जब बिना सुरक्षा पब्लिक बस में चल रही गृह मंत्री की बेटी को उठा ले गए थे आतंकी, पिता को रिहाई के लिए सिस्टम से ज़्यादा अपने संपर्कों पर था भरोसा

रुबिया सईद की रिहाई के बदले आतंकियों को छोड़े जाने पर तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा था कि एक पिता के रूप में तो मै खुश हूं लेकिन एक राजनेता के रूप में मैं समझता हूं कि ऐसा नहीं होना चाहिए था। 

दिसंबर 1989 में रिहा होने के बाद अपने पिता व तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ रुबिया सईद (एक्सप्रेस आर्काइव)

देश का गृहमंत्री, प्रधानमंत्री के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर व्यक्ति होता है। लेकिन हमारे देश के इतिहास में एक ऐसी घटना भी दर्ज है जब गृहमंत्री की बेटी का अपहरण हो गया था। 1989 में मुफ्ती मोहम्मद सईद देश के केंद्रीय गृहमंत्री थे और उनकी बेटी रूबैया सैयद को आतंकवादियों ने अगवा कर लिया था। हालांकि धीमी कानूनी प्रक्रिया और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते इस अपहरण में शामिल और इसे अंजाम देने वालों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। घटना के तीन दशक बाद स्पेशल टाडा कोर्ट में 24 में से 10 आरोपियों पर चार्जशीट दाखिल हो सकी। दो आरोपी मारे जा चुके हैं और 12 कभी पकड़ में आए ही नहीं।

मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी के बदले भारत सरकार को पांच आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा था। आइए जानते हैं इस अपहरण की कहानी, जिसमें बिना सुरक्षा के बस से जा रही गृहमंत्री की बेटी को जब आतंवादियों ने अगवा कर लिया और बदले में अपने साथियों को आजाद करवाया। उस समय गृहमंत्री रहे सईद ने सरकारी सिस्टम से ज्यादा अपने निजी संपर्कों पर भरोसा किया था बेटी को छुड़वाया था।

साल 1989 के अंत में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी थी। इसमें गृहमंत्री का जिम्मा जम्मू कश्मीर के बड़े नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद के पास था। उन्हीं दिनों सईद की डॉक्टर बेटी रुबैया सईद श्रीनगर से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थीं और सरकारी अस्पताल में इंटर्नशिप भी कर रहीं थीं। आठ दिसंबर 1989 को भी रुबैया आम दिनों के अनुसार ही इंटर्नशिप खत्म होने के बाद एक सार्वजनिक बस से अपने घर के निकलीं। केंद्रीय गृहमंत्री की बेटी होने के बावजूद वो बिना किसी सुरक्षा के रहती थीं और उस दिन भी उनके साथ कोई सुरक्षाकर्मी नहीं था।

रुबैया श्रीनगर के नौगाम स्थित अपने घर पहुंचती इससे पहले ही चार आतंकवादियों ने रास्ते में बस रुकवाकर उनका अपहरण कर लिया। वे आतंकी उन्हें एक कार में बिठाकर श्रीनगर से कई किलोमीटर दूर नाटीपोरा ले गए। कहा जाता है कि जिन आतंकियों ने रुबैया का अपहरण किया था वे सभी कश्मीर में नए नए उभर रहे अलगावादी संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के सदस्य थे। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी केबी जिंदल द्वारा इंडियन एक्सप्रेस में लिखे गए एक आलेख के अनुसार जिस कार से रुबैया को नाटीपोरा ले जाया गया था उसमें जेकेएलएफ का मुखिया यासीन मलिक भी बैठा हुआ था।

अपहरण के बाद अपहृताओं ने एक अखबार के कार्यालय को फोन किया और कहा कि वह दुनिया को बताएं कि जेकेएलएफ ने भारत के केंद्रीय गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी का अपहरण कर लिया है। साथ ही यह भी कहा कि पांच आतंकियों की रिहाई के बदले में ही गृहमंत्री की बेटी को लौटाया जाएगा। जेकेएलएफ में जिन पांच खूंखार आतंकियों की रिहाई की मांग की थी उसमें गुलाम नबी भट, मोहम्मद अल्ताफ, नूर मोहम्मद कलवाल, जाविद जरगर और अब्दुल हमीद शेख शामिल था। हालांकि बाद में आतंकियों ने जाविद जरगर के बदले अब्दुल अहद वाजा की रिहाई की मांग की थी।

अपहरण की खबर का पता चलते ही देश में कोहराम मच गया। सरकार की तरफ से रुबैया सईद की रिहाई की कोशिशें शुरू की गईं। दिल्ली सहित कई महत्वपूर्ण शहरों में बैठकों का दौर शुरू हो गया। केबी जिंदल के मुताबिक, जम्मू कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला उस समय लंदन में थे। उन्होंने वहीं से दिल्ली में मौजूद तत्कालीन मुख्य सचिव मूसा रजा और राज्य मंत्रिमंडल के साथ बैठक की। बैठक में अपहरणकर्ताओं की मांगों को स्वीकार करने पर एक राय बनी। हालांकि कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि फारूक अब्दुल्ला आतंकवादियों को छोड़ने पर सहमत नहीं थे।

केंद्र सरकार ने रुबैया सईद की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए एक टीम का गठन किया था, जिसमें मूसा रजा के साथ नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स (एनएसजी) तत्कालीन महानिदेशक वेद मारवाह और इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के चीफ एएस दुलत को भी शामिल किया गया। इस पूरे मामले को देखने की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने वाणिज्य मंत्री अरूण नेहरू को सौंप रखी थी।

कहा जाता है कि रिहाई के लिए बनाई गई कमेटी से ज्यादा मुफ़्ती मोहम्मद सईद को उनके अपने संपर्कों पर भरोसा था। इसलिए उन्होंने एक तरफ जम्मू कश्मीर के स्थानीय पत्रकार ज़फर मिराज को लगाया गया तो दूसरी तरफ श्रीनगर के जाने-माने डॉक्टर एए गुरु और कुछ नेताओं को लगाया गया। साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मोतीलाल भट और एडवोकेट मियां कयूम को भी बातचीत के लिए शामिल किया गया।

इसके बाद 13 दिसंबर का दिन आया जब सरकार ने रुबैया सईद की रिहाई के लिए पांच आतंकियों को छोड़ने का फैसला किया। सुबह सुबह विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल और नागरिक उड्डयन मंत्री आरिफ मोहम्मद खान को श्रीनगर भेजा गया, जहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला से हुई। आखिरकार 13 दिसंबर की शाम तक पांचों आतंकियों को रिहा कर दिया गया और बदले में आतंकियों ने रुबैया को भी छोड़ दिया। रुबैया को विशेष विमान से दिल्ली लाया गया। उस दौरान हवाई अड्डे पर मौजूद रहे तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा कि एक पिता के रूप में तो मै खुश हूं लेकिन एक राजनेता के रूप में मैं समझता हूं कि ऐसा नहीं होना चाहिए था।

केबी जिंदल ने लिखा कि रुबैया सईद का अपहरण कश्मीर में उपजे आतंकवाद के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसके बाद से कश्मीर में आतंकी घटनाओं में काफी बढ़ोतरी हुई। सईद के अपहरण के बाद कश्मीर में 5700 लोगों का अपहरण किया गया जिसमें कई लोगों को मार दिया गया। जिसमें कश्मीर विश्वविद्यालय के कुलपति मुशीर उल हक का नाम भी शामिल था।

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