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दुनिया मेरे आगेः बरसात के बाद

एक

Author September 30, 2016 3:41 AM

हिमांशी पटवा

एक मौसम चक्र के रूप में बरसात लगभग गुजर गई है, लेकिन शहरों में अपना असर छोड़ गई। इसके जाने के बाद बीमारियों का फैलना एक पक्ष है। लेकिन बरसात के दौरान शहर-महानगर में जो आलम होता है, वह परेशान करने वाला है। दरअसल, यह हमारे जीवन के लिए जितना जरूरी है, कम से कम शहरों-महानगरों में उतना ही हमारी दिनचर्या के लिए अभिशाप की तरह सामने है। यह मौसम हममें से कई लोगों के लिए खुशियां लाता है, लेकिन उससे ज्यादा यह बहुत सारे लोगों के लिए दुख का सबब भी बन जाता है। हर साल मुंबई या चेन्नई जैसे शहरों में बारिश तमाम लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त कर देती है। हालत यह हो जाती है कि कई बार लोगों को अपने घर छोड़ कर भी अलग स्थान पर रहने के लिए भागना पड़ता है। जो गांव या शहर नदियों और समुद्र के आसपास हैं, उन्हें तो हर बारिश में जान-माल का नुकसान उठाना पड़ता है। हालांकि सब कुछ जानते हुए वे इस कठिनाई का सामना डट कर करते हैं, क्योंकि यह उनकी मजबूरी भी है। दरअसल, वे हमेशा के लिए अपने घरों को छोड़ कर भाग नहीं सकते हैं। अकेले उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि ऐसे बहुत से गांव-शहर हैं, जहां पर बरसात राहत पहुंचाने से ज्यादा तबाही मचा रही है। या फिर यों भी कह सकते हैं कि वह अपना गुस्सा दिखा रही है कि क्यों हम उसकी प्रकृति को बाधित करने की कोशिश कर रहे हैं। अब न तो कहीं जंगल बचे हैं और न ताल-तलैया और कुएं, जहां पानी इकट्ठा हो सके।

हमारे घर के पीछे कभी एक बहुत बड़ा तालाब था, जहां बरसात का पानी इकट्ठा होता था। वह हमारे लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ था, हम और हमारे घर सुरक्षित रहे। लेकिन आज वही तालाब गंदे नालों के पानी का कुंड बन कर रह गया है। हमारे घर के पास में ही एक निजी स्कूल ने उस तालाब के काफी बड़े हिस्से को मिट्टी से पाट कर उस पर निर्माण करा लिया है। जो हिस्सा बचा है, उसमें आधे बाजार की गंदगी बह कर आती है। अब तो हम उस तालाब को तालाब कम और बीमारी फैलाने वाला ठिकाना ज्यादा कहते हैं।
बरसात के मौसम में जहां किसान यही उम्मीद करते हैं कि ऐसी बारिश हो जिससे हमारी फसल अच्छी हो, वहीं उस तालाब के आसपास रहने वालों का आधा मन बरसात के दिनों में तालाब पर ही लगा रहता है। लोग बस यही दुआ करते हैं कि बारिश हो तो ऐसी जो उस तालाब में समा जाए, क्योंकि अगर एक दिन भी जोर की बारिश होती है तो वह तालाब भरने की कगार पर आ जाता है। ऐसा कई बार हुआ है, जब बहुत से लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है। मगर अतिक्रमण करने वालों को यह समझ में नहीं आता कि इस गंदगी से पैदा होने वाली बीमारी का शिकार स्कूल के बच्चे भी हो सकते हैं।

सिर्फ हमारे घर के पास ऐसा तालाब नहीं है जो अब मरने की कगार पर है। बल्कि ऐसे बहुत से गांव हैं जहां पर ऐसे तालाबों को गंदगी जमा करने का ठिकाना बना दिया गया और वह आज लोगों को बीमार कर रहा है। विडंबना यह है कि सब कुछ तथ्य के रूप में सामने होते हुए भी आसपास के लोगों को ये बातें नहीं समझ में आतीं। हमारी सरकार भी शायद यही समझती है कि यह तो प्राकृतिक आपदा है, इस पर हमारा कोई जोर नहीं हैं। यानी तालाबों की मौत और उनके गंदगी का ठौर बनने का खमियाजा सभी भुगत रहे हैं, लेकिन सब अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहते हैं। यह दलील सही लगती है कि सरकार हर जगह नहीं पहुंच सकती। लेकिन यह भी सही है कि सरकार ने हर गांव के लिए एक ग्राम-प्रधान की व्यवस्था की है, जिसकी जिम्मेदारी है कि वह स्थानीय सवालों को निपटाने की कोशिश करे। लेकिन वह सब कुछ कागज पर करके अपना काम पूरा हो गया मान लेता है। कुछ मुखिया ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए गांव के प्रधान बनते हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं हमारे देश में अपने स्वार्थ के लिए समाज के सेवक बनाते हैं, पर असलियत में वे हमारे समाज की नहीं, बल्कि अपनी सेवा करते हैं।

आजकल बरसात के बाद के मौसम के प्रकोप से लोग इतना परेशान हैं कि सब तरफ बीमारी की दहशत छाई हुई है। लेकिन इसकी वजह आखिर क्या है, सिवाय इसके कि हमने अपने तमाम जल-स्रोतों को बेमौत मार डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कभी-कभी हम यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि जो चीज समाज के सहज जीवन के लिए इतनी उपयोगी है, उसके प्रति हमारा समाज इस कदर लापरवाह कैसे हो जाता है!

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