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दुनिया मेरे आगे: भाषा का जीवन

जिंदगी के साथ-साथ भाषा का सफर भी निरंतर जारी रहा।

Author Updated: December 3, 2019 2:38 AM
भाषा कोई भी हो, वह अपने मिजाज में लोकभाषा कोई भी हो, वह अपने मिजाज में लोकतांत्रिक ही होती है। तांत्रिक ही होती है.

भाषा का सवाल बचपन से लेकर अब तक न जाने कितने तरह से मन में उभरता रहा है। एक वजह तो यही समझ में आती है कि व्यक्ति की देह और मन की नाल मां के अलावा अगर किसी और शय से सबसे ज्यादा गहराई से जुड़ी होती है तो वह है अपनी भाषा। बचपन में मां की भाषा में सोना-जागना, हंसना-रोना हुआ और थोड़ी उम्र बढ़ने पर आस-पड़ोस की भाषा भी मां की सिखाई भाषा के ही दायरे में आ गई। कई बार मां की सिखाई भाषा के साथ आ मिली यह पड़ोस की भाषा भी अपनी मातृभाषा बन जाती है। हो सकता है, किन्हीं मामलों में ऐसा न होता हो, लेकिन अक्सर ऐसा ही होता है। तभी तो ज्यादातर भारतीय परिवार अपनी मूल भाषाई बनावट में बहुभाषी होता है।

मिसाल के लिए, मेरी मां के घर पटना में मगही बोली जाती थी। जब वे ब्याह कर गंगा की गोद से निकल बूढ़ी गंडक (नदी) के तट पर आर्इं तो उनके भाई-बंधु, परिवार-पड़ोस ही नहीं, मायके की भाषा भी छूटी। मायके की भाषा एकदम से छूट गई- ऐसा तो नहीं कह सकते, भाषा व्यक्ति के जीवित होते कभी छूटती नहीं। वह रहती आपके साथ ही है, लेकिन हृदय में रहने और जबान पर होने के बीच का फर्क करना भी जरूरी है। ससुराल के नए संसार में मां की एक नई भाषा से भेंट हुई, महिलाएं बज्जिका बोलती थीं और पुरुष अधिकतर खड़ी बोली हिंदी। चूंकि मेरा शहर मिथिलांचल के ज्यादा करीब है तो वहां मैथिली बोलने वाले भी बहुत लोग थे।

इस तरह मेरा बचपन जिन भाषाओं से समृद्ध हुआ, उनमें हिंदी, बज्जिका, मगही, मैथिली और भोजपुरी थीं। स्कूल में अंग्रेजी तो थी ही। बचपन में ही पिताजी के पुस्तकालय से गालिब और मीर को पढ़ने का चस्का लग गया, सो उर्दू ने भी मेरे भाषा-संसार में अपनी जगह बना ली। दिल्ली आने पर और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दाखिल होने के बाद सुदूर असम से आई कारबियांग जनजाति की एक छात्रा से दोस्ती हुई। उनकी भाषा कार्बी के बारे में जाना तो उसकी सोंधी महक भी मेरे भाषा संसार को सुगंधित करने लगी। कई बंगाली दोस्तों की संगत का असर कहिए या फिर कवींद्र टैगोर की कविताओं का प्रभाव कि बांग्ला कभी भी दूसरे प्रांत की भाषा नहीं लगी। बांग्ला उतनी ही अपनी लगी, जितनी कि बज्जिका और भोजपुरी। हैदराबाद की एक सहेली ने तेलुगू को कब और कैसे मेरे भाषा-संसार में दाखिल करा दिया दिया, इसका पता तक नहीं चला मुझे। जब शहर पांडिचेरी के इश्क में गिरफ्तार हुई तो एक साथ तमिल और फ्रेंच दिल में समाते चले गए।

इन दिनों जिंदगी का ढर्रा सूफीयत का बन आया है। सो, अमीर खुसरो और मौलाना रूमी फारसी सीखने की ललक पैदा कर रहे हैं। कभी राबिया के लिए धड़कता दिल कहता है- ‘ऐ लड़की राबिया को पढ़ने चली हो, लेकिन तुम्हें अरबी क्यों नहीं आती?’ बॉलीवुडिया पंजाबी को लेकर मन में जो निरादर था, उसे बुल्लेशाह ने समाप्त कर दिया है। अब हर पंजाबी लफ्ज खुद-ब-खुद अपना अर्थ मुझ पर खोल देता है। तुलसीदास और जायसी को पढ़ते हुए अवधी ने भाषा-संसार को समृद्ध किया तो मीरा की रचनाओं ने राजस्थानी और गुजराती भाषा के संस्कार से अवगत करवाया।

जिंदगी के साथ-साथ भाषा का सफर भी निरंतर जारी रहा। पर कभी भी भाषा को लेकर मन में धर्म का सवाल नहीं उठा। मेरे गांव के इकलौते मुसलिम परिवार के सदस्य हम लोगों से अच्छी बज्जिका और हिंदी बोलते थे। और हमारे उर्दू शब्दों का भंडार उनसे अधिक समृद्ध था। हालांकि भाषाओं के सांप्रदायीकरण की कवायद तो सियासी तौर पर अंग्रेजों ने सन 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना के साथ ही शुरू कर दी थी।

लेकिन आजाद भारत में भाषा को राष्ट्रीय एकता-अखंडता के साए में सोचा गया और अपेक्षा रखी गई कि कोई एक भाषा कालक्रम में सारे देश की भाषा चाहे न बने, तो भी कम से कम इतना तो हो ही जाएगा कि उसे संपर्क-भाषा के रूप में अपनाते हुए किसी को अटपटा न लगे। यों देखें तो भाषा कोई भी हो, वह अपने मिजाज में लोकतांत्रिक ही होती है। हर दूसरी भाषा को अपना कर ही अपना विकास करती है। किसी से शब्द का उपहार लेती है, किसी के व्याकरण से कोई सूत्र ले आती है तो किसी भाषा की भंगिमा अपना लेती है।

इस तरह अपने को सजाती-संवारती है। आजाद भारत में हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में विकसित करने का विचार इसी तर्क को अपना कर चला। भाषा धर्म के आधार पर न किसी को पहचानती है और न ही उसे विभेद का जरिया बनाती है। अगर ऐसा होता तो जायसी एक हिंदू राजा की कथा अवधी में क्यों लिखते? संस्कृत या उसके किसी खास हिस्से को सिर्फ हिंदू पढ़ाए वाले तर्क को अगर आगे बढ़ाएंगे तो एक निष्कर्ष यह भी निकलेगा कि जो हिंदू नहीं है, उसे संस्कृत पढ़ने का भी अधिकार नहीं होना चाहिए। हम लौट कर वहीं पहुंचेंगे जहां बात आएगी कि शूद्र, स्त्री को ज्ञान का अधिकार नहीं होना चाहिए!

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