, सब्जी, अनाज, गुड़, तेल यहां तक कि गाय, भैंस, बकरी और घोड़ों की भी अपनी मंडी होती है, जहां उनकी बोली लगाई जाती है। सबसे अधिक बोली लगाने वाला जीतता है। घर, संपत्ति ही नहीं, सार्वजनिक संपत्ति भी नीलामी के आधार पर बेची जाती है। सरकार भी अपनी संपत्ति या अन्य सामग्री जैसे उपकरण, खदान फिर वह कोयले की हो, हीरे या अन्य कीमती पदार्थ की, नीलामी करके ही बेचती है।

यहां तक कि हवाई कंपनियां, रेल और अन्य संस्थानों को भी नीलामी के आधार पर इकरारनामा करके निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। साफ-सफाई, सड़क निर्माण या होटल और पर्यटन को भी ठेके के आधार पर नीलाम किया जाता है। नीलामी की प्रक्रिया को तर्कसंगत, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक माना जाता है। घोड़ों की नीलामी हमेशा से चर्चित रही है, घोड़ों की रेस में भी बढ़-चढ़ कर बोली लगाई जाती रही है। न्यूनतम आधार मूल्य तय कर लिया जाता है और खरीदारों को उससे अधिक मूल्य के लिए प्रतिस्पर्धा करनी होती है। शासन, निगम या संस्थान जब कुछ बेचना होता है तो अधिकतम मूल्य पर बेचता है और जब कोई काम करवाना हो या कुछ खरीदना हो तो सबसे कम मूल्य देने वाले को काम देता है। सारा काम निविदा प्रक्रिया के अंतर्गत किया जाता है, पर इसमें भी कम या ज्यादा कीमत का ध्यान रखा ही जाता है।

मंदिरों में हर विधि की बोली लगती है। आरती हो या कलश या आरती के बाद प्रसाद वितरण या कोई अन्य प्रक्रिया। जैन मंदिरों में तो सभी धार्मिक कार्य बोली लगा कर ही किए जाते हैं। यहां तक कि मूर्तियों की विभिन्न धर्म सम्मत प्रक्रियाओं में भी बोली लगाकर क्रिया संपन्न कराई जाती है। अधिक बोली के लिए जुलूस का लालच दिया जाता है। मशहूर लोगों द्वारा उपयोग में लाई गई चीजों और चित्रकारों द्वारा बनाए चित्रों- यहां तक कि उनके हस्ताक्षरों और पत्रों की भी नीलामी होती है और उनकी अच्छी कीमत आती है। कार, छड़ी, घड़ी, फर्नीचर ऊंचे दामों में बिकते हैैं। कई संग्रहालय हैं, जो इन्हें खरीद कर हिफाजत से रखते हैं और बड़ी संख्या में लोग पैसे देकर इन्हें देखने आते हैं।

मुझे याद है कि हिटलर के पाइप और चर्चिल के चुरूट की भी नीलामी हुई थी और कद्रदानों ने उन्हें ऊंची कीमत देकर खरीदा था। इसी तरह पुराने डाक-टिकट और सिक्के अच्छी कीमत पर बिकते हैं। अमेरिका और आस्ट्रेलिया में खिलाड़ियों के खेल उपकरण भी नीलाम होते हैं। मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसेन अपने चित्रों की नुमाइश विभिन्न आर्ट गैलरियों, होटलों और क्लबों में लगाते थे और उन्रे चित्र ऊंची कीमत पर बिकते थी। इसे आप नीलामी भले न कहें, पर मार्केटिंग तो मानेंगे ही। कला की अच्छी कीमत आना भी बड़ी बात है। कद्रदान ही तो कला को प्रोत्साहित करते हैं।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड द्वारा संचालित आइपीएल का तो पूरा क्रिकेट ही नीलामी के आधार पर होता है। भव्य और पांच सितारा होटलों में शुद्ध व्यावसायिक तरीके से बढ़-चढ़ कर खिलाड़ियों की बोली लगती है। इस प्रक्रिया का टेलीविजन चैनल पर सीधा प्रसारण होता है, जो किसी न किसी कंपनी द्वारा प्रायोजित होता है। नीलामी प्रक्रिया में मेंटर के रूप में विश्व के विख्यात खिलाड़ी, टीमों के मालिक, वीडियो एनालिस्ट और सीनियर खिलाड़ी शरीक होते हैं। आप यही देखिए कि नीलामी के पहले ही कुछ प्रमुख खिलाड़ियों को मोटी रकम देकर अनुबंधित कर लिया जाता है। विराट कोहली और एबी डिविलयर्स का ही उदाहरण लीजिए, जिन्हें रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरु ने कुल अट्ठाईस करोड़ में अपने साथ रखा है।

कोहली को सत्रह और डिविलयर्स को ग्यारह करोड़ रुपए दिए हैं। सारा मामला बाजार, लोकप्रियता और दर्शकों की पसंद पर आधारित रहता है। इसका खेल स्तर, गुुणवत्ता और उपलब्धि से कोई संबंध नहीं है। बुरा तब लगता है कि जब अच्छे खिलाड़ियों को आधार मूल्य पर भी कोई नहीं खरीदता और घोषणा की जाती है कि फलां फलां खिलाड़ी बिना बिके रह गया। घोड़ों, जानवरों, अनाज, फल, इमारतें और चल-अचल संपत्ति की नीलामी तो समझ में आती है। पर क्रिकेट को तमाशा और मार्केटिंग का हथियार बनाने की धुन में खिलाड़ियों को भी खिलौना बना दिया है। इंसानों की नीलामी खलती है। खिलाड़ी गाजर, मूली या खिलौना तो नहीं हैं। लगता है कि आधुनिक जीवन पूरी तरह नीलामी की गिरफ्त में है। धर्म, खेल, मंडी, संपत्ति, संसाधन, सरकारी उपकरण और संस्थान सभी नीलामी के जरिए बेचे जा रहे हैं। जिंदगी ही नीलामी की गिरफ्त में है।

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