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दुनिया मेरे आगे कॉलम में अरुणेंद्रनाथ वर्मा का लेख : संदेह के सांप

अचानक घबराई हुई पत्नी ने बताया कि बड़ी देर से हमारी कार के पीछे एक मोटरसाइकिल चली आ रही थी। उस पर दो युवा सवार थे। बाइक की हेडलाईट आॅफ करके वे बराबर हमारी कार से लगभग तीस गज पीछे चले आ रहे थे।
Author नई दिल्ली | June 13, 2016 00:27 am
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मेरे दो मित्रों के बीच जोरदार बहस छिड़ी हुई थी। एक दुखी था कि दिल्ली की मुसलिम बस्तियों को छोड़ कर अन्य कहीं किसी मुसलमान को इस महानगरी में किराए का मकान मिलना दुष्कर है। दूसरा जानना चाहता था कि ओखला और बाटला हाउस जैसी बस्तियों में क्या हिंदुओं के साथ यही समस्या नहीं है! मैं अपनी एक तीस साल पुरानी आपबीती सुनाने से स्वयं को रोक नहीं पाया। नोएडा में बसने के लिए जब सन 1986 में आया तो नोएडा को दिल्ली का एक उपनगर कहना उसका उपहास लगता था। आज के इस महानगर से तब देर रात दिल्ली आना-जाना भी एक साहस भरा काम था। बस एक अकेली सुनसान सड़क और निजामुद्दीन पुल इस उपनगर को दिल्ली से जोड़ते थे। पटपड़गंज मोड़ से नोएडा तक यह सड़क, जो अब रात-दिन वाहनों के शोर से गूंजती रहती है, उन दिनों खेतों से सैर के लिए निकले गीदड़ों के मनहूस रुदन से गूंजती थी। उस पर रात में अंधकार का राज होता था। नोएडा में सबसे पहले बनी और बसी कॉलोनियां फौजियों की थीं, जिनमें मैं भी एक था।

नोएडा में मनोरंजन के नाम पर दो सिनेमाघर थे- धर्मा पैलेस और अलका। हम सिनेमा देखने के लिए दूरस्थ दिल्ली तक भागते थे, लेकिन तब इंटरनेट बुकिंग थी नहीं और बिना अग्रिम बुकिंग के आमतौर पर टिकट नहीं मिलते थे। ऐसी ही परिस्थिति में उस शाम मैंने और मेरी पत्नी ने तय किया कि रात के शो का टिकट मिल रहा है, तो वही सही। देखे बिना वापस नहीं जाएंगे।

निर्णय तो बिना सोचे-समझे ले लिया, पर फिल्म के बाद रात साढ़े बारह बजे हमने अपनी फिएट कार में नोएडा की तरफ रुख किया तो सुनसान सड़कों से पत्नी को दहशत होने लगी। फौजी अफसर होने का दंभ मुझे उसकी परेशानी को उपहास में उड़ा देने के लिए मजबूर कर रहा था। लेकिन सच्चाई यह थी कि मुझे निजामुद्दीन पुल से नोएडा जाने वाली सड़क का ध्यान आने पर साकेत के उस सिनेमाघर के आसपास की सूनी सड़क भी गुलजार लग रही थी। इसके पहले मैं रात के नौ-दस बजे उस पर चल कर दिल्ली से लौटा था, तब भी काफी असहज था। अब आधी रात में पत्नी के साथ उस लंबी ड्राइव का खयाल मुझे भी बेचैन करने लगा। आश्रम के बाद से रिंग रोड भी अंधेरी रात में डूबी हुई मिली। परेशान पत्नी का मजाक उड़ा कर मैं खुद को फुसला रहा था।

अचानक घबराई हुई पत्नी ने बताया कि बड़ी देर से हमारी कार के पीछे एक मोटरसाइकिल चली आ रही थी। उस पर दो युवा सवार थे। बाइक की हेडलाईट आॅफ करके वे बराबर हमारी कार से लगभग तीस गज पीछे चले आ रहे थे। रिंग रोड पर जहां सड़क अंधेरी और बिल्कुल सूनी हो गई, वे हमारी कार के और नजदीक आ गए। जब रिंग रोड से निजामुद्दीन ब्रिज की तरफ मैंने कार मोड़ी तो वे भी पीछे-पीछे मुड़ गए। अब पत्नी को अपना शक सच में बदलता दिखा। मैं भी चिंतित हो गया। मोबाइल फोन तब थे नहीं, यात्रा जारी रखना ही अकेला विकल्प था। किसी तरह वे चार-पांच किलोमीटर पार हुए। हम जब पटपड़गंज मोड़ से नोएडा की तरफ मुड़े तो वे भी पीछे हो लिए। अब मैं भी घबरा गया। पत्नी की हालत खराब थी। उसने जिद पकड़ ली कि मैं कार वापस मोड़ वाले पेट्रोल पंप पर ले चलूं। वह बंद तो होगा, पर वहां चौकीदार जरूर होंगे।
पहली बार मैंने पत्नी की हां में हां मिलाई। कार पीछे मोड़ कर बंद पेट्रोल पंप पर ले गया तो देखा वे दोनों मोटरसाइकिल रोक कर सड़क के किनारे खड़े सिगरेट सुलगा रहे थे। हमारी ही प्रतीक्षा हो रही थी, यह साफ था। पेट्रोल पंप पर जब एक नहीं, दो-दो सशस्त्र चौकीदार दिखे तो मेरी घबराहट दूर हो गई। कड़क आवाज में चिल्ला कर मैंने बाइक वालों से दूर से ही पूछा- ‘मेरी गाड़ी का पीछा क्यों कर रहे हो?’

एक बोला- ‘अंकल, हम भी आपके साथ ही फिल्म देख कर निकले तो देखा कि हमारी बाइक की हेडलाइट खराब हो गई थी। आपकी कार नंबर देख कर अंदाजा हुआ कि आप भी नोएडा की ओर ही जाएंगे तो ढांढ़स बंधा कि आपके पीछे-पीछे चल कर हम भी घर पहुंच जाएंगे। अब आप पेट्रोल लेने लगे तो हम आपका ही इंतजार कर रहे हैं।’ मैंने सारी तोहमत पत्नी पर मढ़ते हुए कहा- ‘तुम, बेकार ही सब पर शक करती हो। खुद भी डरती हो, मुझे भी डराती हो।’
कहानी सुना कर मैंने अपने दोनों मित्रों की तरफ देखा। वे मेरी बात समझ कर मुस्करा रहे थे।

(अरुणेंद्रनाथ वर्मा)

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