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दुनिया मेरे आगेः विचित्र दौड़

पाठशालाओं में एक उक्ति कही जाती रही है- ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे बनोगे खराब!’ अब भले यह कहना कम हुआ हो, लेकिन ये बातें ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को हिदायत की तरह कहते रहते थे।

Author May 21, 2018 4:07 AM
प्रतीकात्मक चित्र

हेमंत कुमार पारीक

वे सामने बैठी रो रही थीं फूट-फूट कर। वजह थी एक बड़ी परीक्षा। उनका बेटा उस परीक्षा में वह कमाल नहीं कर पाया, जिसका सपना संजोए वे चार साल से इंतजार कर रही थीं। एक बेटा है और कमाने वाले दो। वे और उनके पति। दोनों शिक्षा के क्षेत्र में हैं। दोनों अलग-अलग रहते हैं। पति किसी दूसरे शहर में नौकरी करते हैं। तीन साल पहले वे अच्छे कोचिंग इंस्टीट्यूट के लिए सलाह मांगने आर्इं थीं। कारण यह था कि बड़े शहरों में ऐसे बहुत सारे कोचिंग संस्थान पैदा हो गए हैं जो सफलता की सौ फीसदी गारंटी देते हैं। मेरी जान-पहचान में और भी हैं, जिनके बेटे-बेटियां आने वाले समय में इंजीनियरिंग या मेडिकल जैसी बड़ी परीक्षा की तैयारी में लगे हैं। वे भी अच्छे कोचिंग संस्थान के लिए प्रयासरत थे। आमतौर पर ऐसे संस्थान उन बच्चों का चुनाव करते हैं जिनकी पढ़ाई-लिखाई का रिकार्ड बेहतरीन रहा हो। उसके बाद वे संस्थान बड़ी फीस वसूलते हैं। माता-पिता यह नहीं देखते कि उनके बच्चों में वैसी काबिलियत है भी या नहीं। सिर्फ घुड़दौड़ में शामिल अपने-अपने बच्चों पर दांव लगाते हैं और कोचिंग सेंटर को कोई फैक्ट्री समझ लेते हैं कि कैसा भी कच्चा माल जाएगा, चमचमाता रोजगार तैयार होकर बाहर आएगा।

मैं लगातार देख रहा था कि उन्होंने बेटे की पढ़ाई में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी थी। समय-समय पर उसकी प्रगति बताती भी थीं। चार वर्ष का समय काफी लंबा होता है। माता-पिता बड़ी उम्मीद लगाए रहते हैं कि उनका बेटा या बेटी किसी आइआइटी या एम्स में चला जाएगा तो मानो दोनों का जीवन धन्य। लेकिन अगर विफल होता है तो दोनों के लिए एक बड़ा झटका होता है। माता-पिता के लिए जीवन-मरण का प्रश्न हो जाता है। इसी संदर्भ में कई बार (आजकल ज्यादा) देखने में आता है कि नवयुवक और नवयुवती परीक्षा में विफल होने पर फांसी लगा लेते हैं या रेलवे पटरी पर अपनी जान दे देते हैं। यह सब देख कर पुराना वक्त याद आता है, जब ऐसी कोई दौड़ नहीं थी। बच्चे स्कूल जाते थे, खेलते-कूदते थे। उस समय माता-पिता का दखल बहुत कम था। बच्चा स्कूल जा रहा है और ठीक से पढ़ रहा है, बस यही उनके लिए संतोष की बात थी। इस संदर्भ में ‘सुपर-30’ की सफलता देख आश्चर्य होता है। कहते हैं कि हाथ की पांचों अंगुलियां बराबर नहीं होतीं, फिर सौ फीसद सफलता एक यक्ष-प्रश्न खड़ा करती है। यह प्रश्न हरेक के लिए पहेली है। हरेक की अपनी-अपनी रुचि होती है। रुचि के मुताबिक उसे अपना व्यवसाय चुनना चाहिए। कहीं-कहीं ऐसी प्रयोगशालाएं हैं जहां बच्चों की रुचि को परखा जाता है और उसी के हिसाब से पालकों को सलाह दी जाती है कि फलां क्षेत्र में बच्चा अपनी उच्चतम दक्षता से काम कर सकता है।

मुझे याद है हमारे मोहल्ले में एक शिक्षिका रहती थीं जो मोहल्ले के बच्चों को इकट्ठा कर मनोवैज्ञानिक जांच के लिए ले जाती थीं। ऐसे प्रयोग बच्चों की पांच वर्ष की अवस्था में किए जाते हैं, जब उनका मानसिक विकास लगभग पूरा हो चुका होता है। कहीं किसी विकसित देश में आज भी यही प्रयोग किए जाते हैं। मगर हमारे देश में तो बस एक दौड़ जारी है। बच्चा पांच वर्ष का हुआ नहीं कि पालकों ने सपने देखने शुरू किए। बाहर से कोई मेहमान आया और छोटी-सी उम्र के बच्चे पर प्रश्न दागा- ‘बेटा, बड़े होकर क्या बनोगे- डॉक्टर या इंजीनियर!’ यह एक हास्यास्पद बात है। इस उम्र में बच्चा आसपास के परिवेश को समझने की कोशिश करता है। उसके कच्चे दिमाग में अनेक प्रश्न होते हैं, पर ‘क्या बनोगे’ वाला प्रश्न एक बोझ की तरह उसके बाल-मन पर हावी हो जाता है और बाकी सारे सवाल पीछे छूट जाते हैं।

पाठशालाओं में एक उक्ति कही जाती रही है- ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे बनोगे खराब!’ अब भले यह कहना कम हुआ हो, लेकिन ये बातें ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को हिदायत की तरह कहते रहते थे। इसी के मद्देनजर जिन बच्चों की रुचि पढ़ाई-लिखाई से इतर खेलकूद में होती है, उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है। स्कूल से मिला सिर्फ एक अंकपत्र बच्चे का मनोबल गिरा देता है और वही उनका मनोबल बढ़ा भी देता है। खेलने-कूदने वाले बच्चे बाहर तो क्या, घर में भी मानसिक दबाव झेलते रहते हैं। घर में घुसते ही पढ़ाई-लिखाई का समूह गान शुरू हो जाता है। चारों तरफ कॉपी, किताब, पेन और पेंसिल ही नजर आते हैं। यही कारण है कि कभी खेलों में हमारा देश सिर्फ एक स्वर्ण पदक की ओर ललचाई नजरों से देखता था। मगर अब समय बदल रहा है। आज लोग खेलों की तरफ आकृष्ट हुए हैं। वजह है पैसा और इज्जत! फिर भी अधिकतर लोग एक लीक पर चल रहे हैं- ‘बेटा, क्या बनोगे- डॉक्टर या इंजीनियर!’

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