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दुनिया मेरे आगेः ये कैसे शोध

आजकल अक्सर अमेरिका, इंग्लैंड या किसी देश में किसी विषय पर हुए शोध के निष्कर्ष सामने आते रहते हैं। मैंने गौर किया है कि ऐसे कई शोध और उनके निष्कर्ष शायद लोगों को बेवकूफ बनाने वाले होते हैं।

महेंद्र राजा जैन

आजकल अक्सर अमेरिका, इंग्लैंड या किसी देश में किसी विषय पर हुए शोध के निष्कर्ष सामने आते रहते हैं। मैंने गौर किया है कि ऐसे कई शोध और उनके निष्कर्ष शायद लोगों को बेवकूफ बनाने वाले होते हैं। दरअसल, ये शोध आमतौर पर ऐसे लोगों द्वारा और ऐसी संस्थाओं में किए जाते हैं, जिनका साधारण लोगों या पाठकों ने पहले कभी नाम भी नहीं सुना होता है। वे लोग और संस्थाएं किसी न किसी प्रकार से अपने प्रचार के भूखे होते हैं। ऐसे शोध ज्यादातर सामान्य विषयों से संबंधित होते हैं, जैसे शराब पीने या न पीने, कम या अधिक पीने के फायदे और नुकसान या फिर ज्यादा या कम चलने से होने वाले लाभ-हानि। इन रिपोर्टों में जो कुछ लिखा होता है, उनमें कभी-कभी आश्चर्यजनक रूप से विरोधाभास भी होता है।

उदाहरण के तौर पर अमेरिका का इमारो विश्वविद्यालय अटलांटा में कुछ समय पहले किए गए एक ऐसे ही शोध के बाद शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि विवाह समारोह में जितना अधिक खर्च किया जाता है, उसमें विवाह-विच्छेद की उतनी ही अधिक संभावना रहती है। ऐसे किसी समारोह में बीस हजार डॉलर या अधिक खर्च किए जाने पर उसमें पति-पत्नी का संबंध टूट जाने की संभावना उस विवाह समारोह से डेढ़ गुना अधिक रहती है, जिसमें दस हजार डॉलर खर्च किए गए हों। इस शोध के नतीजे पर खूब चर्चा हुई और कई मशहूर हस्तियों ने भी अपनी राय जाहिर की। लगभग उसी समय कुछ लोगों ने हॉलीवुड अभिनेता जार्ज क्लूनी और और उनकी नई पत्नी अमल को विवाह समारोह में धुआंधार खर्च करने के प्रति आगाह करते हुए लिखा कि उन्हें अपने वैवाहिक भविष्य को जोखिम में नहीं डालना चाहिए।

इसके विपरीत पिछले साल अगस्त में अमेरिका में ही वर्जीनिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि विवाह समारोह जितना ही बड़ा होगा, यानी उसमें जितने अधिक लोग शामिल होंगे और जितना अधिक खर्च होगा, विवाह-बंधन उतना ही अधिक समय तक टिका रहेगा। इसके पक्ष में तर्क यह दिया गया कि जिस विवाह में डेढ़ सौ या अधिक लोगों के समक्ष वैवाहिक रस्में पूरी की जाती हैं, वह पचास या कम लोगों के समक्ष हुए समारोह की अपेक्षा अधिक स्थिर होगा। अब एक ही विषय पर किए गए कथित दो शोध और उनके निष्कर्षों में से किसे सही माना जाए!

हाल ही में मैं लंदन के एक पुस्तकालय में पिछले दिनों के अखबार देख रहा था। ये अखबार सामान्य लोगों यानी मजदूर वर्ग और गरीबों द्वारा पढ़े जाने वाले नहीं थे, बल्कि संभ्रांत, बौद्धिकों और तथाकथित उच्चवर्गीय लोगों द्वारा पढ़े जाने वाले ‘टाइम्स’, ‘गार्जियन’, ‘टेलीग्राफ’ आदि थे। मैं यह पता लगाने के लिए उनका अध्ययन कर रहा था कि इनके पृष्ठों में तथाकथित शोध का किस प्रकार उपयोग किया गया था। एक जगह इस्राइल के प्रतिष्ठित ‘वीजमेन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस’ की एक रिपोर्ट पहले पृष्ठ पर प्रमुखता से छपी थी कि जो लोग कारोबारी जरूरतों के लिए बाहर जाते हैं, उनका वजन इस कारण नहीं बढ़ता कि वे खूब खाते-पीते हैं। बल्कि इसलिए बढ़ता है कि जेट लेग के कारण उनके पेट में बैक्टीरिया गड़बड़ हो जाता है। यह सही हो सकता है और किसी वैज्ञानिक संदर्भ में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। लेकिन यह मानने का कोई कारण नहीं नजर आता है कि इसी कारण से पाश्चात्य देशों के लोगों में मोटापा नहीं बढ़ रहा है, क्योंकि मोटापा बढ़ने का मुख्य कारण खूब खाने-पीने और अधिक शराब पीने से माना जाता रहा है।

कुछ समय पहले अमेरिका में बाल्टीमोर के ब्लूमबर्ग स्कूल आॅफ पब्लिक हेल्थ में किए गए शोध में बताया गया था कि एक केन कोकाकोला पीने से शरीर में जो कैलोरी जमा होती है, उसे जलाने के लिए चार मील दौड़ना होगा। इसके प्रतिवाद में जर्मनी के हाइडिलबर्ग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का कहना था कि बहुत ज्यादा शारीरिक अभ्यास से दांतों को नुकसान पहुंचता है। सीधी-सी बात यह है कि हम सभी जानते हैं कि हमारे लिए क्या बुरा है- धूम्रपान, मद्यपान, फास्ट फूड आदि। इसलिए शोधकर्ता इनसे होने वाली हानियों के संबंध में और अधिक बताते हैं तो दूसरी ओर लोकप्रियता के भूखे कुछ शोधकर्ता इनमें भी कुछ अच्छाइयों की खोज कर लेते हैं।

कुछ और भी रिपोर्टें भी आती रहती हैं जो लोगों द्वारा पहले से ही मान्य हैं। कुछ समय पहले एक खबर में यह बताया गया कि जो मां-बाप प्रेम से रहते हैं, कभी लड़ते-झगड़ते नहीं, वे अपने बच्चों के प्रति उन मां-बाप की अपेक्षा अधिक नम्र रहते हैं जो अक्सर लड़ते-झगड़ते रहते हैं। लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसी बातें भी छप जाती हैं जो सच नहीं जान पड़तीं। मसलन, हंगरी से आई एक रिपोर्ट से पता चलता है कि जो लोग ठंड के मौसम में पैदा होते हैं, वे गरमी के मौसम में पैदा हुए लोगों की अपेक्षा कम चिड़चिड़े होते हैं। क्या अब कोई इस बात की भी शोध करेगा कि जिनका जन्म गरमी और शीत ऋतु के अलावा अन्य किसी मौसम में होता है, वे बिल्कुल ही चिड़चिड़े नहीं होते हैं।

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