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जब अपने ही पीएम ससुर से भिड़ बैठे थे फिरोज गांधी, खोल दी थी LIC-Mundhra घोटाले की पोल, नप गए थे वित्त मंत्री

LIC-Mundhra Scam: मामले की जांच के लिए जस्टिस चागला कमिटी का गठन किया गया था। जिसने पाया कि इस घोटाले में वित्त मंत्री कृष्णमचारी की भूमिका थी। इस तरह आजादी के बाद यह भारत का सबसे बड़ा वित्तीय घोटाला था।

जब अपने ही पीएम ससुर से भिड़ बैठे थे फिरोज गांधी, खोल दी थी LIC-Mundhra घोटाले की पोल, नप गए थे वित्त मंत्री
एलआईसी-मूंदड़ा घोटाले को लेकर नेहरू और फिरोज के रिश्तों में खटास बढ़ गई थी। (Photo Credit – Express Archive)

जवाहर लाल नेहरू इस देश के पहले प्रधानमंत्री थे। आजाद भारत नेहरू के साथ कई अन्य महान नेताओं के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा था, लेकिन एक मौका ऐसा भी आया जब उनके ही दामाद फिरोज गांधी ने उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थी। फिरोज गांधी ने ऐसे मुद्दे को संसद में उठाया कि वित्त मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और आजाद भारत के तुरंत बाद एक बड़ा घोटाला सामने आया। इस घोटाले को एलआईसी-मूंदड़ा घोटाले के रूप में जाना जाता है।

कौन थे फिरोज गांधी: फिरोज गांधी एक राजनेता तो थे ही लेकिन स्वतंत्रता सेनानी के साथ एक निर्भीक पत्रकार भी थे। फिरोज, भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पति थे। माना जाता है कि फिरोज गांधी के अपने ससुर जवाहर लाल नेहरू से संबंध उतने अच्छे नहीं रहे थे, क्योंकि नेहरू इंदिरा और फिरोज के रिश्ते से शुरुआत में काफी नाराज थे। वहीं, जब फिरोज गांधी राजनीति में आए तो नेहरू के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी। फिरोज राजनेता होने के साथ-साथ पत्रकार भी थे, इसलिए उन्हें चपल भी माना जाता था।

राजनाति में आए और जीता चुनाव: नेशनल हेराल्ड और नवजीवन जैसे अखबारों से जुड़े होने के साथ जब फिरोज गांधी राजनी​ति में आए तो उन्होंने साल 1952 में यूपी की रायबरेली सीट से पहला आम चुनाव जीता। फिर वह कई बार इस सीट से चुने गए। इसी कड़ी में साल 1956 में एलआईसी-मूंदड़ा घोटाले की कलई खुली। फिरोज गांधी खुद सत्तारूढ़ पार्टी से सांसद थे लेकिन उन्होंने तत्कालीन सरकार के खिलाफ इस मुद्दे पर मोर्चा खोल दिया। सरकार में पीएम के तौर पर उनके ससुर नेहरू थे, जिन्हें फिरोज गांधी ने घोटाले पर जमकर घेरा।

सदन में नेहरू और फिरोज हुए आमने-सामने: संसद के निचले सदन लोकसभा में घोटाले की बात पर फिरोज गांधी ने दिसंबर 1957 में जोरदार भाषण दिया। फिरोज यहीं नहीं रुके उन्होंने सदन के बाहर भी अपनी ही सरकार पर जमकर हमला बोला और एक समय पीएम के तौर पर नेहरू की साख पर सवाल खड़े होने लगे। मुद्दा इतना गर्मा चुका था कि नेहरू के ऊपर दबाव बढ़ने लगा था कि वह तत्कालीन वित्त मंत्री टी टी कृष्णामचारी का इस्तीफा लें।

और जब नप गए थे वित्त मंत्री: साल 1957 में एलआईसी-मूंदड़ा घोटाले पर फिरोज ने सरकार को ऐसा घेर रखा था कि पीएम नेहरू के लिए स्थितियां असहज हो चुकी थी। एलआईसी-मूंदड़ा घोटाले को लेकर फिरोज का हमला दिन-ब-दिन तीखा होता जा रहा था। ऐसे में न चाहते हुए भी तत्कालीन सरकार के पीएम नेहरू को अपने पसंदीदा मंत्री को कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा।

क्या था एलआईसी-मूंदड़ा घोटाला: उस दौर में कोलकाता के कारोबारी और शेयर बाजार के सटोरिए हरिदास मूंदड़ा की नॉन परफॉर्मिंग कंपनी के लाखों रुपए के शेयर भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने खरीद लिया। जांच हुई तो सामने आया कि हरिदास मूंदड़ा ने सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करके एलआईसी को अपनी संदेहास्पद कंपनियों के शेयर्स ऊंचे दाम पर खरीदने पर मजबूर किया था और इसकी वजह से एलआईसी को करोड़ों का नुकसान झेलना पड़ा था। बाद में, इस मामले में हरिदास मूंदड़ा को गिरफ्तार किया गया और वह दोषी भी पाया था।

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