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दुनिया मेरे आगेः दोस्ती का दायरा

कुछ दशकों पहले पुरुष की मित्रता पुरुष के साथ और स्त्री की मित्रता स्त्री के साथ ही होती थी! एक पुरुष और एक स्त्री की मित्रता को हमारे समाज में मित्रता माना ही नहीं जाता था!

मित्रता तो सहज संबंधों में विकास का मामला है।

अरुणा कपूर

यह कोई नई व्याख्या नहीं है कि मित्र वह होता है जो सुख-दुख और संकट के समय आपका साथ दे। ऐसी घड़ी में मित्र का आपके साथ होना बहुत अच्छा संयोग है, लेकिन किसी कारणवश वह विकट घड़ी में उपस्थित नहीं भी हो सकता है और जहां है वहीं से आपकी किसी न किसी रूप में सहायता करता है तो वह भी आपका सच्चा मित्र है। दरअसल, सच्चे मित्र की पहचान होनी बहुत जरूरी है। मित्रता तो सहज संबंधों में विकास का मामला है, लेकिन कई बार मीठे बोल बोल कर भी आपसे मित्रता का नाता जोड़ने कुछ लोग नजदीक आते हैं। उनका मकसद आपसे कोई न कोई मतलब निकालना होता है। यानी पद-कद या धन से जुड़ा कोई मकसद हो सकता है। लेकिन कई बार हम ऐसे कथित मित्रों को पहचान नहीं पाते और उन्हें भी मित्र के दर्जे में मान लेते हैं। दरअसल, शुरुआत में हमें उनका साथ अच्छा लगता है, क्योंकि वे हमारी इज्जत या मान-सम्मान करते हुए दिखते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद पता चलता है कि हमारा क्या नुकसान हुआ है।

किसी को भी मित्र मान कर उस पर आंखें मूंद कर भरोसा करना हमारी अपनी ही गलती है! हालांकि यह भी कैसे कहा जाए कि किसी पर विश्वास न करो! अगर किसी पर भरोसा बिल्कुल ही नहीं किया जाए तो फिर सच्ची मित्रता भी कैसे हासिल हो सकती है! ‘मित्र’ विषयक बहुत-सी बहुत-सी हिंदी फिल्में बनाई गई हैं, जिसमें एक मित्र दूसरे मित्र के लिए जान की बाजी लगा देता है! उसके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करता है! समाज और दुनिया की परवाह नहीं करता! अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु या व्यक्ति को भी हमेशा के लिए मित्र की खातिर त्याग देता है! लेकिन क्या यही सच्चाई भी है? कहानी में कुछ भी लिखा जा सकता है! कहानी को फिल्माया जा सकता है, उसका मंचन किया जा सकता है! इसमें कलाकार भी अपनी तरफ से जान फूंक देते हैं! लेकिन वास्तविक दुनिया में किसी पर भी एकदम से भरोसा करना हर बार व्यावहारिक नहीं है! धोखाधड़ी के कई उदाहरण हमारे सामने आ चुके हैं।

कुछ दशकों पहले पुरुष की मित्रता पुरुष के साथ और स्त्री की मित्रता स्त्री के साथ ही होती थी! एक पुरुष और एक स्त्री की मित्रता को हमारे समाज में मित्रता माना ही नहीं जाता था! इसे विपरीत लिंगों के आकर्षण के तहत ही देखा जाता था। इसलिए ऐसी मित्रता बहुत कम देखने को मिलती थी! लेकिन जमाना बदला और वक्त के साथ हमारे भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से में भी स्त्री और पुरुष की मित्रता को सामान्य दृष्टिकोण से देखा जाने लगा! बात और आगे बढ़ती गई और यह मित्रता ‘गर्लफ्रेंड’ और ‘बॉयफ्रेंड’ को जोड़ने वाली कड़ी के नाम से जानी जाने लगी। लेकिन कई स्थितियों में यहां भी मित्रता निश्छल मन की पवित्र मित्रता न रह कर स्वार्थ और धोखाधड़ी के विकृत स्वरूप में बदलती देखी गई। इसमें मित्रता के नाम पर विश्वास करते हुए सरल मन के पुरुष या सरल मन की स्त्रियां शिकार होने लगीं। कई बार रुपया, पैसा, मान-सम्मान लुट जाने के बाद उन्हें पता चलता था कि मित्रता के नाम पर उन्हें ठगा गया।

जाहिर है, ऐसे में हर किसी पर सहज विश्वास करना मुश्किल हो जाता है। बचपन में हमारे साथ स्कूल में पढ़ने वाले सभी हमारे मित्र नहीं होते। उनमें से ज्यादातर को सहपाठी कहा जा सकता है! कॉलेज में भी साथ पढ़ने वाले सहपाठी ही होते हैं! फिर हमारे आगे के जीवन में हमारे कार्यस्थलों पर या किसी भी क्षेत्र में हमारे साथ काम करने वाले सहकर्मी होते हैं! इन सबके बीच में से ही कुछ सहपाठी या सहकर्मी ऐसे होते हैं, जिनसे हमारा बेहद करीब का संवाद बन जाता है और हम उन्हें मित्र के रूप में स्वीकार या याद करने लगते हैं। यह इस बात पर निर्भर होता है कि हमारे दैनंदिन के जीवन में किस तरह की परिस्थितियां आती हैं और उसमें हमारे उस मित्र की क्या भूमिका होती है। जब हम गंभीर मुश्किल से घिर जाते हैं तो कई ऐसे सहपाठी या सहकर्मी होते हैं, जो अपने जोखिम की कीमत पर हमारी मदद करते हैं, हमें संकट से निकाल लेते हैं, तो दूसरी ओर साथ काम करने या पढ़ने वाले कुछ ऐसे भी लोग हो सकते हैं, जो हमारी मजबूरी का फायदा उठा लें। यानी मित्र बनाने के क्रम में भरोसे में धोखा भी हो सकता है, लेकिन यह भी सच है कि मित्र भी परिचित के बीच में से ही निकलते हैं।

दरअसल, मित्र की परिभाषा हमें खुद तय करनी होती है। मित्र समझ कर किसी को अपनी ऐसी निजी बातें साझा करना, जिनसे भविष्य के खतरे जुड़े होते हैं तो यह हमारे लिए जोखिम से भरा होता है। हमसे मित्रता का झूठा दंभ भरने वाले लोग ऐसी बातों का वक्त आने पर फायदा उठा सकते हैं और हमें बड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं। एक झटके में हमारा भविष्य भी दांव पर लग जा सकता है। ऐसा नहीं है कि सच्चे मित्र हो नहीं सकते, लेकिन मित्रता के पायदान पर सोच-समझ कर पांव रखना ही भविष्य के लिए बेहतर है।

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