दहेज से परहेज

दहेज कोई आज या कल की सामाजिक बुराई नहीं। यह प्राचीन काल से चली आ रही है

सांकेतिक फोटाे।

कमलेश भारतीय

दहेज कोई आज या कल की सामाजिक बुराई नहीं। यह प्राचीन काल से चली आ रही है और ऋषि मुनि भी इससे अछूते नहीं रहे थे। ‘अभिज्ञान शकुंतलम्’ में ऋषि भी अपने सामर्थ्य के अनुसार शकुंतला को कुछ अर्पित करते हैं, ऐसा वर्णन है, जबकि शकुंतला की शादी राजा से हो रही थी। यानी गरीब हो या अमीर दूल्हा, किसी को दहेज लेने से कोई परहेज नहीं था। मगर जो अर्पण खुशी-खुशी किया जाता था, वह धीरे-धीरे एक ‘आवश्यक बुराई’ बनता चला गया। आधुनिक काल में यह बहुत भयंकर रूप ले चुका है। मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास हों या आधुनिक कथाएं, सबमें दहेज का कोई न कोई प्रसंग आ ही जाता है।

नए-नए धनाढ्य वर्ग ने इस बीमारी को और फैलाने तथा महामारी बनाने में मदद की है, जो विवाह समारोह को इतना खर्चीला बनाने में लगे हैं कि आम आदमी वैसा विवाह समारोह करने की सोचते ही कांप जाता है। आपको याद है, हरियाणा के गुरुग्राम में एक राजनेता की बेटी की शादी पर भव्य पंडाल लगा कर शानदार भोज की? बड़ी चर्चा रही थी इस शादी की। राजनेताओं के बेटे-बेटियों की शादियां बहुत भव्य होती हैं और इनके तो निमंत्रण-पत्र के साथ गिफ्ट भी भेजे जाते हैं। वैसे भी शगुन और शादी के समय भारी दहेज के प्रदर्शन का रिवाज बहुत पुराना है।

एक ऐसा समाज भी है हरियाणा में, जहां शादी के वक्त सारी चीजों की सूची सबके बीच पढ़ी जाती है, ऊंचे स्वर में और सबके हस्ताक्षर लिए जाते हैं, ताकि अगर आने वाले समय में कोई विवाद हो तो यह सूची दिखा कर सामान वापसी की मांग आसान हो। मोटरसाइकिल, कारें तक ऐसे प्रदर्शित की जाती हैं जैसे शोरूम वाले माडलों से करवाते हैं।

कभी आपने सुना था ‘प्री-वेडिंग शूट’? अब यह बाकायदा प्रचलन में है और यह पेशे का रूप ले चुका है। याद आता है कि कभी विवाह समारोह के लिए पूरे गली-मोहल्ले के लोग जुटते थे और केले के तने और आम के पत्तों से मंडप सजाए जाते थे, रंगीन कागजों से बनाई झंडियों से पंडाल सजाए जाते थे, जो मोहल्ले के लोग ही बनाते थे और पहले बाराती खाना खाते थे और बाद में घराती। बल्कि खुद आस-पड़ोस के लोग बड़े प्यार और अदब से बारात को खाना परोसते थे। अब तो न पता चले बाराती का और न घराती का कि कौन है, किस तरफ से है।

पहले आओ, पहले खाओ। शगुन दो और चलते चलो। न किसी ने दूल्हा देखा और न देखी दुल्हन। बस, हो गया एक ‘इवेंट’। कोई नहीं रुकता फेरे होने तक, सिवाय निकट संबंधियों के। महानगरों में मुफ्तखोर लोग शादी के भोज में न घुस जाएं, इसके लिए वर-वधू पक्ष के लोग शुरुआत में ही खड़े रहते हैं। विवाह समारोह के लिए बड़े-बड़े वैंक्वेट हाल बुक करवाने की होड़ लग जाती है। तारों की छांव में विदाई भी कब हो जाती है, पता नहीं चलता किसी को। ऐसे हो गए हैं विवाह समारोह।

एक बड़ा आयोजन और फिर कितना देन-लेन? किसी को कानों-कान खबर तक नहीं होती। सिर्फ तब होती है, जब वर पक्ष ऐन मौके पर कुछ और महंगी शर्तें रख देता है और वधू पक्ष शादी के बजाय बारात लौटाता है और बारात का स्वागत थाने में होता और वहां मिलन नहीं दे-लेकर विदाई समारोह होता है। ऐसा ही एक वाकया चरखी दादरी में हुआ था, जब दुल्हन ने ऐन विदाई के समय कार की मांग किए जाने पर बारात लौटा दी थी। ऐसी साहसी युवतियां हों तो फिर क्या करेगा दहेज दानव?

अभी हरियाणा के एक सहायक प्रोफेसर ने अपने विवाह समारोह में शगुन के तौर पर मिले ग्यारह लाख रुपए लौटा कर संदेश दिया कि दहेज अभिशाप है और इसका विरोध होना चाहिए। ऐसे उदाहरण इतने हो जाएं कि यह समाज को बदलने की भूमिका निभाएं। एक बहुत रोचक घटना पढ़ी थी, राजस्थान की। बारात को रेलगाड़ी से वापस जाना था, तो वर पक्ष की ओर से सबको जिम्मेदारी दी गई कि क्या-क्या चीज किसे उतारनी है।

बस, रेल रुकी और दहेज का सामान उतारा गया। जब रेल चली गई तब पता चला कि दुल्हन तो उसी रेल में रह गई, क्योंकि उसे उतारने की जिम्मेदारी किसी को सौंपी ही नहीं गई थी। यानी साफ बात कि दुल्हन से दहेज की फिक्र ज्यादा थी, तभी दुल्हन को उतारने की कोई जिम्मेदारी नहीं थी। वह दिन कब आएगा जब समाज दुल्हन को ही दहेज मानने लगेगा और बेटियों के जन्म को अभिशाप नहीं माना जाएगा। कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराई भी इसी से पैदा हुई है और इसके साथ ही मिट सकती है।

पढें दुनिया मेरे आगे समाचार (Duniyamereaage News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट