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दुनिया मेरा आगे- उत्सव की सुबह

हर वर्ष इकतीस दिसंबर कैलेंडर के पुराने होने का अहसास देता है और उस दिन एक नव उत्सव आधी रात को यानी तारीख बदलते ही शुरू हो जाता है।

Author January 1, 2018 5:50 AM
धरती पर नए साल ने दस्तक दे दी है।

कृष्ण कुमार रत्तू

एक रोमन लोक कथा का हिस्सा है- रेत और पानी को आप बांध सकते हैं, लेकिन जाते हुए वक्त को नहीं रोक सकते। समय के इस चक्र में एक और वर्ष समाप्त हो गया है। वक्त किस तरह से बीत जाता है, हम और आप सोच भी नहीं सकते। अनाद्यनन्त: काल लिखते हुए भास्कराचार्य ने शायद ही कभी सोचा होगा कि अब समय बीते हुए कल के कैलेंडर की मानिंद इतिहास का हिस्सा हो जाएगा। पिछले समय की शेष स्मृतियों का सारांश डायरी के किन पन्नों पर लिखा जाएगा? वक्त के सफे पर लिखी हुई आम आदमी की जीने की पीड़ा और दुश्वारियों से भरा हुआ जीवन जीने का माहौल किस उत्सव की कथा को बयान करता है? बदलते हुए वक्त के साथ नई सूचना प्रौद्योगिकी और सूचना संप्रेषण ने आज आदमी को पूरी तरह बदल दिया है।
इन दिनों हमारे समाज का एक नया सौंदर्यबोध दिख रहा है, जिसमें हमारा बदलता हुआ आचार और व्यवहार मानव-मन की कई परतों को परिलक्षित कर रहा है। इस बदलते हुए समाज में हर दिन एक उत्सव की तरह हो गया है। उसमें नव वर्ष का पहला दिवस भी उत्सव में बदल गया है। हर बार सर्दी के मौसम में नए साल की पहली सुबह एक नए सूर्य के उदय का एक नया संदेश और एक नई उमंग का उत्सव लेकर आती है। हर वर्ष इकतीस दिसंबर कैलेंडर के पुराने होने का अहसास देता है और उस दिन एक नव उत्सव आधी रात को यानी तारीख बदलते ही शुरू हो जाता है।
इन दिनों बदलते हुए भारतीय समाज में हर एक मध्यवर्गीय परिवार में साल के इस दिन छोटा-मोटा उत्सव मनाने की परंपरा शुरू हो गई है। बाकी तड़का संप्रेषण के दूसरे माध्यम मसलन, वाट्स ऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर वगैरह शुभेच्छाओं, बधाइयों और शुकामनाओं के आदान-प्रदान में पूरा कर देते हैं। क्या इस तरह के आधी रात के उत्सव में डूबा हुआ मध्यवर्गीय भारतीय समाज उस सुदूर भारतीय समाज की पीड़ा को भी समझ पाएगा, जिनके लिए स्वतंत्रता के इतने वर्षों के बाद भी जिंदगी का संघर्ष उतना ही कठिन है, जितना पहले था? क्या उनके लिए कुछ भी बदला है?
फिलहाल याद आ रहा है कि दो दशक पहले तक हमने शायद ही कभी इस तरह का शोर, उन्माद, हल्ला-गुल्ला और आवारगी की तरह का माहौल इस रतजगे की रात को देखा होगा। यही शायद पाश्चात्य जिंदगी का सबसे बड़ा पहलू है। देर रात तक मौज-मस्ती और फिर देर तक सोना। अब यह भारतीय रहन-सहन का भी हिस्सा हो गया है। अब तो फादर्स डे, मदर्स डे, डॉटर्स डे और भी न जाने कितने दिवस हो गए हैं। कई बार ऐसा लगता है कि हर दिन एक ‘दिवस’ बन गया है। क्या आप सोच सकते हैं कि किस-किस दिन को कैसे-कैसे मना सकते हैं? मुझे लगता है कि अब यह सब सिर्फ औपचारिकता मात्र रह गया है।
इसीलिए इस तरह प्रचार के बूते मनाए जाने वाले उत्सवों के रंग-ढंग में ज्यादा फर्क नहीं दिखता। ऐसे सभी दिवसों पर जश्न मनाने का स्वरूप एक जैसा ही रहता है।
हम सब इस बात से शायद सहमत होंगे कि अब पूरा भारतीय समाज बदलाव की इस चकाचौंध में भारत और डिजिटल इंडिया में बंट गया है। एक तरफ अब भी अंधेरे में डूबी हुई बस्तियां हैं, बेरोजगार मायूस युवा पीढ़ी है, हर अगले दिन की फिक्र है, इससे उपजा तनाव है, अवसाद का सामना है और खाली वीरान होते गांव हैं। चांद और मंगल पर पहुंचने और बुलेट ट्रेन जैसी ऊंचाइयों का बखान करने वाले हमारे देश में शिक्षा के स्थल अब भी पेड़ों के नीचे कक्षाएं लगाने के लिए बाध्य हैं और करोड़ों बेरोजगार युवा जीवन-यापन का सहारा मिलने के इंतजार में हैं। दूसरी तरफ शराब के अलग-अलग रंगों के शोर और रोशनी में डूबा हुआ शहरी वर्ग है जो साल के आखीर में और नए साल के दिवस को यादगार के तौर पर मना रहा है। क्या यह बंटवारा किसी नव सर्जन पथ पर चल रहे भारत जैसे देश और समाज के लिए कोई रास्ता है, जिसमें सामाजिक समरसता की मंजिल कहीं आ सकती है?
हो सकता है आप भी मेरी तरह कैलेंडर बदल कर नए साल का उत्सव वर्ष के अन्य दिनों की तरह ही मना रहे हों। यों भी कहा गया है कि सूर्य का हर नया दिन एक नए जीवन का अध्याय है। आपकी हर सांस एक नया जीवन है तो फिर यह उत्सव किसलिए? विचार के तमाम प्रश्न हैं। यह भी कि अगर देश है, समाज है, सामूहिकता का बोध है, तो उसमें बिना उत्सव के जीवन कैसा होगा..!
बहरहाल, इन विचारों के साथ सबके लिए नव वर्ष की ढेरों शुभकामना प्रेषित करने का दिन है, इस आशा के साथ कि सबके लिए यह नया दिन और भी नया हो और सबके जीवन को नए उत्सव के उल्लास से भर दे।
उत्सव की सुबह

 

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