कभी खौफ का पर्याय रहे बाहुबली पप्पू यादव को बिहार के लोग अब ‘रॉबिनहुड’ बताते हैं

बीते कई सालों से बिहार में आती बाढ़ के दिनों में और कोरोना संकट में पप्पू यादव को लोगों की मदद करते हुए भी देखा गया।

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जन अधिकार पार्टी के प्रमुख राकेश रंजन उर्फ पप्पू यादव। (Photo Credit – Social Media)

बिहार की वर्तमान राजनीति में कुछ नाम है, जो हमेशा चर्चा में बने रहते हैं। लालू – नीतीश के अलावा एक नाम पप्पू यादव का है जो जन अधिकार पार्टी के प्रमुख और पूर्व सांसद भी है। इनका एक नाम राजेश रंजन भी है, लेकिन लोग उन्हें ‘पप्पू यादव’ के नाम से जानते हैं। पप्पू यादव को कभी सीमांचल के डॉन के रूप में जाना जाता था, लेकिन अब उनकी छवि लोगों के बीच ‘रॉबिनहुड’ टाइप की है।

इस वर्ग का मसीहा: जन अधिकार पार्टी के मुखिया व पूर्व सांसद पप्पू यादव का जन्म 24 दिसंबर 1967 को बिहार के कुमार खंड, खुर्दा करवेली में हुआ था। राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी बनने से पहले पप्पू यादव की छवि एक बाहुबली और डॉन के रूप में थी। लेकिन बीते सालों में यह बाहुबली अपने अतीत से बचता आया है। अब इस बाहुबली को इसके समर्थक दलितों व गरीबों का मसीहा बताते हैं।

जब भड़की जातीय हिंसा की आग: बिहार में जेपी का आंदोलन दम भर रहा था तो पप्पू यादव भी नारे लगाते थे। इस आंदोलन के चलते पप्पू यादव ने 80 के दशक के अंत तक पूर्णिया, सुपौल, कटिहार समेत कई इलाकों में अपना दबदबा कायम रखा। 90 के दशक के शुरुआत में मंडल कमीशन आया तो बिहार में समाज दो धड़े में बंट गया। पप्पू यादव और आनंद मोहन सिंह की दुश्मनी ऐसी बढ़ी कि कई इलाकों में जातीय हिंसा में जन्म ले लिया और सरकार को बीएसएफ बुलानी पड़ी।

पहला सियासी कदम और आरोप: 1990 में पप्पू यादव ने सिंहेश्वर विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीतकर विधायक बने। बहुत कम समय में ही बाहुबली पप्पू यादव की लोकप्रियता चरम पर थी। लेकिन साल 1991 में पप्पू यादव पर एक पुलिसकर्मी की मूंछ उखाड़ने और एक डीएसपी को चलती गाड़ी के आगे धक्का देने का भी आरोप लगा। इसी साल पप्पू यादव पर 3 हत्या के मामले तो दर्ज हुए ही बल्कि रासुका का भी मामला दर्ज हो गया। पप्पू यादव की धमक के चलते लालू सरकार पर सवाल खड़े हुए, ऐसे में बाहुबली की आदतों से आजिज आकर लालू यादव ने गिरफ्तारी की इजाजत दे दी। इसके बाद पप्पू को बांकीपुर जेल भेज दिया गया।

अजीत सरकार हत्याकांड: पप्पू यादव ने 1991 के लोकसभा चुनावों में पूर्णिया सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीतकर सांसद बन गया। पूर्णिया सीट से पप्पू यादव ने इसके बाद 1996 और 1999 में चुनाव जीता। बाहुबली से सांसद बने पप्पू यादव तब चर्चा में आए, जब 14 जून 1998 को माकपा नेता अजीत सरकार की हत्या कर दी गई और आरोप पप्पू यादव समेत अन्य पर लगा। इसी मामले में साल 1999 में 24 मई को उनको गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद साल 2008 में सीबीआई की विशेष अदालत ने पप्पू यादव, अनिल यादव और राजन तिवारी को उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन साल 2013 में पप्पू यादव को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था।

लेखक भी बने पप्पू यादव: तीन बार निर्दलीय सांसद रहने के बाद दो बार (2004, 2014) में मधेपुरा से राजद के टिकट पर भी सांसद चुना गया। वहीं जमानत में बाहर रहने के बावजूद 2004 में जेल के अंदर पार्टी मनाने का मामला तो इतना बढ़ा था कि सुप्रीमकोर्ट ने जमानत ही रद्द कर दी थी। अजीत सरकार हत्याकांड और अन्य मामलों के चलते पप्पू यादव लगातार 12 साल तक जेल में रहे और इस दौरान उन्होंने एक किताब ‘द्रोहकाल का पथिक’ भी लिखी, जिसे वह अपनी जीवनी भी कहते हैं। साल 2015 में जब इस बाहुबली नेता को राजद से निकाला गया तो अपनी पार्टी बना ली।

जन अधिकार पार्टी बनाने के बाद इस सीमांचल के डॉन ने अपनी छवि को बदलना शुरू किया। साल दर साल बिहार में आती बाढ़ के दिनों और कोरोना संकट में पप्पू यादव को लोगों की मदद करते हुए भी देखा गया। बाढ़ में फंसे लोगों को निकालने से लेकर उन तक दवाई और भोजन पहुंचाने के काम ने लोगों के भीतर उनकी ‘रॉबिनहुड’ की छवि को और मजबूत कर दिया। बीते साल वह फिर से सुर्ख़ियों में आए थे, जब उन्हें 32 साल पुराने मामले में जेल भेज दिया गया था, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उन्हें रिहा कर दिया गया था।

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