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दुनिया मेरे आगेः कहने की कला

यहां जब हम कहानी की बात कर रहे हैं तो वह एक अकादमिक कथाकार और उपन्यासकार की कहानी से हट कर अन्य कहानियों की बात हो रही है।

चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

कहने-सुनने को क्या कुछ नहीं है। सबके पास सुनाने के लिए एक से बढ़ कर एक कहानी है। नौकरी और जिंदगी से जुड़ी हुई। और भी न जाने कितनी कहानियों से भरे हुए हैं हम सब। बस एक बार छेड़ भर दीजिए, कहानियां बहने लगती हैं। दरअसल, एक के बाद एक कहानियां हमारी जिंदगी में बनती और प्रसारित होती हैं। कहने वाले कहते हैं कि अगर आपके पास कहन है, आपको मालूम है कि कैसे अपनी बात दूसरे को सुनानी है तो कोई सुनेगा कैसे नहीं! आज की तारीख में सुनने वालों की कमी नहीं है। सोशल मीडिया के बरक्स अगर हम कोई और विकल्प श्रोताओं को मुहैया करा सकें तो इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता।

यहां जब हम कहानी की बात कर रहे हैं तो वह एक अकादमिक कथाकार और उपन्यासकार की कहानी से हट कर अन्य कहानियों की बात हो रही है। ऐसी कहानियां तो कई बार कथाकार की नजर से भी फिसल जाती हैं। हम सोशल मीडिया या फिर अन्य माध्यमों के मार्फत अपनी या फिर दूसरों की कहानियों का आनंद ही तो लेते और देते हैं! कौन कहां गया, क्या खाया, कहां घूम रहा है आदि की जानकारियां। कई बार हम खुश होते हैं अपने निजी पलों को दूसरों के संग बांट कर तो कई बार जान कर कि कौन क्या कर रहा है, किसकी जिंदगी में अब नए मेहमानों का आगमन हो चुका है। दरअसल, मनुष्य एक ऐसा जीव है जो खाली नहीं बैठ सकता। या तो अपने अतीत की कहानियां सुनाता है या फिर सुनने में दिलचस्पी रखता है।

मायने यह रखता है कि आप कितनी कुशलता के साथ अपनी या औरों की कहानी सुना सकते हैं। इन दिनों कारपोरेट क्षेत्र में कहानी सुनाने और कहने वालों की काफी मांग है। ऐसे लोग जो छोटी-छोटी घटनाओं और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी घटनाओं के तार को जोड़ कर प्रबंधन या मैनेजमेंट के औजारों से रूबरू कराते हैं। एक मैनेजर कैसे अपनी टीम के साथ बर्ताव करे, कैसे प्रोजेक्ट को सफल बनाए आदि सैद्धांतिक चीजों को कहानी के जरिए साझा करते हैं। एक-एक सत्र के शुल्क दस हजार रुपए तक होते हैं। अगर उनमें कुछ खास है तो क्या हम कहानी कहने का कौशल नहीं सीख सकते? एक सवाल यह है कि इन कहानियों में होता क्या है? कहानियों में हमारा जीवन दर्शन और जिंदगी के उतार-चढ़ाव ही तो दर्ज हुआ करते हैं। हमें उन कहानियों में कई बार रास्ते और उम्मीद की रोशनी मिल जाती है।

दरअसल, हम सिद्धांत के बजाय कहानियों के जरिए ज्यादा समझते हैं। सिद्धांत रूप से तो बहुत-सी चीजें सुन कर दूसरे कान से निकाल देते हैं। लेकिन जब दादी-नानी या दोस्त कहानियां सुनाते हैं, तब हमारी दिलचस्पी बढ़ जाती है। यहां कहन पर काफी कुछ निर्भर करता है कि कौन किस स्तर की और कितनी दिलचस्पी लेकर आपबीती या दूसरों पर गुजरी बातें बता रहा है। गली-मोहल्ले में ऐसी औरतें या पुरुष होते हैं, जिनके पास कहने का कौशल होता है और वे इधर-उधर की कहानियां सुनाते हैं। लेकिन हमें यहां एक अंतर या रेखा खींच कर समझना होगा कि कहानी कहने और निंदारस लेने या देने में बुनियादी अंतर होता है।

मसलन, कारपोरेट क्षेत्र में कहानी के जरिए बड़ी या छोटी घटनाएं और बातें लोगों तक पहुंचाई जाती हैं। प्रबंधन की पढ़ाई की कक्षाओं में भी घटनाओं का ब्योरा मुहैया कराया जाता है। दूसरा उदाहरण यह भी हो सकता है कि कोई कंपनी पिछले दो-तीन सालों से घाटे में जा रही थी। उत्पादन समय पर नहीं हो रहा था, लेकिन जब नए मैनेजर और लीडर को नियुक्त किया गया तो वे कंपनी को छह माह में ही सारी चीजें समय पर और लक्ष्य के अनुसार चलाने में सक्षम हो सके। इस प्रकार की कहानियों को हम ‘केस स्टडी’ का नाम दे सकते हैं। इन्हें प्रबंधन के नए विद्यार्थी पढ़ते और सीखते हैं कि कैसे व्यवहार में सिद्धांत को उतारा जाए। फिर कामयाबी के रास्ते पर कैसे बढ़ा जाए!

यह अलग विमर्श का मुद्दा हो सकता है कि हमारा समाजीकरण कई बार सिद्धांतों और व्याकरणों से ही होता है। उसमें स्कूल, पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकें काफी हद तक एक रूढ़ परंपरा को ही पोषित करती हैं। जबकि प्रबंधन में हर चीज को जांच कर और व्यवहार में इस्तेमाल करके सत्यापित किया जाता है। समझने की बात यह है कि नए लीडर में अगर दृष्टि को पूरा करने की रणनीति, निर्माण से लेकर उसे कार्यान्वित करने की क्षमता और कौशल है तो यह किसी भी योजना को विकास की राह पर दौड़ा सकता है। यह एक कहानी है। इस कहानी को कंपनियां अपने अन्य कर्मचारियों के बीच साझा करती हैं। यही बात जब कहानी सुनाने वाला कोई पेशेवर व्यक्ति उठाता है तो उसके साथ उसका बर्ताव बिल्कुल अलग होता है।

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