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‘दुनिया मेरे आगे’ में अरविंद दास का लेख : हवेली में भित्तिचित्र

वर्षों पहले समाजशास्त्र के एक शिक्षक ने मारवाड़ी बनिया समुदाय के भारतीय पूंजीवाद में योगदान और उनके रीति-रिवाजों, रहन-सहन, धर्म से उनके जुड़ाव और रिश्तों की बात की थी।

Author नई दिल्ली | August 24, 2016 6:19 AM
इन हवेलियों में प्रवेश करने पर ऐसा लगता है जैसे कि यह कोई कला-दीर्घा हो।

जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर की एक प्रसिद्ध किताब है- ‘प्रोटेस्टेंट इथिक एंड राइज आॅफ कैपिटलिज्म’। इस किताब में वे लिखते हैं कि किस तरह प्रोटेस्टेंट संबंधी धार्मिक मान्यताओं से यूरोप में पूंजीवाद के प्रचार-प्रसार को बल मिला। इसमें वे ईसाई धर्म की इस शाखा की उन विशेषताओं को रेखांकित करते हैं जो आधुनिक पूंजीवादी विचारधारा की प्रेरक हैं। वर्षों पहले समाजशास्त्र के एक शिक्षक ने मारवाड़ी बनिया समुदाय के भारतीय पूंजीवाद में योगदान और उनके रीति-रिवाजों, रहन-सहन, धर्म से उनके जुड़ाव और रिश्तों की बात की थी। पता नहीं, इस बारे में कोई अध्ययन किया गया है या नहीं। अमूमन भारत के अकादमिक जगत में कारोबारी घराने, महाराजाओं के बारे में एक तरह की उपेक्षा का भाव है, जिस वजह से इनके बारे में कम ही शोध उपलब्ध हैं।

राजस्थान के शेखावटी इलाके ने भारत में कारोबारियों के कई घराने दिए हैं। बिड़ला, मित्तल, बजाज, गोयनका, झुनझुनवाला, डालमिया, पोद्दार, चोखानी आदि की जड़ें इन्हीं इलाकों से जुड़ी हैं। आधुनिक भारत के निर्माण में इन कारोबारियों की भूमिका असंदिग्ध है। इन घरानों के कई कारोबारी आजादी के दौरान राष्ट्रीय आंदोलनों से भी जुड़े हुए थे। उन्नीसवीं सदी में अफीम, कपड़ों, मसालों के कारोबार से इन इलाकों के कारोबारियों ने अकूत धन अर्जित किया थी। इन धनिकों की हवेलियों को देखने पर उनकी संपत्ति, माल-असबाब की एक झलक मिलती है, हालांकि हवेलियों से कारोबारियों के कला-संस्कृति के प्रति रुझान, उनके दृष्टिकोण का भी पता चलता है।

सीकर से तीस-चालीस किलोमीटर दूर मंडावा और नवलगढ़ इलाकों में भारत के चर्चित इन कारोबारी घरानों की हवेलियां स्थित हैं। तकरीबन सौ साल पहले इनके बाशिंदे कारोबार की खोज में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और सुदूर देश चले गए, तब से ये हवेलियां वीरान पड़ी हैं। कई हवेलियों पर ताले जड़े हैं और कुछ रखवालों, चौकीदारों के भरोसे हैं। ऐसी ही एक हवेली में रह रहे एक चौकीदार ने मुझे बताया कि हवेली के मालिक-कारोबारी दो-चार साल में मांगलिक कार्यों के दौरान अपने कुल देवता के दर्शन के लिए आते हैं।

बहरहाल, इस समय जो चीज इन हवेलियों को विशिष्ट बनाती है, वह है इन पर बने भित्ति-चित्र। इन हवेलियों की दीवारों, मेहराबों, खंभों पर बने करीब सौ-डेढ़ सौ साल पुराने इन भित्ति-चित्रों की शैली और इनका सौंदर्य मनमोहक है। साथ ही राजस्थानी लोक कथाओं, पशु-पक्षी, मिथकों, धार्मिक रीति-रिवाजों, आधुनिक रेल, जहाज, मोटर, ईसा मसीह आदि के चित्रों का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक महत्त्व भी है। इन चित्रों से उस जमाने में लोगों के रहन-सहन, सामाजिक स्थिति, संस्कृतियों के मेल-जोल का भी पता चलता है। ‘अनाम कलाकारों’ के बनाए इन भित्ति-चित्रों में इस्तेमाल किए गए रंग प्राकृतिक हैं। मसलन, लाल के लिए सिंदूर, काले रंग के लिए काजल, नीले रंग के नील का प्रयोग किया गया है। हालांकि बाद के दिनों में इन चित्रों के संरक्षण के दौरान सिंथेटिक रंगों का प्रयोग किया जाने लगा। जिस तरह मिथिला पेंटिंग में मछली, वर्ली पेटिंग में मोर, पट चित्र में घोड़े का चित्रण कलाकार बार-बार करते हैं, उसी तरह शेखावटी के इन भित्ति-चित्रों में ऊंट का चित्रण खूब किया गया है।

इन हवेलियों में प्रवेश करने पर ऐसा लगता है जैसे कि यह कोई कला-दीर्घा हो। पर कुछ हवेलियों को छोड़ कर (मंडावा के किले, पोद्दार म्यूजियम, मोरारका म्यूजियम आदि) बाकी की हालत खस्ता है। कुछ हवेलियों में होटल खोल दिए गए हैं। उपेक्षा और वर्षों धूल, हवा, प्रदूषण और रख-रखाव के अभाव में चित्रों से रंग उड़ गए हैं तो कहीं भीत उखड़ रही है। चित्रकार भैरोंलाल स्वर्णकार पोद्दार म्यूजियम के पुनर्नवा अभियान में वर्षों से जुटे हुए हैं। वे बताते हैं कि इस हवेली के मालिक ने बीसवीं सदी की शुरुआत में इन दीवारों पर रेलगाड़ी का अंकन तब करवाया था, जब इस इलाके के लोग रेलगाड़ी से अपरिचित थे। कई भित्ति-चित्र ऐसे हैं जिन्हें देख कर समय और काल के साथ इन चित्रों के रिश्ते को देख कर अचंभा होता है। मुझे उन्होंने बताया कि इस म्यूजियम में अब तक करीब आठ सौ भित्ति-चित्रों का संरक्षण किया जा चुका है। करीब दो सौ हवेलियों में इन भित्ति-चित्रों का एक ऐसा संसार फैला है जो अनमोल है। पूरे देश में एक साथ हजारों भित्ति-चित्र शायद ही कहीं और बिखरे पड़े हों!

पिछले दिनों चर्चित फिल्म ‘पीके’ और ‘बजरंगी भाईजान’ की शूटिंग इन इलाकों में हुई, जिसके कारण एक बार फिर से ये इलाके चर्चा में आए हैं। साथ ही पिछले कुछ वर्षों में विदेशी सैलानियों के बीच यह इलाका तेजी से एक पर्यटक स्थल के रूप में उभरा है। धनकुबेरों को अपने इस पुराने ठौर से आज कोई खास मतलब नहीं दिखता है। आस-पड़ोस के लोगों और सरकार के लिए भी कला के इस खजाने का कोई मूल्य नहीं है और न ही शायद उन्हें इसके संरक्षण की कोई चिंता है।

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