'दुनिया मेरे आगे' कॉलम में वर्षा का लेख : अमन की आस - Jansatta
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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में वर्षा का लेख : अमन की आस

रात के जगमगाते आसमान तले अलग-अलग संगठनों के खेमे खड़े थे। वहां और भी लोग थे जो एक-दूसरे से मिल-जुल कर बातें कर रहे थे।

Author नई दिल्ली | August 18, 2016 3:40 AM
भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु संपन्न देश हैं। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

आज जब कश्मीर या किसी भी दूसरे बहाने से भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक बयानबाजियों के अलावा शीर्ष नेताओं के आपसी व्यवहार तक में तल्खी की खबरें सामने आती हैं तो लगता है कि सीमा के दोनों तरफ की अवाम क्या सोचती या चाहती है, यह क्यों नहीं बताया जाता है। हां, हमें सतह पर तैरने वाली वह तस्वीर जरूर दिखाई जाती है जिसमें दोनों देशों के नाम को सुन कर ही दुश्मनी की गंध फैल जाती है। इसी तस्वीर में यह भी दिखाई देता है कि जो लोग क्रिकेट नहीं देखते वे भी पाकिस्तान के साथ होने वाला मैच देखना पसंद करते हैं। तब क्रिकेट खेल कम, युद्ध ज्यादा होता है। यहां तक कि संगीत में भी यह बंटवारा झलक जाता है। गुलाम अली को हिंदुस्तान से कम मुहब्बत नहीं मिली। नुसरत फतेह अली खां हों या वडाली बंधु, हिंदुस्तानी संगीत प्रेमियों ने उन पर जान छिड़की। मगर उनके कार्यक्रम भी यहां रद्द करने की नौबत आई।

लेकिन इसके बरक्स अक्सर ऐसी खबरें आती रहती हैं कि भारत और पाकिस्तान, दोनों के साधारण नागरिक कैसे सिर्फ अमन चाहते हैं और आपसी प्यार को बढ़ाने की उम्मीद अपनी सरकारों से करते हैं। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। कुछ साल पहले मुंबई में वर्ल्ड सोशल फोरम के आयोजन के दौरान कुछ पाकिस्तानी सामाजिक कार्यकर्ताओं और साधारण लोगों से मुलाकात हुई थी। हालांकि उसमें कई देशों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया था। हर देश के अलग-अलग खेमे थे। कोरिया, जापान, चीन, पाकिस्तान, नेपाल समेत कई देशों के सामाजिक कार्यकर्ता जुटे थे। विभिन्न मुद्दों पर सेमिनार चल रहे थे। सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हो रहे थे। एक ‘ग्लोबल विलेज’ की कल्पना वहां साकार हो रही थी। वहां मौजूद होना अपने आप में एक खास अनुभव था। विशेषज्ञों की बातें सुनने के अलावा दूसरे देशों के लोगों से बातचीत का मौका मिल रहा था।

मेले में आए लोगों के रुकने ठहरने का इंतजाम मेला परिसर के नजदीक ही था। रात के भोजन के बाद चाय पीने के लिए हम अपने खेमे से निकले। पाकिस्तान से आए लोगों की एक टोली भी वहीं टहल रही थी। हमने एक साथ ही चाय पी। इस तरह कुछ समय बातचीत के लिए भी मिला। उनके समूह में महिला कोई नहीं थी। वे सभी पठानी कुर्ता और पायजामे में थे। एक व्यक्ति का नाम शहजाद था, जिससे मैंने सवाल पूछा कि पाकिस्तान में हम हिंदुस्तानियों को किस तरह देखा जाता है। उन्होंने जवाब दिया कि पाकिस्तान के आम लोगों में हिंदुस्तान की जनता के लिए कोई नफरत या भेदभाव नहीं है। वे सब अपने-अपने काम में मशगूल रहते हैं। अवाम दरअसल नफरत नहीं करती, सियासतदां उनके बीच नफरत की भावनाएं पैदा करते हैं। अवाम तो अमन चाहती है, मिलजुल कर रहना चाहती है, व्यापार चाहती है। वहां कितने ही लोग हैं जिनके रिश्तेदार हिंदुस्तान में बसते हैं। यहां कितने लोगों के रिश्ते पाकिस्तान में हैं? ये सब दूरियां बनाई गई हैं। यह नफरत बनाई हुई है। किसी भी मुल्क का एक आम नागरिक बस यही चाहेगा कि वह अमन-चैन से रह सके।

एक बार यह मुद्दा छिड़ा तो फिर बातों पर बातें निकल पड़ीं। वे हिंदुस्तान से जुड़े अपने अनुभव बता रहे थे। यहां के लोगों से मिल कर उन सबको अच्छा लगा। उनके मुताबिक यहां और पाकिस्तान में कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं महसूस हुआ। उन लोगों से मिल कर हमें भी एक बार के लिए नहीं लगा कि किसी गैर मुल्क के बाशिंदों से मुलाकात हो रही है। खासतौर पर वह मुल्क, जिसके लिए यहां बच्चों के अंदर भी नफरत भर दी जाती है। यह मुलाकात ठीक ऐसी थी कि जैसे उत्तर भारत का कोई व्यक्ति दक्षिण भारत के किसी व्यक्ति से मिले और उनके आम जीवन से जुड़ी अपनी जिज्ञासा शांत करे। लगा ही नहीं कि हम दो अलग मुल्कों के लोग हैं। बस बातचीत के लहजे में थोड़ा फर्क था। इतना फर्क तो यहां एक ही राज्य के दो सिरों पर बसे लोगों की जुबान में होता है। हम सबने दो-दो प्याली चाय की सुड़क ली। एक-दूसरे को बेहतरी की उम्मीद बंधाते हुए विदा ली और अपने-अपने समूह के साथ आगे निकल गए, कुछ और नए लोगों से मिलने और उनके साथ विचार साझा करने के लिए।

रात के जगमगाते आसमान तले अलग-अलग संगठनों के खेमे खड़े थे। वहां और भी लोग थे जो एक-दूसरे से मिल-जुल कर बातें कर रहे थे। कुछ दिनों के लिए ऐसे लोगों का एक गांव सरीखा बस गया था जो एक जैसी सोच के थे। आज भी इन सबका मकसद दुनिया को कुछ और बेहतर बनाना है, सबको बराबरी पर ला खड़ा करना है। वहां एक लैंप-पोस्ट पर ‘पाश’ की कविता का बड़ा पोस्टर टंगा था- ‘सबसे खतरनाक वह चांद होता है जो हर हत्याकांड के बाद वीरान हुए आंगन में चढ़ता है…!’ वह उम्मीद और आशा से भरी जगह थी, जिसे आज हर अगले दिन याद करती हूं।

(वर्षा)

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