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आंखों की रोशनी गई तो कई स्कूलों ने दाखिले से कर दिया मना, संघर्ष से IAS बनने की कहानी…

एक बार के ललित ने बताया था कि वो साइंस का छात्र बनना चाहते थे लेकिन आंखों की रोशनी नहीं होने की वजह से वो इस विषय को लंबे करियर के लिए नहीं चुन पाए।

crime, crime newsIAS के ललित। फोटो सोर्स- वीडियो स्क्रीनशॉट, यू ट्यूब

कहते हैं अगर हौसला बुलंद हो तो बड़ी से बड़ी जीत भी हासिल की जा सकती है। अब तक हमने कई ऐसे सफल लोगों के बारे में बताया जिन्होंने IAS बनने से पहले अपनी जिंदगी में कड़ा संघर्ष किया है। इस कड़ी में आज बात एक ऐसी शख्सियत की जिनकी कम उम्र में ही आंखों की रोशनी चली गई और कई स्कूलों ने उन्हें अपना यहां दाखिला देने तक से मना कर दिया था, क्योंकि वो ललित को पढ़ा पाने में सक्षम नहीं थे। बावजूद इसके जिंदगी की मुश्किल राहों को पार कर ललित ने प्रशासनिक सेवा की कठिन परीक्षा पास की थी। के ललित 2019 बैच के आईएएस अफसर बने।

IAS बनने के बाद के ललित ने कहा था कि ‘मैं खुद को काफी भाग्यशाली महसूस करता हूं कि मुझे एक ऐसा प्लेटफॉर्म मिला है जहां से मैं सोसायटी की बेहतरीन के लिए कुछ कर सकता हूं।’ आंध्र प्रदेश के रहने वाले के ललित ने केंद्रीय विद्यालय और दिल्ली पब्लिक स्कूल रांची से पढ़ाई-लिखाई की थी। उन्होंने साल 2016 में श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (दिल्ली विश्वविद्यालय) से ग्रेजुएशन किया। इसके अलावा दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से जब वो एमए कर रहे थे तब उन्होंने सिविस सेवा की परीक्षा दूसरी बार में पास की थी। के ललित ने बताया था कि चूकि वो देख नहीं सकते थे इसकी वजह से उन्हें IAS बनने तक के सफर में कई तरह की समस्याओं का सामना भी करना पड़ा था।

उन्होंने कहा था कि स्कूल, कॉलेज में पढ़ाई हो या फिर सिविल सर्विस की तैयारी हो, स्टडी मटैरियल जुटाना उनके लिए सबसे बड़ी समस्या थी। आंखों की रोशनी नहीं होने की वजह से वो आम बच्चों की तरह किताबें नहीं पढ़ सकते हैं। इस वजह से वो पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक मटेरियल और ऑडियो रिकॉर्डिंग पर निर्भर थे। एक साक्षात्कार में के ललित ने बताया था कि उनकी मां उनकी किताबें पढ़ती थीं और वो इसे रिकॉर्ड कर सुना करते थें।

ललित का जन्म एक आम बच्चे की ही तरह हुआ था लेकिन क्लास वन से उन्हें देखने में दिक्कत होने लगी। यह एक मेडिकल कंडीशन थी जिसमें धीरे-धीरे आंखों की रोशनी चली जाती है। क्लास 6वीं तक आते-आते ललित को अपना एग्जाम खुद लिखने में समस्या होने लगी थी और क्लास 8 से उन्होंने स्क्राइब लेना शुरू कर दिया।

ललित के पिता की रेलवे में सरकारी नौकरी थी जिसमें हर तीन-चार साल में उनका ट्रांसफर हो जाता था। वे जैसे-तैसे एक स्कूल में उनका एडमिशन कराते थे तब-तक नया स्कूल तलाशने का वक्त आ जाता था। लेकिन ललित के पिता ने कभी समझौता नहीं किया और हमेशा उन्हें एक नॉर्मल बच्चों के स्कूल में ही पढ़ाया।

ललित की स्पेशल नीड्स देखकर अक्सर स्कूल वाले उन्हें लेने से मना कर देते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वे उनकी स्पेशल जरूरतें पूरी नहीं कर पाएंगे। ललित ने पहले तो सेंट्रल स्कूल से पढ़ाई की फिर हायर एजुकेशन के लिए माता-पिता के साथ दिल्ली चले गए। इस बीच जहां-जहां उनके पापा का ट्रांसफर हुआ ललित के स्कूल बदलते रहे।

के ललित अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता को देते हैं। एक बार के ललित ने बताया था कि वो साइंस का छात्र बनना चाहते थे लेकिन आंखों की रोशनी नहीं होने की वजह से वो इस विषय को लंबे करियर के लिए नहीं चुन पाए। इसके बाद उन्हें कॉमर्स लेने पड़ा। जल्दी ही कॉमर्स विषय में उनकी दिलचस्पी बढ़ी और फिर उन्होंने कभी भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। के ललित के लिए परीक्षा में स्क्राइब ढूंढना भी एक कठिन काम था। दरअसल कम ही लोग उनकी जगह पर परीक्षा में बैठ कर लिखने के लिए तैयार हो पाते थे। आईएएस बनने के बाद के ललित ने इन लोगों का भी शुक्रिया अदा किया था।

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