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दुनिया मेरे आगेः कितनी परतें

एक मां का महत्त्व इसीलिए ज्यादा समझा जाता है, उसके प्रति अपनी भावनाएं प्रकट की जाती हैं कि अपने बच्चों और परिवार के लिए वही त्याग करती रहे, अपनी इच्छाओं का बहिष्कार करती रहे।

Author September 26, 2018 4:49 AM
प्रतीकात्मक चित्र

आरती मंगल

सामने चल रहे टीवी पर यह गीत बज रहा था- ‘तू कितनी प्यारी है, तू कितनी भोली है… प्यारी प्यारी है… ओ मां..!’ इससे गीत को सुनने वाले शायद सभी लोग भावुक हुए होंगे, उनकी आंखें नम हुई होंगी। यकीनन मां जन्म देने के बाद अपनी फिक्र छोड़ कर अपने बच्चों को पालती-पोसती है, उसकी सारी चिंताओं की दूर करते हुए। हम सब इन सब बातों का आभास करते हुए अपनी मां के प्रति गद्गद हो जाते हैं और उसके लिए कुछ भी कर गुजरने का दावा करते हैं, भले ही किन्हीं खास मुद्दे पर हम गलत ही क्यों न कर रहे हों। सही या गलत को पूरी तरह भूल कर सिर्फ इसी वजह से किसी खास इंसान या उसके ओहदे को महिमामंडित करना और उसे नायक बना देना इंसान की विवेकशीलता को कठघरे में खड़ा करता है। दूसरी ओर, इसके साथ-साथ इस तरह महिमामंडित किए गए इंसान के ऊपर भी यह ऐसी अपेक्षाओं का बोझ डाल देता है, जिससे निकलना उसके लिए कई बार बहुत मुश्किल हो जाता है।

एक मां का महत्त्व इसीलिए ज्यादा समझा जाता है, उसके प्रति अपनी भावनाएं प्रकट की जाती हैं कि अपने बच्चों और परिवार के लिए वही त्याग करती रहे, अपनी इच्छाओं का बहिष्कार करती रहे। इसी के चलते मां को एक सामान्य इंसान से ऊपर और समाज में अन्य संबंधों से अलग खास रूप में देखा जाता है। उम्मीदों का यह बोझ मां को अक्सर ही अपनी पसंद से कुछ करने या फिर जरूरत की चीजें लेने को प्राथमिकता देने के बजाय बच्चे को उपयुक्त वक्त न दे पाने पर आत्मग्लानि के भाव में डाल देता है। मां के रूप में कितनी ही औरतों को मैंने अक्सर इसी भाव से ओतप्रोत देखा है। हमें यह समझने की जरूरत नहीं लगती है कि मां भी पहले एक इंसान है, उसके भी अपने सपने, अपनी जरूरतें और इच्छाएं हैं। उसकी तमाम इच्छाएं और जरूरतें उसके महिमामंडन के शोर में दरकिनार कर दी जाती हैं।

आमतौर पर अगर देखा जाए तो यकीनन मां या पिता को, या फिर परिवार में रहते किसी भी सदस्य को आपस में एक दूसरे से लगाव रहता ही है। खासतौर पर माता-पिता ने जिन बच्चों को जन्म के साथ से ही पाला-पोसा हो, तो उसके साथ ज्यादा लगाव होना स्वाभाविक है। लेकिन क्या यह लगाव और प्रेम का दावा हर स्थिति में स्वार्थों से रहित होता है? मेरा मानना है कि ऐसा नहीं भी होता है। अगर स्वार्थ जैसे सख्त शब्द से संबोधित न भी करें तो जन्म देने और पालने-पोसने के बदले बच्चों से की जाने वाली अपेक्षाएं कई बार स्वतंत्रता को नियंत्रित करने जैसी भी हो जाती हैं। भारतीय परिवारों की यह एक सच्चाई है कि बच्चों को एक स्वतंत्र इंसान के तौर पर नहीं देखा जाता, चाहे वे कितने ही बड़े हो जाएं। या तो माता-पिता उनसे उनके पालन-पोषण का हिसाब करते मिलेंगे या फिर उन्हें बच्चा समझ कर उनकी जिंदगी को तय करने वाले फैसले अपने ही स्तर पर लेते रहेंगे।

हालांकि पितृसत्तात्मक ढांचे की वजह से मां की भूमिका निर्णय लेने में कम ही होती है, लेकिन उसकी चुप्पी या अक्सर सहमति से उनके बड़े हो चुके बच्चों के बारे में निर्णय लिए जाते हैं। मसलन, जब झूठी इज्जत के नाम पर अंतरजातीय विवाह करने पर बेटियों को मार डाला जाता है तो उसमें कई बार मां को कोई आपत्ति नहीं होती है। अजन्मे बच्चे का लिंग जांच करवाने के बाद जब पता चलता है कि भ्रूण मादा है तो गर्भपात करवाने में मां की भी सहमति होती है। अपने स्वार्थ की खातिर बेटे की चाह में पूजा-अर्चना भी मांओं के हिस्से ही होता है। हालांकि ऐसा करते हुए मां भी पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था और मानस में निर्मित एक आम इंसान ही होती है।

लेकिन हमारे समाज में मां को श्रद्धा अर्पित करने के भी दोहरे पैमाने निर्धारित हैं। जो महिला शादी जैसी संस्था से इतर अपने चुनाव के तहत मां बनी हो, उसे समाज हेय दृष्टि से देखता है। शहर की बदनाम गलियों में रहने वाली मांओं के लिए भी कोई संवेदना नहीं दिखाई जाती। कमजोर तबकों या फिर मजदूर वर्ग की मां बनी महिलाओं को उच्च वर्ग की मांएं कई बार दुत्कार देती हैं। जब कोई महिला सास बन जाती है और उनकी बहू मां, तो परिवार में दोनों की हैसियत में सामाजिक पद के मुताबिक फर्क होता है। जो औरतें मां नहीं बन सकीं, वे भी उतनी ही इंसान हैं। ऐसे तमाम उदाहरण हैं मां और मांओं को श्रद्धेय मानने के मामले में समाज में प्रचलित दोहरे मापदंडों के। मेरा खयाल है कि हमें यह नकाब उतार देना चाहिए और मां को एक इंसान के तौर पर आदर और प्यार करना चाहिए। यह मां के लिए भी अच्छा है और उनके बड़े होते हुए बच्चों के लिए भी।

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