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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में अरुण तिवारी का लेख : ईमान की इज्जत

आइटीओ से लक्ष्मीनगर की दूरी दो किलोमीटर से कम नहीं। कोई आॅटोवाला अधिक पैसे पाने के बाद इतनी दूरी से सिर्फ पैसा लौटाने आए, यह इस सदी का चलन नहीं है।

नई दिल्ली में बारिश के दौरान राजपथ से गुजरता एक ऑटोरिक्शा। (फाइल फोटो)

सब आॅटो वाले एक जैसे नहीं होते- उन दिनों ऐसी पट्टी लगाए बहुत-से आॅटो रिक्शा दिल्ली की सड़कों पर दिखाई देते थे। यह पट्टी उचित किराए की मांग करने वाले आॅटो-चालकों के आॅटो पर ‘न्यायभूमि’ नामक संगठन द्वारा चिपकाई जाती थी। यह बात है, जनवरी 2013 की। लेकिन उस आॅटो पर मुझे ऐसी कोई पट्टी नहीं दिखाई दी। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जब हल्की दाढ़ी वाला वह नौजवान आॅटो-चालक मुझे मिला तो, उसने आइटीओ की ओर चलने से इनकार कर दिया। चंद मिनटों बाद वही आॅटो-चालक हमें ढूंढ़ता हुआ आया। पूछने पर बताया कि जब हमने पूछा था, तब एक सवारी उसे जीबी रोड (दिल्ली में वेश्यावृति वाला इलाका) चलने को विवश कर रही थी, जबकि वह ऐसे इलाके में जाना पसंद नहीं करता। इसीलिए उसने हमें भी मना कर दिया था। खैर, उसने हमें आइटीओ के नजदीक रिंग रोड पर स्थित भारतीय लोक प्रशासन संस्थान के भीतर गेस्ट हाउस के प्रवेशद्वार पर उतार दिया। उसने मीटर देख कर बयासी रुपए बताए; जो कि निस्संदेह इतनी दूरी के लिए नाजायज थे। फिर भी जाने क्यों, मैंने बगैर किसी ना-नुकुर के दे दिए।

करीब दो घंटे बाद जब हम वापस गेस्ट हाउस के रिसेप्शन काउंटर पर आए, तो हमने उसे गेट के बाहर सीढ़ियों पर प्रतीक्षा करते हुए पाया। हमें देखते ही वह जैसे उछल पड़ा। उसकी मुद्रा ऐसी थी, जैसे उससे कोई बहुत बड़ा अपराध हो गया हो। उसने झट से चालीस रुपए मेरे हाथ में थमाए और बोला- ‘‘बाबूजी, बहुत बड़ी गलती हो गई मुझसे। मेरा मीटर फास्ट था, मैंने गौर नहीं किया। वह तो जब मैं लक्ष्मीनगर पहुंचा और मीटर देखा, तो मुझे अहसास हुआ।’’

आइटीओ से लक्ष्मीनगर की दूरी दो किलोमीटर से कम नहीं। कोई आॅटोवाला अधिक पैसे पाने के बाद इतनी दूरी से सिर्फ पैसा लौटाने आए, यह इस सदी का चलन नहीं है। उसके ऊंचे चरित्र को देख खुशी से मेरी आंखें भर आर्इं। मैंने उसे गले से लगा लिया। मेरे भीतर छिप कर बैठे झूठे बड़प्पन-बोध ने जोर मारा। मैंने वे पैसे बतौर ईनाम लौटाने की जिद की। उसने कहा- ‘‘बाबूजी, ये पैसे मेरे हक के नहीं हैं। इन्हें मैं नहीं ले सकता और अपने मेहनताने में मैने कोई कमी छोड़ी नहीं है। वह मैंने ले लिया है।’’ मैंने रास्ते में हुई बातचीत के दौरान यह तो पहले ही जान लिया था कि वह नौजवान उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर का रहने वाला है। मैंने सोचा, इसका नाम पूछ लूं और फोन के कैमरे से एक फोटो ही ले लूं। लिखना-पढ़ना मेरा काम है। इसके बारे में भी लिखूंगा। सच मानिए दोस्तो, अपना आॅटो लेकर वह ऐसे भागा, जैसे हमसे कभी मिलना ही न चाहता हो। मैं सिर्फ जाते आॅटो का नंबर नोट कर पाया। ऊंचे चरित्र की न कोई जाति होती है न धर्म न वर्ग। उसकी पहचान न तो कपड़ों से की जा सकती है और न ही ऊंचे पद या कारोबार से। सदात्मा तो अपने कर्मों से पहचानी जाती है।

बचपन में बाबा भारती की कहानी पढ़ी थी, जिसमें डाकू खडगसिंह ने एक दुखियारे का भेष बना कर धोखे से बाबा का प्रिय घोड़ा छीन लिया था। बाबा चाहते थे कि वह इस घटना का जिक्र से किसी से न करे। उन्हें डर था कि पता लगने पर लोग दुखियों और गरीबों पर विश्वास करना छोड़ देंगे। रेलवे स्टेशन और अंतर-राज्यीय बस अड्डों पर सौ रुपए के रास्ते का ढाई सौ रुपया मांगने आॅटो चालकों ने दिल्ली के आॅटोवालों की जो छवि बनाई है, उससे लोगों ने दिल्ली के आॅटो चालकों और उनके आॅटो पर लगे मीटर, दोनों पर भरोसा करना छोड़ दिया है। न तो ‘अतिथि देवो भव:’ का विज्ञापन और न ही किसी संगठन का प्रयास उनकी इस छवि को बदल सका है। इस बार मेरे साथ घटी इस घटना का जिक्र करने के पीछे लोगों को यह विश्वास दिलाना है कि दिल्ली के सब आॅटोवाले बेईमान नहीं हैं। कुछ हैं, जिन्हें ईमान प्रिय है। आइये, इनके ईमान का सम्मान करें। मुंबई में ऐसे कई आॅटो चालकों को पुरस्कृत किया गया है।

फैलता वही है जो कि प्रचारित होता है। क्या यह सच नहीं है कि जब से चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं में अपराध, भ्रष्टाचार और अन्य अनैतिक घटनाओं की खबरों को ज्यादा जगह दी जाने लगी है, तब से अपराध बढे़ हैं; कम नहीं हुए। सद् आचार-व्यवहार और सकारात्मक लेखों को जितना प्रचारित किया जाएगा, सकारात्मकता उतनी बढेÞगी। लोग, सदाचार से खुशहाली का जीवन जीने और सम्मान पाने वाले व्यक्तियों के बारे में जितना जानेंगे, यह मिथक उतना ही टूटेगा कि भ्रष्ट हुए बगैर धन और खुशहाली संभव नहीं है। लगन और ईमानदारी के बल पर कठिन लक्ष्य को हासिल करने की सफल-सच्ची कहानियां जितना अधिक प्रचारित-प्रसारित होंगी; ‘कुछ नहीं हो सकता’ की जगह ‘मुमकिन है’ की धारणा उतनी ही बलवती होती जाएगी।

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