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दुनिया मेरे आगे: पूर्वाग्रह की परतें

अपने आसपास के लोगों से सुनी हुई बातें आमतौर पर धारणा बन कर हमारे मनोविज्ञान का हिस्सा बन जाती हैं। मेरे पड़ोस में रहने वाले एक महोदय की तीन बेटियां हैं और एक लड़का है। चूंकि पुत्र इकलौता है, इसलिए वह मां-पिता और बहनों, सभी का दुलारा है।

Author Updated: January 19, 2021 5:21 AM
photoसांकेतिक फोटो।

संगीता सहाय

धन-धान्य से परिपूर्ण व्यवसायी उन महोदय के लिए उनका बेटा ही उनके जीवन का केंद्र बिंदु है, जिसका अधिकांश समय बहनों के सान्निध्य में बीतता है और उन्हीं के स्नेहिल छाया में जीवन का पाठ पढ़ने के कारण उसके स्वभाव में कोमलता और भावुकता का समावेश ज्यादा दिखती है। हालांकि यही बात उसके पिता को चिंतित कर देती है।

वे चाहते हैं कि उनका पुत्र रौबदार और मर्दानगी के प्रत्यक्ष गुणों से भरपूर हो और यह उसके आम बर्ताव में झलके। वे उसे ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधा का उपभोग करने और घर से बाहर अपने हमउम्र साथियों के बीच वक्त बिताने, घूमने-फिरने की सलाह देते रहते हैं, क्योंकि उनके अनुसार मर्द घर के बाहर ही अच्छे लगते हैं। घर के भीतर रहने वाला और मां, बहनों और पत्नी के साथ ज्यादा समय बिताने वाला और बात-बेबात भावुकता का प्रदर्शन करने वाला पुरुष कमजोर या ‘मउगा’ कहा जाने लगता है।

दरअसल, किसी पुरुष या लड़के के लिए यह शब्द हमारे समाज, विशेषकर ग्रामीण समाजों में एक प्रचलित शब्द है। इसे भदेस शब्दों के समूह में रखा जा सकता है। सामान्यतया यह उपमा वैसे पुरुषों को दी जाती है, जिनका व्यवहार, स्वभाव, पसंद-नापसंद आदि को पुरुष समाज औरतनुमा मानता है। अगर किसी मर्द के स्वभाव और व्यवहार में कोमलता की भावना अधिक हो, वह फिल्में देखते वक्त, कथा-कहानियां पढ़ते हुए या फिर कोई भी ऐसी घटना, जो उसके मन को छूती है, वैसी बातें अगर उसकी आंखों में आंसू ला देती है या कहें कि वह रो देता है तो उसे उसके आसपास के पुरुष ‘मउगा’ की संज्ञा से विभूषित कर देते हैं।

हालांकि पितृसत्तात्मक मानस से ग्रस्त स्त्रियां भी इस तरह के पुरुषों को कमजोर मान लेती हैं। वैसे लोग भी जो अपने काम के अलावा अपना अधिकांश समय घर में व्यतीत करते हैं, शराब, सिगरेट जैसे दुर्व्यसनों से दूर रहते हैं, अनावश्यक लड़ाई-झगड़े या अन्य असामाजिक गतिविधियों से बचे रहते हैं, महिलाओं से मित्रतापूर्ण और समतामूलक व्यवहार करते हैं और पत्नी के फैसलों और अधिकारों का सम्मान करते हैं, उन्हें भी समाज में कई बार इसी तरह का तमगा दे दिया जाता है। एक बड़ा वर्ग ऐसे लड़कों या पुरुषों को मजाक और हिकारत की दृष्टि से देखता है। उन्हें कमजोर और कमअक्ल की संज्ञा भी दी जाती है। साथ ही उन्हें मर्दानगी से मुक्त मान लिया जाता है।

यह विचित्र है कि एक पुरुष के स्त्रियों के प्रति समानता और संवेदनशीलता के भाव से लैस होने को मर्दानगी के विलोम तौर पर देखा जाने लगता है। इस संदर्भ को ज्यादा गहराई से जानने के लिए यह समझने की जरूरत है कि मर्दानगी को हमारे समाज में किन संदर्भों में देखा जाता है। मर्दानगी का अर्थ है- पौरुष, पुरुषत्व और बहादुरी। यह मर्द शब्द का विशेषण है।

मर्द शब्द का एक अर्थ मर्दन करना, कुचलना, नर, पुरुष आदि होता है। अक्सर हमारे समाज की बनावट में मर्द के खांचे में उसे रखा जाता है, जो किसी की परवाह न करता हो, कुछ भी करके जीत हासिल करना जिसकी आदत हो, जिसे अपनी पत्नी की याद सिर्फ सांझ ढले ही आती हो और जो यह मानता हो कि औरत की भूमिका पति की आज्ञापालक के रूप में ही है।

साथ ही उसका अधिकांश समय घर के बाहर, चौक-चौराहों, शराब और पान की दुकानों, कथित दोस्तों की महफिलों में बीतता हो आदि। समाज का एक बड़ा हिस्सा इन सारे तमगों से विभूषित पुरुष को ही सच्चा मर्द घोषित करता है। ऐसे में उपयुक्त असहज और बनावटी तथ्यों को स्वीकार्य और मान्य बना चुके लोगों के लिए एक सहज व्यवहार को कमतर करने और कई बार अपमानित करने का पर्याय बना दिया जाना स्वभाविक ही है।

गौरतलब है कि हमारे इसी समाज में औरत के लिए भी एक शब्द आता है- ‘मउगी’। मगर यह औरत शब्द का ही पर्यायवाची होता है। इसे स्त्रैण भाव-भंगिमा का स्त्रीलिंग रूप भी कह सकते हैं। बिना किसी नकारात्मकता के इसे औरतों ने अत्यंत ही सहजता से स्वीकारा है। अब ऐसे में एक स्वभाविक प्रश्न मन में उठता है कि एक ही शब्द के दो भिन्न रूपों को दो भिन्न लिंग वालों ने इतने अलग स्वरूपों में क्यों देखा और समझा है?

स्त्रियों के प्रति समानता और संवेदनशीलता या फिर थोड़ा स्त्रैण हाव-भाव कैसे किसी के कमतर होने का पर्याय है? एक पुरुष दृष्टि स्त्री को कमतर क्यों मानता है? क्या उपर्युक्त स्थितियां महज भ्रामक जैविक श्रेष्ठता के कुचक्र में फंसे पुरुषों के वास्तविक सामाजिक और मानसिक विकास में अवरोध नहीं पैदा कर रहा है? प्रश्न यह भी उठता है कि क्या अपने मिथ्या गर्व, प्रपंच से परिपूर्ण शक्ति और सत्ता की होड़, अपनी अंतहीन भूख और लिप्सा की प्राप्ति की दौड़ में इस वर्ग का एक बड़ा हिस्सा स्वयं को मानसिक पिछड़ेपन की आग में नहीं झोकता जा रहा है? प्रश्न माकूल और विचारणीय है, इसलिए एक बार ठहर कर विचार करने की जरूरत है।

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