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अखबार बांट चुकाते थे फीस, संघर्ष से IAS बनने वाले निरीश राजपूत की कहानी

निरीश ने अपने दोस्त की मदद की और एक बेहतरीन कोचिंग इंस्टीच्यूट भी खुलवा दिया। 2 साल बाद जब इस कोचिंग संस्थान से निरीश के मित्र को काफी आमदनी होने लगी तब उनके दोस्त ने उन्हें बेइज्जत कर वहां से निकाल दिया

crime, crime newsIAS निरीश राजपूत।

कहते हैं कि अगर इरादे बुलंद हो तो राहों में चाहे जितनी भी मुश्किलें आएं इंसान उन्हें जरुर पार कर जाता है। आज बात एक ऐसी हस्ती की जिनके इरादों में इतना दम था कि अभिशाप कही जाने वाली गरीबी उनके राहों का कांटा नहीं बन सकी। हम बात कर रहे हैं कड़ी मेहनत और जबरदस्त संघर्ष से IAS अफसर बने निरीश राजपूत की।

मध्य प्रदेश के भिंड जिले के महुं गांव के रहने वाले निरीश के पिताजी सिलाई का काम करते थे। घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी लिहाजा पांच सदस्यों का पालन-पोषण बड़ी ही मुश्किल से हो पाता था। निरीश अपने परिवार के साथ महज 15 बाई 40 फीट के छोटे से मकान में रहते थे। परिवार की तंग आर्थिक हालत के कारण निरीश ने गांव के ही सरकारी स्कूल से पढ़ाई की।

निरीश के बारे में आपको बता दें कि वो बचपन के दिनों से ही पढ़ाई-लिखाई में अव्वल थे। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह थी कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी लिहाजा कॉलेज में दाखिला पाना उनके लिए कतई आसान नहीं था। निरीश ने इस बड़ी समस्या का हल निकालने के लिए घऱों में अखबार डालने का काम शुरू किया। निरीश हर सुबह उठ कर लोगों के घरों में अखबार पहुंचाने लगे और इससे होने वाली कमाई से उन्होंने ग्वालियर के एक सरकारी कॉलेज में दाखिला ले लिया।

सरकारी कॉलेज से ही उन्होंने बीएससी और एमएससी की डिग्री हासिल की। निरीश का सपना आईएएस अफसर बनने का था। निरीश के दो बड़े भाई भी थे और दोनों भाइयों ने भी उनके इस सपने को पूरा करने में उनका पूरा साथ दिया। उनके दोनों भाई संविदा के आधार पर शिक्षक बने थे और वो इससे होने वाली आमदनी को निरीश की पढ़ाई में खर्च करते थे।

आईएएस बनने के बाद निरीश ने एक साक्षात्कार में बताया था कि एक बार वो अपने एक बेहद ही धनी दोस्त के घर उत्तराखंड गए थे। निरीश के दोस्त ने उनसे वादा किया था कि अगर वो एक कोचिंग इंस्टीच्यूट खुलवाने में उनकी मदद करेंगे तब वो सिविल परीक्षा के लिए जरुरी मटेरियल उन्हें उपबल्ध करा देंगे।

निरीश ने अपने दोस्त की मदद की और एक बेहतरीन कोचिंग इंस्टीच्यूट भी खुलवा दिया। 2 साल बाद जब इस कोचिंग संस्थान से निरीश के मित्र को काफी आमदनी होने लगी तब उनके दोस्त ने उन्हें बेइज्जत कर वहां से निकाल दिया और कहा कि तुम कुछ नहीं कर सकते और यूपीएससी कभी नहीं निकाल सकते।

निरीश राजपूत को यह बात काफी बुरी लगी। जॉब छूटने के बाद निरीश काफी गरीबी में रहने लगे। उनके पास रहने के लिए घर और यहां तक कि खाने के पैसे भी कभी-कभी नहीं होते थे। निरीश राजपूत ने साक्षात्कार में बताया था कि वो पढ़ाई-लिखाई के लिए दिल्ली आ गए। यहां उनकी दोस्ती अंकित से हुई और अंकित यूपीएससी की तैयारी कर रहा था। निरीश, अंकित के साथ रहने लगे और दिन में 18 घंटे तक पढ़ाई-लिखाई करने लगे।

यूपीएससी की तैयारी करने के लिए निरीश राजपूत ने कोई कोचिंग इंस्टीच्यूट ज्वायन नहीं किया। वो सिर्फ अंकित की किताबें और उसके नोट्स पढ़ा करते थे। IAS बनने का सफर निरीश के लिए किसी चुनौती से काम नहीं रहा। तीन एटेम्पट में फ़ैल होने के बाद जहां व्यक्ति सफलता की उम्मीद छोड़ देता है वहीं निरीश यह जानते थे कि परिश्रम करने के अलावा उनके पास कोई और दूसरा रास्ता नहीं था। वह सकारात्मक सोच के साथ मेहनत करते रहे और 2013 में UPSC की सिविल सेवा परीक्षा में 370वी रैंक हासिल कर IAS बन गए।

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