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बचपन में हो गया था पोलियो, मां बेचा करती थी चूड़ियां, छह महीने नौकरी छोड़ की तैयारी और बन गए IAS

रमेश घोलप के संघर्ष की कहानी बहुत लंबी है। उन्हें बचपन में पोलियो हो गया था और पिता की पंचर की दुकान थी। आईएएस बनने के लिए उन्होंने शिक्षक की नौकरी छोड़ दी थी।

आईएएस अधिकारी रमेश घोलप की मां चूड़ियां बेचा करती थीं (Photo- Twitter)

देश में UPSC को लेकर पढ़े-लिखे युवाओं में एक अलग जुनून होता है. इस परीक्षा के लिए कई लोग बड़े से बड़ा त्याग करते हैं। आज हम जिनकी कहानी आपके सामने लेकर आए हैं उन्होंने न सिर्फ त्याग किया बल्कि अपनी बीमारी को भी दरकिनार सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक में कामयाबी हासिल की। ये कहानी है IAS रमेश घोलप की। रमेश ने कड़ी मेहनत के बाद इसमें सफलता हासिल की थी।

आउटलुक में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, रमेश घोलप को बहुत कम उम्र में बायें पैर में पोलियो हो गया था। बावजूद इसके वह नहीं रुके। उनके घर के हालात भी कोई बहुत अच्छे नहीं थे। उनके पिता की पंचर की दुकान थी जिसमें इतनी भी आय नहीं हो पाती थी कि घर का खर्च चल सके. ऊपर से पिता को शराब की लत भी थी जो कि बचा हुआ पैसा भी वहां चला जाता था.

नौकरी छोड़ रमेश घोलप ने शुरू की थी UPSC की तैयारी

शराब की लत के चलते उनके पिता की तबीयत खराब रहने लगी और एक दिन उनका निधन हो गया। रमेश बचपन से ही जुझारू छात्र थे और अपनी पढ़ाई में पूरी तरह ध्यान लगाते थे. गरीबी और पारिवारिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने अपना सपना नहीं छोड़ा। पिता के चले जाने के बाद उनकी मां ने चूड़ियां बेचना शुरू कर दिया। वह इसमें भी अपनी मां का हाथ बंटाते थे। 12वीं के बाद उन्होंने ग्रेजुएशन की और पास के ही स्कूल में बतौर अध्यापक पढ़ाने लगे, लेकिन उनके मन तो कुछ और ही था।

इसके बाद उन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी क्योंकि वह यूपीएससी एग्जाम देना चाहते थे। गांव में ज्यादा साधन न होने के कारण उन्होंने पुणे शिफ्ट होने का मन बनाया। यहां उन्होंने एक बार फिर अपनी पढ़ाई शुरू की। मां की परेशानियों को ध्यान में रखते हुए उनके लिए यहां सफलता हासिल करना बहुत जरूरी हो गया था। उन्होंने पहली बार परीक्षा दी और इसमें रह गए।

रमेश घोलप ने अपना प्रयास नहीं छोड़ा और एक बार फिर परीक्षा देने का फैसला किया। इस बार उन्होंने न सिर्फ परीक्षा पास की। बल्कि ऑल इंडिया 287 रैंक भी हासिल की। अभी रमेश झारखंड के कोडरमा जिले के कलेक्टर हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, ‘जब भी मैं किसी विधवा महिला की मदद करता हूं तो मुझे अपनी मां की याद आती है। जब भी मैं किसी ब्लैक मार्केटिंग करने वाले का लाइसेंस रद्द करता हूं तो मुझे मेरी याद आती है कि कैसे मुझे मिट्टी के तेल की कमी के कारण लालटेन बंद करना होता था।’

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