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विशेष: हिंसा का संक्रमण घर तक

कोरोना का दौर संक्रमण से टीकाकरण तक तो पहुंच गया है पर इस पूरे दौर के अनुभव न सिर्फ सेहत बल्कि दूसरे कई लिहाजों से भी रोंगटे खड़े करने वाले रहे हैं।

Updated: January 11, 2021 1:25 AM
सांकेतिक फोटो।

रोहित कुमार

बीते वर्ष महिलाओं को जिस तरह घरेलू हिंसा की आंच में झुलसना पड़ा है, वह महिलाओं के प्रति पुरुषों के असंवेदनशील रवैए का शर्मनाक अध्याय है। दिलचस्प है कि अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक और अफ्रीका से लेकर भारत तक महिलाओं के लिए कोरोनाकाल का अनुभव कई तरह की असंवेदनशीलताओं से गुजरने वाला रहा। महिला मन और जीवन पर यह खरोंच भारत में भी कम नहीं महसूस किया गया।

राष्ट्रीय महिला आयोग को 2020 में महिलाओं के खिलाफ हुई हिंसा के संबंध में 23,722 शिकायतें मिलीं। शिकायतों की यह संख्या पिछले छह वर्षों में सबसे ज्यादा रही। आयोग को मिली कुल शिकायतों में से एक चौथाई घरेलू हिंसा से जुड़ी थीं।

आयोग को जो शिकायतें मिलीं उसमें सबसे ज्यादा 11,872 शिकायतें उत्तर प्रदेश से मिलीं। इसके बाद दिल्ली से 2,635, हरियाणा से 1,266 और महाराष्ट्र से 1,188 शिकायतें मिलीं। कुल 23,722 शिकायतों में 7,708 शिकायतें सम्मान के साथ जीने के प्रावधान से जुड़ी थीं जिसमें महिलाओं के भावनात्मक उत्पीड़न के मामले देखे जाते हैं।

साफ है कि मौजूदा दौर के हिस्से विकास और सभ्यता के चाहे जितने सुलेख दर्ज हों, पर महिलाओं के मामले में यह लिखावट शर्मसार करने वाली ही मानी जाएगी। बीते साल लंबे समय तक लोग घरों में बंद रहे। होना तो यह चाहिए था कि एक मुश्किल समय में घर-परिवार का साथ सबके लिए प्रेम और संबल से भरा होता। पर कम से कम महिलाओं के मामले में ऐसा नहीं हुआ। आयोग को जो शिकायतें बीते साल मिलीं, उनमें 5,294 शिकायतें घरेलू हिंसा से जुड़ी थीं।

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा के मुताबिक 2020 में आर्थिक असुरक्षा, तनाव बढ़ने, वित्तीय चिंताओं समेत अन्य चिंताओं ने एक असहजता पैदा की। ऐसे में माता-पिता और परिवार की तरफ से भावनात्मक सहायता नहीं मिलने का परिणाम घरेलू हिंसा के रूप में निकला हो। उन्हें यह भी लगता है कि घर और कार्यस्थल का एक हो जाना कम से कम महिलाओं के लिए बुरा तजुर्बा रहा और यह इसलिए भी कि उनके लिए खुद अपने घर में न तो अपेक्षित सहयोग का वातावरण था और न ही संबल बढ़ाने वाली कोई संवेदना।

कोविड-19 महामारी को रोकने के लिए लागू ‘लॉकडाउन’ के बीच बीते साल मार्च में आयोग को घरेलू हिंसा की काफी शिकायतें मिलीं। इस दौरान महिलाएं घर में उत्पीड़न करने वालों के साथ ही जीने को मजबूर थीं। यह सिलसिला आगे भी बढ़ा और जुलाई में इस संबंध में 660 शिकायतें मिलीं। आयोग की अध्यक्ष कहती हैं कि ‘लॉकडाउन’ की वजह से घरेलू हिंसा की पीड़िताओं को उन लोगों का सहयोग नहीं मिल पा रहा था जो इस तरह के समय में पूर्व में उनका साथ देते थे।

रेखा शर्मा इस संदर्भ में कहती हैं कि घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के तहत आने वाले तंत्रों की पहचान लॉकडाउन में अनिवार्य सेवा के रूप में नहीं की गई और ऐसे में सुरक्षा अधिकारी तथा गैरसरकारी संगठन पीड़िताओं के घर जाने में असमर्थ हो गए।

वहीं, पुलिस अधिकारियों के पास कोविड-19 से निपटने के इतने काम थे कि वे प्रभावी तरीके से पीड़िताओं की मदद नहीं कर पाए। गौरतलब है कि आयोग को गत वर्ष 1,276 शिकायतें महिलाओं के प्रति पुलिस की उदासीनता और 704 शिकायतें साइबर अपराध की मिलीं। वहीं, 1,234 शिकायतें दुष्कर्म या दुष्कर्म की कोशिश की मिलीं जबकि यौन उत्पीड़न की 376 शिकायतें मिलीं।

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