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तीखे बोल के आधार पर शिक्षिका की भूमिका संदिग्ध

दिल्ली पुलिस की अपराधा शाखा की टीम ने छात्रा के कई सहपाठियों के बयान पटियाला हाउस अदालत के मेट्रोपोलियन मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए जिसमें उन्होेंने बताया था कि आरोपी शिक्षिका ने उनके सामने अंशिका को एक दिन ‘चरित्रहीन’ बताया था।

पहले घरवाले मौत के कारण को लेकर अनभिज्ञ थे।

प्रियरंजन

आरोप है कि एक तीखे ‘शब्द’ ने पीड़िता की जान ले ली। वही शब्द अदालत में आरोपी को राहत न मिलने का आधार भी बना। दिल्ली की एक छात्रा की खुदकुशी मामले में अदालत ने आरोपी शिक्षिका को कोई राहत देने के इनकार करते हुए तीखे बोल को भी आधार बनाया। उनकी अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए जज ने कहा कि प्रथम दृश्ष्टता यह साफ है कि छात्रा की ओर से उठाए गए इस कदम के पीछे शिक्षिका की भूमिका संदिग्ध है। इस मामले में अभी जांच जारी है। अदालत का मानना है कि अभी और चीजें सामने आ सकती है।

नारायणा विहार स्थित एक निजी स्कूल की आठवीं कक्षा की छात्रा व अपनी माता-पिता की इकलौती बेटी अंशिका (बदला नाम) ने कथित तौर पर प्रताड़ित होकर खुदकुशी कर ली थी। चुन्नी के सहारे झूलती अंशिका को दरवाजा तोड़ कर नीचे उतारा गया। परिजनों ने अस्पताल पहुंचाया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। पहले घरवाले खुदकु शी के कारण को लेकर अनभिज्ञ थे। उन्होंने किसी को दोषी नहीं ठहराया लेकिन जब सुसाइड नोट हाथ लगा तो उनके होश उड़ गए। उसपर रोमन में लिखा था- ‘मेरी खुदकुशी की खबर मेरे स्कूल तक जरूर पहुंचाना’।

इसके बाद जांच की दिशा स्कूल की ओर मुड़ गई। मरने से पहले छात्रा की लिखी इस चिट्ठी में स्कूल की जीव विज्ञान की शिक्षक कटघड़े में थीं। इसके साथ क्लास टीचर भी संदेह के घेरे में आर्इं। मामले की संदिग्धता के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने भी इसे स्थानीय थाने से लेकर अपराध शाखा को सौंप दिया। मामला निचली अदालत होते हुए हाई कोर्ट तक पहुंचा। दिल्ली पुलिस की अपराधा शाखा की टीम ने छात्रा के कई सहपाठियों के बयान पटियाला हाउस अदालत के मेट्रोपोलियन मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए जिसमें उन्होेंने बताया था कि आरोपी शिक्षिका ने उनके सामने अंशिका को एक दिन ‘चरित्रहीन’ बताया था। इसके अलावा उसी शिक्षिका ने जीव विज्ञान प्रयोगशाला वाले कक्ष में अंशिका को ‘मां-बाप का नाम डूबोने वाली….और जा मर जा..’ कहकर फटकारा था।

सहपाठियों ने अदालत में अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दिए बयान में कहा-अपने दोस्तों के सामने मैडम के इस संबोधनों को सुन अंशिका इतनी आहत हुई कि वह स्कूल में ही ‘ मै जा रही हूं मरने’ बोलते हुए शौचालय की ओरभागी लेकिन तब उन्होंने (दोस्तों ने ) उसे रोक लिया था। अंशिका को घर पर नहीं बचाया जा सका। बाद में उन्हें पता चला कि उनकी दोस्त नहीं रहीं। इस पर सुप्रीम कोर्ट के वकील विद्या सागर ने जनसत्ता से बताया कि इस फैसले को गुरु शिष्य परंपरा और कानून के नजरिए से देखने की जरूरत है। गलती चाहे जिसकी हो, मंशा चाहे जो हो लेकिन मुंह से निकले शब्द ने ही जान ले ली। यह वाकया सामाज में बढ़ती असहिष्णुता का उदाहरण है। उन्होंने कहा-स्कूल में एक तरफ कानूनन कड़े दंड की मनाही है। दूसरी ओर छात्रों को बेहतर अंक लाने का स्कूल पर दवाब भी है। ऐसे में गुरु शिष्य दोनों में सहिष्णुता और गंभीरता बढ़ाने की जरूरत है। आरोपी गिरफ्तारी से बचने के लिए अदालत पहुंची। निचली अदालत ने उन्हें राहत नहीं दी। इसके बाद वो हाई कोर्ट पहुंची जहां भी उन्हें अदालत से कोई राहत नहीं मिली।

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