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दुनिया मेरे आगेः जिजीविषा की राह

ग्रामीण स्तर पर समाज को सामुदायिक और सरकार के सहयोग से बहुउद्देश्यीय भवनों के निर्माण की जरूरत है। हालांकि कुछ गांवों में सामुदायिक भवन बने हैं, लेकिन वे नाकाफी लगते हैं।

Author Published on: June 6, 2020 3:01 AM
फिलहाल दुनिया जिस संकट से दो-चार है, उसमें बहुत से देशों के लोगों ने अपने आपको घरों में कैद कर लिया है।

जगमोहन चोपता

मेरा इस पर गहरा यकीन है कि आपदाएं या महामारी से सिर्फ तबाही नहीं होती। वह मौत के सैलाब के साथ-साथ लाती है मनुष्य में जिंदा रहने का हौसला या जिजीविषा। इन तमाम खतरों से निपटने का साहस और उससे भी अहम कि हर आपदा के बाद वह इनको मात देने के नए-नए तरीकों को ईजाद करने लगता है। आप दुनियाभर में इस तरह की आपदाओं के इतिहास को खंगाल कर देख लीजिए। इनके गहरे शोक के बीच से ही मनुष्य ने नई राह के गीत रचे हैं। मनुष्य ने बार-बार इनसे अपने आपको और बेहतर करने में लगाया है। दुनिया में जब-जब ऐसी आपदाएं या महामारी आई, तब तब वहां के नागर समाज ने अपने लिए सुरक्षा और रखरखाव के नए कीर्तिमान भी रचे हैं।

फिलहाल दुनिया जिस संकट से दो-चार है, उसमें बहुत से देशों के लोगों ने अपने आपको घरों में कैद कर लिया है। गाड़ी के पहिए से लेकर कारखानों की चिमनियों से उगलता धुंआ तक, सब कुछ थम-सा गया है। चारों तरफ डर हावी लग रहा है। हालात में तेजी से उतार-चढ़ाव हो रहे हैं, लेकिन इस बीच मनुष्य की जिजीविषा और जीवट का जो आलम दिख रहा है, उससे बहुत कुछ समझने को मिल रहा है। जितने लोगों ने अपनी रोजी-रोटी छिन जाने के बाद अपने घर की ओर वापसी का रुख किया, उनकी व्यथा गमगीन करने वाली हैं। उपेक्षा, भय, हताशा और मौत की आशंका ने मानवीयता को तार-तार कर रख दिया है। हालांकि इसी बीच बहुत-सी कहानियां मानवीयता को बचाने और बढ़ाने की भी आ रही हैं, लेकिन वे बड़े जख्म के आगे बौनी साबित हो रही हैं।

हालांकि मेरा मानना है कि मौजूदा संकट के दौर के बाद मनुष्य अपने जीवट से जीवन के नए अध्याय एक बार फिर रचेगा। बस इसके लिए हमें हर स्तर पर सोचने की जरूरत है। सवाल है कि वे वैकल्पिक राहें क्या होंगी! पूरे देश में बड़ी आबादी शहरों से गांवों की ओर लौट रही है तो ऐसे में सबसे पहले उनके रोजगार की ओर ध्यान देना प्राथमिक होना चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वालों की योग्यताओं और हुनर का उपयोग गांव स्तर पर हो पाए, इसके लिए सोचने की जरूरत है। गांव स्तर पर कुटीर उद्योगों को लगाने और कच्चे माल के लिए सामुदायिक खेती और उद्यम को शुरू करने की ओर ध्यान दिया जा सकता है। गांव स्तर पर वन-उपज को बढ़ाने के लिए वृक्षारोपण, नए तरीको से खेती और अन्य अवसरों को उपलब्ध कराने की जरूरत है। उदाहरण के लिए उत्तराखंड में छोटी-छोटी जोत और खेतों का बिखराव जैसा है, वहां सामुदायिक खेती और बाजार तक पहुंच के लिए नए तरीके अपनाए जा सकते हैं। खेती किसानी से लगे लोगों का मंडी तक सामानों की त्वरित उपलब्धता के लिए जरूरी साधनों की उपलब्धता की ओर देखा जा सकता है।

इस दौर में सरकारी अस्पतालों की जो तस्वीर सबके सामने आई है, उसमें इसके पुनर्निर्माण की सख्त जरूरत महसूस होती है। हमारे अस्पतालों को जितना जल्दी हो सके मानव संसाधन और भौतिक संसाधनों से लैस करना होगा, जिनमें गंभीर बीमारियों की जांच से लेकर उनके उपचार तक की पूरी सुविधा हो। इन अस्पतालों तक पहुंचने के लिए पर्याप्त वाहन और सड़कों से इनका जुड़ाव सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

ग्रामीण स्तर पर समाज को सामुदायिक और सरकार के सहयोग से बहुउद्देश्यीय भवनों के निर्माण की जरूरत है। हालांकि कुछ गांवों में सामुदायिक भवन बने हैं, लेकिन वे नाकाफी लगते हैं। गांव की आबादी के हिसाब से ऐसे बहुउद्देश्यीय भवनों का निर्माण होना चाहिए, ताकि महामारी या आपदा के समय लोग इसमें रह पाएं। इसमें आवास और भोजन की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी। इन भवनों को भूकंपरोधी होने के साथ ही आधुनिक सुविधाओं से लैस होने चाहिए। अगर गांव स्तर पर ऐसे भवनों का निर्माण हो जाता है तो यह कठिन समय के अलावा सामान्य परिस्थितियों में भी उपयोगी साबित होंगे।

वर्तमान में सूचना और तकनीकी ने जिस तरह अपने पांव पसारे हैं, उससे बहुत से काम आसान हुए हैं। हर गांव में संचार के साधनों की उपलब्धता हो, ऐसी कोशिश की जानी चाहिए। इंटरनेट से हर अस्पताल, किसान और लघु उद्यमों को करने वाले लोगों से जोड़ा जाए, ताकि इनके माध्यम से चिकित्सा, रोजगारोन्मुखी जनजागरूकता और सहायता त्वरित गति से उपलब्ध हो पाए। इसके अलावा, हर स्तर पर शहरों से गांव लौटे लोगों का आंकड़ा और ब्योरा तैयार किया जा सकता है, ताकि यह पता लग पाए कि गांवों में किस तरह के मानव संसाधन की उपलब्धता, कच्चे माल की उपलब्धता का उपयोग या इसकी संभावना है। इस मानव संसाधन का गांव में रहते हुए कैसे बेहतर उपयोग हो पाता है, इसके लिये शोध, योजना निर्माण और प्रबंधन के लिए तंत्र तैयार करने की जरूरत है। अगर इस तरह के प्रयास पूरी ईमानदारी के साथ होते हैं तो तय मानिए की एक आपदा जैसी महामारी से उबरने के साथ ही हमारे गांवों की तस्वीर भी बदल जाएगी।

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