ताज़ा खबर
 

तेजाब का दंश

कुछ ही दिन पहले बनारस में रूस की एक महिला पर एक युवक ने तेजाब फेंक दिया, क्योंकि वह उसकी मर्जी के खिलाफ अपने देश लौट रही थी। ऐसे मामलों की फेहरिस्त और.
Author नई दिल्ली | November 17, 2015 21:43 pm
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

कुछ ही दिन पहले बनारस में रूस की एक महिला पर एक युवक ने तेजाब फेंक दिया, क्योंकि वह उसकी मर्जी के खिलाफ अपने देश लौट रही थी। ऐसे मामलों की फेहरिस्त और लंबी होती जा रही है। बिहार के सिवान जिले में तेजाब के हमले ने सोलह साल की तूबा के चेहरे रंगत बदल डाली, उसकी एक आंख नहीं रही, जुबान चली गई। आज सांस लेने के लिए उसकी नाक में एक नली लगी है। काफी मशक्कत के बाद डॉक्टर भोजन में सिर्फ तरल की गुंजाइश बना पाए। अब दुपट्टा और पिता हमेशा तूबा के साथ रहते हैं। फरीदाबाद की इक्कीस साल की रूपा के बाजुओं से काट कर साटे गए मांस से भी चेहरा गढ़ा नहीं जा सका। पैंतीस वर्षीया नसरीन की गर्दन, कंधा और चेहरे का एक हिस्सा हमेशा दुपट्टे से ढंका रहता है। ऐसी लड़कियों-महिलाओं का कसूर महज यह था कि उन्होंने एक थोपे जाने वाले फैसले के तौर पर मांग के खिलाफ अपना ‘नहीं’ दर्ज किया और इसके बदले उन पर उनसे प्रेम करने का दावा करने वाले पुरुषों ने जिंदगी भर का दर्द, तड़प, जलन, बेगानगी और बेबसी लाद दी।

अब तक ऐसी खबरें पढ़ कर ज्यादा से ज्यादा पीड़ितों से सहानुभूति जताती रही थी, कभी खुद को तेजाबी हमले की शिकार महिला की जगह रख कर नहीं देखा था। लेकिन हाल में ‘राइड फॉर जेंडर फ्रीडम’ की तख्ती लगाए एक साइकिल सवार को कुछ लोगों से बात करते देखा तो वहीं मैं भी रुक गई। राकेश कुमार सिंह नाम के उस शख्स ने स्त्री-पुरुष के बीच बराबरी की बातों के साथ जब तेजाबी हमलों की शिकार महिलाओं के दुखों की चर्चा शुरू की तो एकबारगी मन कांपने लगा था। आखिर कैसे यह संभव है कि किसी लड़के के प्रेम या शादी के आग्रह के बाद कोई लड़की सिर्फ अपनी इच्छा जताते हुए इनकार कर देती है और लड़के ने जिससे प्रेम करने का दावा किया होता है उसकी समूची जिंदगी को त्रासदी का दूसरा नाम बना देता है!

सवाल है कि एक लड़की का इनकार लड़के की नजर में गुनाह कैसे हो गया? इस तरह की हैवानियत या दरिंदगी उसके भीतर कहां से आई? पिछले बीस महीनों से इस तरह के कई सवालों से साथ राकेश साइकिल से घूम-घूम कर देश भर में लोगों से बात करते हैं, उनके सामने कुछ सवाल रखते हैं, कई बार रो भी पड़ते हैं और लोगों के दिमाग को झकझोर कर आगे बढ़ जाते हैं। दो-तीन मिनट की बातचीत में पूछने पर उन्होंने जो बताया उसके मुताबिक पिछले साल पंद्रह मार्च को तमिलनाडु से शुरू कर अब तक साइकिल से ही वे कई राज्यों में ग्यारह हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर कर चुके हैं। इस बीच अब तक कई सौ जगहों पर करीब दो लाख लोगों से संवाद किया है। उनका यह जुनून किसी भी व्यक्ति के भीतर संवेदना का एक ज्वार पैदा करता है।
जाहिर है, हमारे पितृसत्तात्मक समाज ने एक लड़के के दिमाग में जिस तरह की ग्रंथियां भरी हैं, उसमें स्त्री के इनकार को पुरुष सत्ता के सामने एक चुनौती और खतरा माना जाता है। इसके बाद स्त्री पर आधिपत्य कायम करने के लिए कई तरह के रास्ते अपनाए जाते हैं। इसी में लड़की के साथ छेड़खानी, मारपीट या उसकी हत्या, बलात्कार से लेकर तेजाब से हमला कर उसके चेहरे और शरीर को जिंदगी भर के लिए बर्बाद कर देना भी है।

सही है कि न पूरा समाज दरिंदा है और न दरिंदगी के साथ है। लेकिन यह भी सच है कि ऐसे कुंठित लोगों के साथ नहीं होते हुए भी आमतौर पर लोग तब तक खामोश ही रहते हैं, जब तक अपने परिवार की किसी स्त्री या लड़की के खिलाफ कोई अपराध नहीं होता। दरअसल, बीते डेढ़-दो दशकों के दौरान व्यक्तिवाद एक दर्शन की तरह समाज पर हावी हुआ है। परिवार से लेकर स्कूल और कार्यस्थल तक व्यक्तिवाद का पाठ सीखने-सिखाने की अघोषित प्रणाली विकसित हुई है। ऐसे में हमारे परिचितों का दायरा घटा है। वैसे रिश्तेदारों और मित्रों की गिनती तेजी से गिरी है, जिनसे सिर्फ हालचाल जानने के लिए फोन पर बात या मुलाकात होती है। वास्तव में बेगानापन बना रह जाता है।

यही वजह है कि जो लोग स्त्रियों के साथ बढ़ते दुर्व्यवहार की घटनाओं के प्रति संवेदनशील हैं, वे भी इसका स्थायी हल ढूंढ़ने के बजाय छोटे रास्ते की खोज में लगे दिखते हैं। सवाल है कि जब चारों ओर घनघोर स्त्री विरोधी माहौल व्याप्त है, चारदिवारी चंद फीट और ऊंची करके, सुरक्षाकर्मी तैनात करके या खुद बहन-बीवी-बेटी के साथ साए की तरह चिपक कर स्त्री सापेक्ष माहौल कैसे तैयार किया जा सकता है! मुझे लगता है कि एक बार हमें अपने नितांत निजी जीवन को थोड़ा खोलना होगा। जरा उदार और सार्वजनिक होना होगा। जमाने और आसपास के प्रति सजगता और अपनी संवेदनशीलता मुखर करनी होगी। अगर ऐसा हो पाता है तो हमारा समाज तेजाब या पुरुष ग्रंथि की आग में झुलसी तमाम महिलाओं के दुख को कम करने की ओर कुछ कदम बढ़ सकेगा। (स्वाति)

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.