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संपादकीय: कुंठा का चेहरा

हमारा समाज जिस भरोसे में जीता है, उसमें यौन कुंठाओं के मारे ऐसे लोगों की पहचान करना मुश्किल होता है। ऐसा व्यक्ति कोई बाहरी, पड़ोसी, परिचित या फिर रिश्तेदार भी हो सकता है। अगर व्यवहार संबंधी बारीकियों का थोड़ा अध्ययन या प्रशिक्षण रहे तो उन्हें पहचान कर बच्चों को सचेत किया जा सकता है। इससे भी जरूरी है कि अपने बच्चों के समझने की स्थिति में आते ही बड़ों की बहलाने वाली बातों, अश्लील व्यवहारों, स्पर्श के अच्छा या बुरा होने के बारे में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

crime in societyबच्‍ची से दुष्‍कर्म चिंता की बात। सांकेतिक फोटो।

उत्तर प्रदेश के बांदा में सिंचाई विभाग के एक कनिष्ठ अभियंता की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह उजागर किया है कि हमारे आसपास कुछ लोग बिल्कुल सहज दिखते हैं, अपने बर्ताव की वजह से वे लोगों के भरोसेमंद भी हो जाते हैं, लेकिन वे बच्चों के लिए बेहद घातक साबित हो सकते हैं। गिरफ्तार अभियंता बांदा, हमीरपुर और चित्रकूट के आसपास के जिलों में पांच से सोलह साल के उम्र के बच्चों को अपना शिकार बना रहा था। अब तक उस पर कम से कम पचास बच्चों का यौन शोषण करने का आरोप है।

अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपने सार्वजनिक जीवन में अच्छे पद पर काम करने वाला वह व्यक्ति घर के भीतर किस तरह की विकृत कुंठाओं के साथ जी रहा था। हैरानी की बात यह है कि बीते दस साल से वह ऐसी गतिविधियों में लिप्त था और अलग-अलग जिलों में छोटे बच्चों को अपने जाल में फंसाता था और उनका यौन-शोषण करता था। कोई बच्चा उसकी हरकतों का खुलासा न कर दे, इसके लिए वह बच्चों को पैसे और मोबाइल फोन समेत महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उपहार में देता था।

दरअसल, इस तरह के अपराधी आमतौर पर सभ्य चेहरे के साथ रहते हैं और बेहद शातिर चालों के साथ बच्चों को अपनी अश्लील गतिविधियों के जाल में फंसाते हैं। गिरफ्तार अभियंता के भी काम करने का तरीका ऐसा था कि वह अब तक पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ सका था। लेकिन पिछले साल बाल यौन शोषण के मसले पर संशोधित पॉक्सो विधेयक के पारित होने के बाद ऐसे अपराधियों की पहचान और जांच में जो सक्रियता आई है, उसी के तहत होने वाली निगरानी की वजह से उसका गिरफ्त में आ पाना संभव हो सका।

पॉक्सो यानी प्रोटेक्शन आॅफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट में अब ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ यानी बच्चों से की जाने वाली अश्लील गतिविधियों को परिभाषित किया गया है और उसे दंडनीय बनाया गया है। गिरफ्तार अभियंता की आपराधिक कुंठाओं का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वह बच्चों के यौन शौषण का न केवल वीडियो बनाता था, बल्कि दुनिया भर में फैले ऐसे अपराधियों को बेच भी रहा था।

जाहिर है, इस मामले का आरोपी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसके अपराध को उसके निजी दायरे में देखा जा सके। बल्कि उसकी तमाम गतिविधियां यह बताती हैं कि वह न केवल खुद बच्चों के खिलाफ एक कुंठित यौन अपराधी है, बल्कि ऐसे कुकृत्य में लगे लोगों के अंतरराष्ट्रीय संजाल का हिस्सा है। चिकित्सा विज्ञान में बच्चों के खिलाफ यौन अपराध करने वालों ‘पीडोफाइल’ कहा जाता है। इस तरह के व्यक्ति कई बार हमारे आसपास मौजूद होते हैं।

लेकिन हमारा समाज जिस भरोसे में जीता है, उसमें यौन कुंठाओं के मारे ऐसे लोगों की पहचान करना मुश्किल होता है। ऐसा व्यक्ति कोई बाहरी, पड़ोसी, परिचित या फिर रिश्तेदार भी हो सकता है। अगर व्यवहार संबंधी बारीकियों का थोड़ा अध्ययन या प्रशिक्षण रहे तो उन्हें पहचान कर बच्चों को सचेत किया जा सकता है। इससे भी जरूरी है कि अपने बच्चों के समझने की स्थिति में आते ही बड़ों की बहलाने वाली बातों, अश्लील व्यवहारों, स्पर्श के अच्छा या बुरा होने के बारे में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

ऐसी कुछ मामूली बातें किसी बच्चे को यौन शोषण के उस दुश्चक्र में फंसने से बचा सकती हैं, जिसका असर बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर दीर्घकालिक स्तर पर पड़ता है और कई बार यह भविष्य में उनके व्यक्तित्व और व्यवहार तक को प्रभावित करता है। जरूरत इस बात की है कि समाज में पलते यौन कुंठित लोगों की समय पर पहचान करके उन्हें कानून के कठघरे में खड़ा किया जाए।

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