कांटों के बीच - Jansatta
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कांटों के बीच

एक रात सपने में देखा कि मेरी अचानक मौत का समाचार सुन कर मेरे बच्चे अपने-अपने काम से थोड़ी मोहलत लेकर मेरे गांव के पुराने, टूटे-फूटे घर पहुंचे हैं। जब वे गांव पहुंचे, मेरी लाश को कफन पहनाया जा चुका है। ताबूत आंगन में रखा है और जनाजे की नमाज के लिए कतारें सज गई […]

Author July 29, 2015 8:25 AM

एक रात सपने में देखा कि मेरी अचानक मौत का समाचार सुन कर मेरे बच्चे अपने-अपने काम से थोड़ी मोहलत लेकर मेरे गांव के पुराने, टूटे-फूटे घर पहुंचे हैं। जब वे गांव पहुंचे, मेरी लाश को कफन पहनाया जा चुका है। ताबूत आंगन में रखा है और जनाजे की नमाज के लिए कतारें सज गई हैं।

नमाज पढ़ाने के लिए पास की बस्ती से बुलाए गए इमाम मजहबी मामलों और दिखावटी रस्म-रिवाज से मेरे सीमित, न के बराबर, लगाव से अच्छी तरह वाकिफ हैं। फिर भी उन्होंने नमाज के बाद कब्र में मेरे उतारे जाने के वक्त अरबी जबान में कुछ फिकरे जरूर दुहराए। बाद में कब्र के ऊपरी हिस्से में लकड़ी के बड़े-बड़े तख्ते सजा दिए गए। ताड़ के पत्तों से बनी चटाई तख्तों के ऊपर बिछाई गई, किनारे-किनारे बेर की कांटेदार डालियां रखी गर्इं और चारों ओर कब्र के अंदर वजनदार गीली मिट्टी के लोंदे रख दिए गए।

बेल की कांटेदार डालियां जब मेरी कब्र में रखी जा रही थीं, मेरे चेहरे पर थोड़े समय के लिए हल्की-सी एक मुस्कराहट फैल गई। सारी जिंदगी कांटों का साथ रहा है, कब्र में वे मेरा साथ भला कैसे छोड़ देते! इसके बाद, कब्र पर मिट्टी डालने का सिलसिला शुरू हुआ। मेरे बच्चों ने भी आगे बढ़ कर इसमें हिस्सा लिया।

गीली मिट्टी से उनके हाथ गंदे हो गए हैं। हाथों की गंदगी देख-देख उनके चेहरे पर ऊब की लकीरें उभर आई हैं। उनकी परेशानी देख कर, वहां मौजूद लोगों में से किसी ने उस तरफ इशारा किया है, जहां हाथ धोने के लिए पानी के कई घड़े रखे हैं। घड़ों के पानी से अपने हाथ धोकर बच्चों ने कुछ राहत महसूस की है। मेरी लाश चूंकि मकान के सेहन में एक कोने में दफनाई गई है, इसलिए मिट्टी-मंजिल में शरीक लोग काम पूरा होते ही आहिस्ता-आहिस्ता आंगन के बाहर चले गए हैं।

अब वक्त दरअसल मेरे बच्चों के मकान के अंदर जाने का है, जहां कुछ औरतें खामोशी की मूरत बनी इस कदर सट कर बैठी हैं कि उनकी धड़कनें भी एक दूसरे को सुनाई दे रही हैं। बच्चे अंदर वाले हॉल में दाखिल हुए तो औरतों का ध्यान स्वाभाविक रूप से उनकी तरफ गया है। बच्चों ने उलझी नजरों से हॉल का जायजा लिया है। हॉल के किनारे-किनारे किताबों से भरी पुराने अंदाज की आलमारियां एक लाइन में खड़ी हैं। शीशों के बाहर से किताबों के नाम आसानी से पढ़े जा सकते हैं। उनमें ज्यादातर खुद मेरी लिखी हैं।

हॉल के अलावा दूसरे कमरों में भी पुराने रंग-ढंग के फर्नीचर देख कर बच्चों को कोफ्त हो रही है। पुराने होने के बावजूद, घर की देखभाल में लगे अमलों ने इनकी साफ-सफाई का पूरा खयाल रखा है। बच्चों को पुराने डिजाइन की कुर्सियों पर बैठने में कोई झिझक नहीं महसूस हुई है। पास-पड़ोस की औरतें रस्मी तौर पर बच्चों को दिलासा देकर अपने-अपने घर लौट गई हैं। घर में अब सिर्फ बच्चे रह गए हैं। सामने वाले घर से चाय के साथ नमकीन बिस्कुट और कुलचे से भरी ट्रे आ गई है। घर में चूल्हे की आग कई दिन से सर्द है। रखवाले इधर-उधर, हाट-बाजार से अपने लिए खाने का कुछ सामान ले आते हैं। खाना बनाने-खाने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है।

चाय पीकर बच्चों ने अमलों से घर के हिसाब-किताब की जानकारी ली है, बैंकों के खाते खंगाले हैं। माली की माहवारी तनख्वाह की बाबत पूछा है। बिजली के बिल, दीगर खर्चों की तफसील दरियाफ्त की है। बच्चों ने रखवालों को घर के तमाम खर्चों को बंद करने की हिदायत दी है। बिजली की लाइन काटने, माली को काम से हटाने को भी कहा है। साथ में यह भी ताकीद की है कि कोई मुनासिब खरीदार मकान और जमीन का मिले तो हमें तार भेज कर खबर करो।

बच्चों को काम पर लौटने की जल्दी है। वे फालतू किस्म के कामों में उलझ कर अपना वक्त बर्बाद नहीं करना चाहते। मकान के सेहन में, जहां मेरी लाश दफनाई गई है, वहां पास में ही अपने पुरखों में से एक का मजार है। मजार के सिरहाने हरसिंगार और रातरानी के घने और खुशबूदार पौधे फैले हुए हैं। दोनों तरफ सेहन के किनारे-किनारे अशोक के अनगिनत पेड़ अपने सिर उठाए खड़े हैं! अशोक के पेड़, जिन्हें सिर झुकाने की तालीम नहीं दी गई है!

जाबिर हुसेन

 

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