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दुनिया मेरे आगे: विपदा के बाद

केरल के उजड़े घर फिर बसेंगे। जिनको किसी भी तरह की क्षति पहुंची है, वे उबरेंगे। हां, ऐसा होगा। पर समय तो लगेगा। और अब जब उबरने की प्रक्रिया शुरू हुई है, तो फिर केरल के साथ मन-वचन-कर्म सबसे जुड़ने का समय है।

Author September 13, 2018 4:11 AM
पानी ‘विकराल’ भी हो सकता है, यह हमने भली-भांति देखा और जाना इस बार केरल की विपदा से।

प्रयाग शुक्ल

अब जब केरल में स्थिति कुछ सुधर रही है तो यह सोचने के क्षण आ गए हैं कि जब वहां से भयंकर तबाही की खबरें आ रही थीं, हम क्या कर रहे थे। हम पर क्या गुजर रही थी और अब भी क्या गुजर रही है! हम पर यानी उन पर जो उस तबाही से दूर थे और हमारे कमरों में बाढ़ सिर्फ टीवी चैनलों के जरिए थी। निश्चय ही वह हमें पहुंचा रही थी वहां, जहां भयंकर पानी, भू-स्खलन था, टूटे-घिरे-गिरे मकान थे। वह पानी हमें एक पीड़ा तो दे ही रहा था। कुछ करने के लिए उकसा भी रहा था। बहुतेरे तत्पर भी हो गए थे वहां कुछ मदद पहुंचाने के लिए। कई गए भी। यह संतोष की बात है! लेकिन वह केरलीय विकराल पानी, हमारी चिंताओं से दूर हर ओर बढ़ा चला आ रहा था। हां, पानी ‘विकराल’ भी हो सकता है, यह हमने भली-भांति देखा और जाना इस बार केरल की विपदा से।पर्यावरणविद कह रहे हैं कि केरल में भी बहुतेरे वन कई तरह से विनष्ट हुए हैं। कई चेतावनियों की ओर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया।

कहीं-कहीं मनमाने ढंग से बड़े मकानों का निर्माण हुआ है। वे ढहे भी हैं। बार-बार यह दिखाई पड़ा है दुनिया भर में कि प्रकृति से बड़ी कोई ताकत नहीं है। उसकी विनाशकारी लीलाओं के सामने बड़ी से बड़ी टेक्नोलॉजी भी धरी रह जाती है। इसलिए केरल की विनाश लीला के वक्त मैं कुछ कर भले नहीं पा रहा था, पर सोच बहुत कुछ रहा था। मेरी तरह और भी बहुतेरे लोग, बहुत कुछ सोच रहे होंगे। सोचना भी एक क्रिया है। करने लायक काम है। बहुतेरे लोग प्रर्थनाएं भी कर रहे थे।

इससे केरल के लोगों को भी मिला है बल। उन्हें लगा है कि अकेले नहीं छोड़ दिया गया है और देश कई रूप में उनके साथ खड़ा है। लेकिन बहुत से ऐसे भी थे, जिनके पास कई दिनों तक कोई मदद नहीं पहुंच सकी। उनकी पीड़ा ही मुझे आज सबसे अधिक लगती है। देर-सबेर सहायता उन तक भी पहुंची। पर उस देरी की कल्पना कितनी भयावह है। सलाम सेना के उन जाबांजों की टुकड़ियों को, विभीषिका से रक्षा करने वाली टीमों को। सलाम कि वे पहुंची ही नहीं, कई बार अपनी जान जोखिम में डाल कर लोगों की जान बचार्इं। न जाने कितनी सच्ची कहानियां इस बीच बलिदानी भावना की सामने आई हैं और आगे वर्षों तक आती रहेंगी। प्रेरक कहानियां। हां, प्रेरक कहानियां भी ऊर्जा देती हैं।

केरल बहुतों की तरह मेरे भी प्रिय प्रदेशों में है। कई लेखक-अनुवादक मित्र वहां मेरे भी हैं। कई बार जाना हुआ है। कभी बच्चों के लिए एक कविता लिखी थी- ‘केरल के केले/ केरल का पानी/ केरल की नावें/ लंबी पुरानी/ केरल के हाथी/ केरल के चावल/ केरल की नदियां/ केरल के बादल/ है इनकी लंबी लंबी कहानी/ केरल के केले/केरल का पानी।’ उस केरल में जिसकी नावों, बसों में बैठ कर कई बार यात्रा की है, केरल के भीतर; और उसकी नदियों-झीलों का जल-स्पर्श किया है। देखे हैं उसके कमल ताल, कालिकट का समुद्र तट, कोवालम बीच। जानी है उसकी वे हवाएं, जिनसे नारियल वृक्ष हिलते हैं, जाना है उसका हिंदी प्रेम, आतिथ्य-भाव, देखी हैं उसकी कलाएं और ‘डूबा’ हूं कथकली के मेकअप और कथकली नृत्य-रूप में। कावलम नारायण पणिक्कर के नाटक हों, तकषि शिवशंकर पिल्लई, मोहम्मद बशीर, ओवी विजयन, एमटी वासुदेवन नायर का कथा संसार हो, कुमार आशान की, अय्यप्पा पणिकर की कविताएं हों, अरविंदन, अडूर गोपाल-कृष्णन की फिल्में हों और जिस प्रदेश की विभूतियों की सूची बहुत लंबी हो, उस प्रदेश की विपदा के समय मुझे उन विभूतियों के कामकाज की और अधिक याद आती है।

केरल के उजड़े घर फिर बसेंगे। जिनको किसी भी तरह की क्षति पहुंची है, वे उबरेंगे। हां, ऐसा होगा। पर समय तो लगेगा। और अब जब उबरने की प्रक्रिया शुरू हुई है, तो फिर केरल के साथ मन-वचन-कर्म सबसे जुड़ने का समय है। जीवन पहले है, कलाएं उसी से निकलती हैं। लेकिन केरल की कारीगरी, हस्तशिल्प, कलाएं, फिर सब फलें-फूलें, उनकी भी चिंता की जाएगी, ऐसी कामना करता हूं। केरल साक्षर है, साहसी है। केरल के लोगों की राजनीति में, साहित्य और कलाओं में गहरी दिलचस्पी है। वहां वाद-विवाद को अच्छा माना जाता रहा है। उम्मीद है, उसकी जो क्षति हुई, उसके कारणों का निराकरण भी केरल करेगा। केरल में सभी धर्मों और आस्थाओं के लोग हैं और ये एक बड़े सम्मिलित परिवार की तरह रहते आए हैं। विपदाएं इसका भान और अधिक करा देती हैं कि दुख की घड़ी में, विपदा के क्षणों में, तबाही के वक्त मनुष्य एक दूसरे को मनुष्य की तरह ही सबसे पहले पहचानता है। केरल की तबाही में भी यही दिखाई पड़ा है। बनी रहें केरल की लंबी नावें, केरल के चावल और मसाले। नारियल, हाथी, केले, बादल भी। पर नहीं, वे इस रूप में अब केरल के आसमान में कभी न आएं। आएं, बरसें, पर इस तरह नहीं..!

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