मटका माफिया को एक पंच में कर दिया था धराशायी, फिर मूंछ से पकड़ कर लाये थे थाने, ऐसी है इस IPS के हीरो बनने की कहानी

यूपीएसी क्लियर करने के बाद 1981 बैच के आईपीएस राकेश मारिया की पहली पोस्टिंग महाराष्ट्र के ओकला में हुई थी। यहां से सफर शुरू कर मारिया मुम्बई पहुंचे और फिर इन्होंने कई आतंकवादी हमलों के मामलों को सुलझाया, जिसमें 26/11 अटैक की जांच भी शामिल है।

rakesh maria IPS
IPS राकेश मारिया (फाइल फोटो)

मुम्बई में 50 के दशक में मटका व्यापार बढ़ रहा था। इसी के साथ मटका माफिया ने भी पैर पसारना शुरू कर दिया था। आने वाले कुछ ही वर्षों में मटका और मटका माफिया (Matka Mafia) दोनों ही मुम्बई में प्रसिद्ध हो गए। अवैध तरीके से खेले जाने वाले इस जुए में लोगों का पैसा तो डूबता ही था, साथ ही लोकल लेवल पर यहीं से अपराध को बढ़ावा मिल रहा था।

एक समय सरकार के लिए मटका और मटका माफिया (Matka Mafia) दोनों ही सिरदर्द बन चुके थे। मुम्बई पुलिस इसके खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही थी। इन माफियाओं का खौफ ऐसा होता था कि पुलिस भी इन इलाकों में जाने से बचती थी। लोकल लोगों का सपोर्ट और स्थानीय नेताओं के साथ संपर्क उन्हें उस दौर में और मजबूत कर रहा था। ऐसा ही एक मटका माफिया था भिराड़। महाराष्ट्र के अकोला में इसने अपना ठिकाना बना रखा था और जमकर मटका खेलवाता था। लेकिन जब इस इलाके में एक ऐसा आईपीएस (IPS) पहुंचा, जिसने डरना सीखा ही नहीं था, तो भिराड़ की कहानी खत्म हो गई।

ये आईपीएस थे राकेश मारिया (IPS rakesh maria)। मारिया भारतीय पुलिस सेवा के 1981 बैच के आईपीएस थे और अकोला उनकी पहली पोस्टिंग थी। वे यहां एडिशनल एसपी बन कर पहुंचे थे।

मारिया को मटका माफिया भिराड़ के बारे में पता चला। इलाका ऐसा था जहां पुलिस जा तो सकती थी, लेकिन भिराड़ के भाग जाने या स्थानीय लोगों के विरोध की संभावना थी। इससे पुलिस की बदनामी हो सकती थी। इसके लिए राकेश मारिया ने ऐसी रणनीति बनाई जिससे अकोला से मटका माफिया की कहानी ही समाप्त हो गई।

राकेश मारिया (IPS rakesh maria) अपनी किताब ‘लेट मी से इन नाउ’ (Let Me Say It Now) में लिखते हैं, “अकोला में सबसे बड़ा मटका माफिया एक पूर्व पहलवान था, जिसे श्रवण भिराड़ पहलवान कहा जाता था। उसके पास गुंडों का एक बड़ा गिरोह था। अकोला के लोग उससे बहुत डरते थे। यहां तक ​​कि पुलिसकर्मी भी उसके पास जाने कतराते थे। मुझे बताया गया था कि उनके पास काफी राजनीतिक समर्थन है।”

भिराड़ की कहानियां सुनकर मारिया ने तय कर लिया कि इसे खत्म करना है। उन्होंने चुपचाप अपनी फुटबॉल टीम के लड़कों को चुना और भिराड़ के ठिकाने पर छापा मारने की योजना बनाई। भिराड़ 40 साल का लंबी-चौड़ी कदकाठी वाला व्यक्ति था। उसकी मोटी मूंछें थी, जिस पर उसे बहुत गर्व था। जबकि मारिया दुबले थे, लेकिन उन्हें कराटे में महारत हासिल थी।

मारिया ने लिखा, “मुझे पूरा भरोसा था कि अगर मैं उससे मिलूंगा तो भिराड़ के लिए यह आसान नहीं होगा। हमने योजना के अनुसार छापा मारा। भिराड़ हमें अपने ठिकाने पर देखकर बहुत अचंभित हुआ। बिना एक सेकंड गंवाए मैंने उसके पेट पर एक किक मारी और वह गिर पड़ा। फिर मैंने दोनों हाथों से उसकी मूछों को पकड़ लिया और उसे फर्श से ऊपर खींच लिया।

इसके बाद मारिया ने वहां मौजूद गिरोह के सभी सदस्यों को पकड़ लिया और भिराड़ की मूंछें पकड़कर उसे थाने तक पैदल ही ले गए। इसके बाद मारिया पूरे जिले में प्रसिद्ध हो गए। लोग उन्हें देखने के लिए उनके ऑफिस को बाहर खड़े रहते थे।

कौन हैं राकेश मारिया: राकेश मारिया मुंबई के एक पंजाबी परिवार में पैदा हुए थे। इन्होंने अपनी नौकरी के दौरान कई केस सुलझाए। 1993 में मुंबई पुलिस के उपायुक्त के रूप में उन्होंने बॉम्बे सीरियल धमाकों के मामले को सुलझाया था। मारिया ने 2003 गेटवे ऑफ इंडिया और झवेरी बाजार में हुए दोहरे विस्फोट के मामले को भी सुलझाया था।

मारिया को 2008 के 26/11 के मुंबई हमलों की जांच की जिम्मेदारी दी गई थी। जिसमें उन्होंने एकमात्र जिंदा बचे आतंकवादी अजमल कसाब से पूछताछ की थी। कसाब को 2012 में फांसी दे दी गई थी।

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