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दुनिया मेरे आगे: ध्वनियों का जादू

अब हर रोज की शाम यह दर्ज करने लगी हूं कि आज के दिन किन एहसासों ने दिल-दिमाग को घेरे रखा और उसके क्या भावी असर होंगे। रोजमर्रा की जिंदगी के उतार-चढ़ाव के बीच प्रकृति अपनी गति से अगले पल में प्रवेश करती है।

Author Updated: January 15, 2021 3:49 AM
sunसांकेतिक फोटो।

कविता भाटिया

उस दिन बालकनी में उषा की किरणें आकाश से धीरे-धीरे उतर कर सर्दियों की ठंडक को कम करने के अपने अभियान में अभी जुटी ही थी कि कुछ पक्षियों की मिली-जुली चहचहाहट कानों में रस घोलने लगी। अभी समाज के दैनिक क्रियाकलाप शुरू नहीं हुए थे, इसलिए वे मीठी आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं। जिस दौर में हर ओर जीवन की भूख में लोग उम्मीद के नए सिरे तलाश रहे हों, वैसे में प्रकृति से मिलने वाले ये जिंदा एहसास ही लगते हैं।

बहरहाल, इन मीठी आवाजों से मन-प्राण प्रफुल्लित हो उठा और स्मृति में कविवर पंत की कविता गूंज उठी- ‘प्रथम रश्मि का आना रंगिणी, तूने कैसे पहचाना/ कहां-कहां हे बाल विहंगिनी पाया तूने ये गाना’। अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए सृष्टि के हर चेतन प्राणी के पास वाक् क्षमता है। वाक् से वाणी और वाणी से ही भाषा का निर्माण होता है।

पेड़ के पत्तों की सरसराहट… नदी के जल की कल-कल… कीटों की भिनभिनाहट और गुनगुन… बारिश की बूंदों की टप-टप… धुआं उड़ाती गाड़ियों की पों-पों.. घड़ी की टिक-टिक… मोबाइल की रिंगटोन… रेडियो या फिर टीवी पर बजता संगीत..! और भी बहुत कुछ। रोजमर्रा के जीवन में हम अनेक ध्वनियों को सुनते हैं। हमारा संवेदनशील जागरूक तंत्र इन सभी ध्वनियों को समझता है और उनके अर्थ का अनुमान भी लगा लेता है।

बोलना और सुनना- ये दो शक्तियां प्रमुख है। भाषिक दक्षता के चार कौशलों- श्रवण, वाचन, पठन और लेखन में भी वाक् प्रमुख है। वाक् को सबसे अहम् शक्ति माना गया है। अपनी वाणी के जरिए वक्ता को श्रोताओं के दिल तक अपनी बात पहुंचाने में मदद मिलती है। वाणी की मधुरता बोलने और सुनने वाले के आग्रह पर निर्भर करती है।

साथ ही बोलने में आरोह-अवरोह का स्तर बात को प्रभावी बनाता है। संत कबीर ‘औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय’ कह कर उस मधुर वाणी को श्रेष्ठ मानते हैं, जो औषधि की तरह है, क्योंकि सत्य है कि मधुर वाणी से ही सामाजिक प्रेम का विस्तार होता है, जबकि सुनना हमें संवेदनशील, जीवंत और सक्रिय बनाता है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी लेखक अर्नेस्ट हेमिंग्वे कहते हैं कि ‘मैं सुनना पसंद करता हूं। ध्यान से सुनने के परिणामस्वरूप मैंने बहुत कुछ सीखा है।’

दरअसल, सुनने और बोलने का संबंध बड़ा गहरा है। कहने और सुनने को लेकर हिंदी फिल्मों में अनगिनत अर्थपूर्ण मधुर गीत रचे गए हैं। कहा गया है कि बोलने से पहले सोचो, क्योंकि बोला गया कथन और कमान से निकला तीर कभी वापस नहीं आता। लेकिन प्रश्न है कि क्या हम कही गई सभी ध्वनियों या आवाजों को सुन और समझ पाते हैं! अब तक हमने यही पढ़ा-जाना है कि ऋषि-मुनि अंतर्वैयक्तिक संचार पर बल देते थे, जिसमें व्यक्ति के स्वयं के आत्मविश्लेषण पर बल था। विश्वसनीय सलाहकार या परामर्शदाता के मूलभूत सिद्धांतों में भी बताने और बोलने से अधिक दूसरे के कहने और अपने जानने को महत्त्वपूर्ण माना गया है।

हम कितना सुनते हैं, वह जरूरी नहीं। हम कितना ध्यानपूर्वक सुनते हैं, वह जरूरी है। मां अपने शिशु के रोने के ढंग से ही उसकी जरूरत को जान कर झट उसके पास दौड़ आती है तो अपनी मनोवृत्ति और रुचि के मुताबिक शास्त्रीय संगीत या पॉप संगीत का सुनना हमें जगत के कोलाहल से दूर सुकून की रमणीय दुनिया में ले जाकर आत्मिक शांति प्रदान करता है।

आज की व्यस्त जीवनशैली में हम अधिकाधिक आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं और संचार की मायावी शक्तियों की गिरफ्त में होने के कारण वास्तविकता को विस्मृत कर जब आभासी दुनिया में रमण कर रहे हैं तो क्या बेबसी, कातरता, विवशता और मूक की भाषा को हम सुन और समझ पा रहे हैं?

इस नई दुनिया में अपनी जगह खोजते या बनाते हुए हम वास्तविक जीवन और उसकी जरूरतों को तो नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं या उसे दरकिनार कर रहे हैं? जहां वास्तव में आवाज पहुंचनी चाहिए, क्या वहां हमारी आवाज पहुंच पा रही है? निदा फाजली की गजल है- ‘मुंह की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन, आवाजों के बाजारों में, खामोशी पहचाने कौन’! सच ही तो है। हम तो अभी आवाज सुनना भी नहीं सीख पाए हैं तो खामोशी भला कैसे सुन-समझ पाएंगे! निरंतर आगे निकलने की होड़ में हम कितनी ही बार अपने आसपास की कितनी ही आवाजों और ध्वनियों को अनसुना कर देते हैं।

आज के व्यावसायिक दौर में रुदन, आंसू, मुस्कुराहट और हंसी के ठहाके भी बिकाऊ हैं तो ऐसे में जरूरत है चारों ओर फैली भ्रमित कर देने वाली आवाजों से बचते हुए कभी जरा ठहर कर हम उन आवाजों को सुनें-समझें और अपनी मधुर वाणी से किसी के दर्द को कम कर अपनी संवेदना का लेप लगा इंसानियत का परिचय दें। ‘जलती सिकता का यह मग, बन जा करुणा की तरंग’!

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