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दुनिया मेरे आगेः उम्र से आजाद रिश्ते

छोटे-बडे़ में उम्र का अंतर समझना हमेशा से मेरे लिए मुश्किल ही रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

एकता कानूनगो बक्षी

छोटे-बडे़ में उम्र का अंतर समझना हमेशा से मेरे लिए मुश्किल ही रहा है। यह शायद इसलिए भी बना हुआ है कि बचपन से ही अपने से बड़े और छोटे किसी लड़के या लड़की की उम्र के बीच अंतर करने की समझ ठीक से विकसित नहीं हो सकी। मसलन, पंद्रह वर्ष से भी ज्यादा बड़ी मेरी दीदी मुझे मेरी किसी दोस्त की तरह लगती थी और छह साल बड़े भैया को मैं अपने छोटे भाई की तरह प्यार करती और उनका हमेशा खयाल रखती थी। दादी अक्सर कहती थीं कि मैं तो उनकी गुरु हूं। दरअसल, अक्सर किसी सवाल पर मेरी कोई छोटी-सी सलाह उनके बड़े काम आती थी। दादी की मम्मी का तकियाकलाम भी गजब का था- ‘आप समझो साहब!’ उन्हें मैं स्कूल की पहली कक्षा में पढ़ कर आने के बाद घर पर ‘अ’ से अनार बोलना सिखाया करती थी। बाद में पता चला कि वे तो खुद स्कूल में प्राथमिक कक्षाओं की शिक्षक रह चुकी थीं। जाहिर है, मेरे सामने उन्होंने गजब का अभिनय किया और ‘आप समझो साहब’ कह कर मेरे सामने भोली बनी रहीं। इस तरह उन्होंने मुझे समाज सेवा करने के संतोष को महसूस करने का अवसर भी दिया।

दादाजी के लिए तो मैं उनकी प्यारी-सी गुड़िया थी और लाड़ से मुझे वे ‘गनिया’ बुलाते थे। उन्हें जो भी सिखाना होता था तो सोने से पहले रात की कहानियों के माध्यम से सिखा देते थे। उसके साथ ही मेरी हर छोटी से छोटी बात भी मानते। मैंने भी उनकी सब बातों को कंठस्थ कर रखा था। उन्होंने मुझे सिखाया था खूब हवा खाना, खूब पानी पीना और खूब पैदल चलना। उनकी बातों को मानने की जिद के कारण मम्मी को कई किलोमीटर दूर मेरे स्कूल पैदल चल कर मुझे छोड़ने और लेने जाना पड़ता था। तब मैं स्कूल के तांगे में कभी नहीं बैठती थी।

घर के अन्य बच्चों की भी मैं बहुत बड़ी दीदी बन कर रहती थी। दो या तीन साल बड़े होने के बाद भी वे मेरी बात बहुत मानते थे। मैं जो कहती थी, वे बिना विवाद किए मान लेते थे। मेरे साथ बैठ कर खाना खाने की जिद से लेकर, मेरे हाथों से बनाए खेल वाले खाने खाते औरसब बेतुके खेलों में हमेशा बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते। मैं चाची को चाची जान तो कभी ‘चाची 420’ कह कर बुलाती थी। लेकिन अपने नाम की तरह वे सिर्फ स्नेह बरसाने लगतीं। प्यार को प्यार की तरह ही स्वीकार किया जाता था।

मैं सबसे छोटी थी, फिर भी इतना सम्मान मिलता रहा था बचपन से। शायद वह सब मुझसे प्यार करते थे या फिर कोई रौब था शायद मेरा। पता नहीं! ऐसा इसलिए कहना पड़ता है कि कई बार हम जिसे प्यार मान कर खुश हो रहे होते हैं, कई बार वही हमारी कंडिशनिंग या सोचने-समझने की मानसिकता तय करने के लिए जिम्मेदार होता है। लेकिन मेरी स्थिति घर में ऐसी बनी कि पापा एक आलोचक थे तो मैं भी किसी विपक्षी दल के नेता से कम नहीं थी। किसी मसले पर वाद-विवाद के बाद ही मुझे उनकी कोई बात समझ आती थी। किसी तरह के समझौते की कोई गुंजाइश नहीं होती थी, पर उसके चलते मेरी सारी उलझनें सुलझती गर्इं।

सबसे दिलचस्प यह था कि मम्मी कभी भी मुझसे बड़ी थी ही नहीं! मुझसे ज्यादा घर में उनकी रौनक रहती। दिनभर भर मुस्कुराते और गाते हुए सबकी जरूरतें पूरी करने में लगी रहतीं और उसके बावजूद पता नहीं कैसे और कहां से वक्त निकाल कर, मेरी धाराप्रवाह बातों को सुनने के लिए भी तैयार हो जातीं। अब तक की मेरी सबसे अच्छी और धैर्यवान श्रोता शायद वही हैं। मां से तो मेरा रिश्ता थोड़ा अलग और बेहद अहम रहा। लेकिन हर वक्त और हर स्थिति में केवल सुनना क्या सचमुच धैर्य का ही मामला होता है? या फिर यह किसी मनोविज्ञान का भी हासिल या नतीजा होता है!

लेकिन अफसोस! अब भी समस्या वहीं की वहीं रह गई। मुझे समझ में ही नहीं आया कि कौन मुझसे बड़ा है और कौन छोटा। दादी और दादा अगर बड़े हैं, लेकिन मम्मी इतने प्यार से उन्हें खाना खिलाती है, उनकी देखभाल करती है, तब लगता है जैसे वे उनकी भी मम्मी हों। मम्मी-पापा एक दूसरे से बहुत सम्मान और प्यार से बातें करते हैं। उन दोनों में से कौन बड़ा है, पता ही नहीं चलता। और सबसे ज्यादा प्यार और सम्मान तो मुझे मिलता है। मतलब…! उफ्फ! बहुत असमंजस है! आज तक मुझे इस परिवार का पदक्रम समझ नहीं आया कि कौन बड़ा है और कौन छोटा। घर के नियम भी कोई ऐसा भेद नहीं करते। पर हां, एक ऐसा वातावरण जरूर मिला है जो ईमानदारी, नेकी, प्यार, सम्मान और एक दूजे का ध्यान रखने की महक से ओतप्रोत है।

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