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अमूर्तन की रचना

कला की अभिव्यक्ति और उसे देखने की लगन मनुष्य की प्रारंभिक समझ और सोच से जुड़ी एक सहज प्रक्रिया है।

चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

यह समय की देन है कि चित्रकला का मूर्त स्वरूप कालांतर से अमूर्तता की ओर बढ़ा और इसी अमूर्तन में नए युग के भावबोध समाहित भी हुए। चित्रकला के व्याकरण में चित्रकार की कल्पना और रचना प्रक्रिया के योगदान से इनकार नहीं किया जा सकता। आड़ी-तिरछी रेखाएं हों या कोई यथार्थवादी या फिर परंपरावादी चित्र, कल्पना के सहारे के बिना चित्रकार के रंग और उसके आकार रचना प्रक्रिया को जन्म नहीं दे सकते। इस संपुष्ट आधार के लिए दोनों की उपस्थिति एक सशक्त और सार्थक चित्र निर्माण की जरूरत बनी रही है। कल्पनाएं भले परिवेश और उसके जीने के माहौल से प्रभावित रहती हों, लेकिन होती असीम हैं।

सोचना मनुष्य की एक सतत प्रक्रिया का अंग होता है, लेकिन चित्रकार का चीजों में झांकना एक पृथक परिकल्पना है, जो समयांतर से एक चित्र रचना के लिए महत्त्वपूर्ण होता है। अमूर्त चित्रों की रचना प्रक्रिया में भी इस कल्पना शक्ति के चमत्कार से इनकार नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि एक चित्र सीधे बोल जाता है और दूसरा चित्र प्रभाव नहीं जमा पाता। यह कल्पना चित्रकार की आकार-स्वरूपों और अमूर्तता तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह जब रंगों के जाले बुनता है, तब भी अपना काम करती है।

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समकालीन कला आंदोलन के परिदृश्य में उसका क्रमिक विकास दिखाई देता है। आकार धीरे-धीरे निराकर की ओर बढ़े और प्रतीक रूप में कला में सामयिक चेतना का अहसास, सुख-दुख और मानव मन के दूसरे भाव रखने-समेटने की प्रक्रिया जनमी। यों तो कल्पना चित्रफलकों में भाव-सौंदर्य की जननी रही है, लेकिन वह सामयिक जीवन संघर्षों से अछूती भी नहीं रहती। मनुष्य का स्वभाव है कि वह जीवनगत जटिलताओं को देखने के बाद उन पर मनन करता है। यह मनन विचार या रेखाओं के सहारे ही आकार लेते हैं। ये आकार अब भले ऊपरूप संरचनाओं का आलंबन बन जाएं या फिर यथार्थवादी चित्रशैली का जीवंत रंग बोध।

निश्चित ही चेतनाजन्य और अनुभूतिजन्य परिवेश का चित्रण चित्रकारों की रंगयात्रा का मूल आधार है। बिना कल्पना और रचना प्रक्रिया के किसी ठोस परिणाम के लिए आतुर चित्र की सोचना भी मुश्किल है। कैनवास पर रंग बिखेर कर अमूर्तन की तलाश दरअसल हमारी मानसिक विफलता है। अन्यथा कला का शास्त्र और उसका व्याकरण एक संयोजन की ओर चित्र निर्माण के समय लक्षित होना ही चाहिए। उसी से चित्रकार की रचना प्रक्रिया भी बन जाती है और उसकी दृष्टि का भी पता चल जाता है।

आधुनिक कला के संदर्भ को लेकर अनेक बार संशय की दीवारें खड़ी की जाती हैं और अमूर्तन को निस्सार करार देने के फतवे भी गढ़े जाते हैं। यह उन्हीं लोगों की साजिश या परंपरावादी सोच का मिला-जुला परिणाम है, जो नए भाव बोध के अमूर्तन स्वरूप में डूबने से इनकार करते हैं। रंगों को समेटना उन्हें आकारों में अत्यधिक आकर्षक रूप देना क्या जीवनगत सच्चाइयों का आदर्श नहीं हो सकता?

निस्संदेह इन चित्रों में भी चित्रकारों की आत्मा का संगीत बोलता है। प्रश्न इस संगीत से अंतर्संबंध स्थापित करने और उसे सार्थक अमूर्त रचना में बांधने का है। चित्रों को समझने के लिए अकेली आंखों का सहारा मात्र देखने का चाव ही जगा पाता है, लेकिन अंतर्चक्षु खोल कर चित्रों से साक्षात्कार किया जाए तो चित्रकार का कथ्य भी समझा जा सकता है। अब यह कौशल फिर उसकी कल्पना और चित्र निर्माण की प्रक्रिया पर निर्भर हो जाता है कि वह कैसे प्रभाव उत्पन्न करने में सफल या विफल रह सका है। रंगों से खेलने और कूची को चलाने का अवसर तो उसे मिला ही है। चित्रफलकों पर आंधियां चलती हैं या जड़ समाज के संवेदनशून्य होने का पता चलता है या फिर खानों-चौखानों के पार एक अद्भुत चित्ताकर्षक सौंदर्य का बुलावा दिखाई देता है तो यह चित्रकार की सजगता और उसके भाव निरूपण पर ही तो निर्भर करेगा!

कला की अभिव्यक्ति और उसे देखने की लगन मनुष्य की प्रारंभिक समझ और सोच से जुड़ी एक सहज प्रक्रिया है। इसलिए कल्पना और रचना प्रक्रिया का तालमेल ही समयांतर से चित्रकार की पहचान और उसकी अपनी विशिष्ट शैली का परिचायक भी है। जब मन का संस्पर्श चित्रों में जुड़ रहा है तो इसकी जटिलता का हल मिल जाता है। इसलिए चित्रों से रूबरू होने की जरूरत है। इनसे दूर होना या आग्रहपूर्वक देखना समकालीन कला के जीवंत दर्शन के लिए कष्टप्रद ही नहीं, एक सार्थक दृष्टिकोण से भी इनकार करना है। इसलिए अमूर्तन में चित्रों की सार्थक अर्थ कल्पना की समझ और रचना प्रक्रिया को समझना मुश्किल नहीं है। अपने सोच का दायरा व्यापक हो तो यह अमूर्तता वर्तमान जीवन के सारे आयाम खोल देती है और कला से तादात्म्य बना रहता है।

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