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प्लेन से शिकार को बुला किया अपहरण, चंबल के चर्चित डाकू मोहर सिंह पर दर्ज थे 300 से ज्यादा केस…

बताया जाता है कि साल 1955 में एक शख्स की हत्या करने के बाद मोहर सिंह जरायम की दुनिया में उतरा था।

CRIME, CRIME NEWSप्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो सोर्सः एजेंसी)

इस कुख्यात डकैत को लेकर बॉलीवुड में कई फिल्में बनीं। साल 1960 के दौरान इस डकैत का नाम इतना मशहूर हो गया था कि लोग इससे खौफ खाने लगे थे। उस वक्त यह डकैत खुद को बागी या विद्रोही कहलाना पसंद करते थे। चंबल की पहाड़ियों में कभी डकैत मोहर सिंह की इतनी तूती बोलती थी कि उसके हुक्म के बिना दूर-दराज के गांव में लोगों का सांस लेना भी दुभर हो चुका था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मोहर सिंह पर करीब 315 से ज्यादा केस दर्ज थे। इनमें से 85 हत्या के केस थे। 1960-70 के दशक में मोहर सिंह के सिर 3 लाख रुपए का इनाम रखा गया था। साल 1972 में जयप्रकाश नारायण के सामने इस कुख्यात डाकू ने सरेंडर किया था। सरेंडर के वक्त यह तय किया गया था कि मोहर सिंह को सजा-ए-मौत नहीं दी जाएगी। एग्रीमेन्ट के मुताबक मोहर सिंह को खुले जेल में रखा गया था।

बताया जाता है कि साल 1955 में एक शख्स की हत्या करने के बाद मोहर सिंह जरायम की दुनिया में उतरा था। मोहर सिंह ने रघुनाथ, कुशवाहा, जगमोहन, प्रहलाद सिंह और माधो सिंह डकैतों के साथ मिलकर काम किया था। बाद में वो फूलन देवी के साथ भी जुड़ा था। मोहर सिंह लोगों को अगवा करने में एक्सपर्ट था। सरेंडर करने के बाद वो करीब 8 सालों तक जेल में रहा। इसके बाद वो साल 1980 में जेल से रिहा हुआ था। इसके बाद वो राजनीति में उतरा और मेहगांव नगर पंचायत का अध्यक्ष भी साल 1995-2000 के बीच तक रहा।

मोहर सिंह के कई किस्से चंबल के इलाके में मशहूर है। डाकू माधो सिंह के साथ उसकी दोस्ती की चर्चा खूब होती है। लेकिन चंबल में बैठे-बैठे जब उसने दिल्ली के मूर्ति तस्कर का अपहरण कर लिया तो पुलिस के होश उड़ गए थे। ऐसा चंबल के किसी डकैत ने नहीं किया था। एक इंटरव्यू के दौरान मोहर सिंह ने अपनी इस दिलेरी की चर्चा की थी।

मोहर सिंह ने कहा था कि ‘मैंने चंबल के कुख्यात डाकू नाथू सिंह के साथ मिलकर प्लानिंग की है और दिल्ली के कुख्यात मूर्ति तस्कर को प्लेन से ग्वालियर बुलाया। यहां से चंबल बुलाकर बंधक बना लिया था। उसके बाद उससे 26 लाख की फिरौती वसूली और उसे जंगल से रिहा किया गया था। इस घटना से दिल्ली हिल गई थी। इस घटना को साल 1965 में अंजाम दिया गया था।

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