श्रीप्रकाश शुक्ला का वो बाहुबली गुरु, जिसने उसे बचाया और गैंगस्टर बनाया

यूपी का गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला जब पुलिस से बचने के लिए बिहार पहुंचा तो उसे शरण दी मोकामा के बाहुबली सूरजभान सिंह ने। सूरजभान सिंह ऐसे तो लोजपा के नेता हैं लेकिन कई मौकों पर उन्हें नीतीश का संकटमोचक भी कहा जाता रहा है।

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सुरजभान सिंह ने दी थी श्रीप्रकाश शुक्ला को शरण (फाइल फोटो)

श्रीप्रकाश शुक्ला (Shri Prakash Shukla) ये नाम अपराध जगत में नया नहीं है। इसके कारनामे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने एक बार उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री को मारने की सुपारी ले ली थी। अपराध की दुनिया में जब शुक्ला ने कदम रखा तो उसके गॉडफादर बने सूरजभान सिंह (Surajbhan Singh)।

जुर्म की दुनिया में श्रीप्रकाश की एंट्री काफी हद तक 70 के दशक की किसी फिल्म की तरह है। उसने अपनी बहन को छेड़ने वाले लड़के की हत्या कर दी थी। इसके बाद पुलिस से बचने के लिए वो बिहार के मोकामा पहुंच गया। वहां उसे सूरजभान ने आश्रय दिया। उस समय सूरजभान का नाम अपराध की दुनिया में काफी चमक रहा था और उनको श्रीप्रकाश जैसे लड़कों की हमेशा जरूरत पड़ती थी।

सूरजभान सिंह के पास श्रीप्रकाश शुक्ला को पुलिस से बचने का आसरा तो मिला ही, साथ ही काम भी मिलने लगा। रंगदारी वसूली, मर्डर अपहरण जैसी कई वारदातों को वो यहां अंंजाम देने लगा। बिहार सरकार में तत्कालीन मंत्री और बाहुबली नेता बृज बिहारी की हत्या भी श्रीप्रकाश शुक्ला (Shri Prakash Shukla) ने कर दी। इस मर्डर में भी सूरजभान सिंह का नाम उछला। आरोपी बनाए गए, निचली अदालत से सजा भी हुई, लेकिन फिर बरी हो गए।

सूरजभान सिंह (Surajbhan Singh) की कहानी उस मोकामा से शुरू होती है जो बाहुबलियों का गढ़ रहा है। कांग्रेस विधायक श्याम सुंदर सिंह, अनंत सिंह के बडे भाई और राजद नेता दिलीप सिंह और इसके बाद आए सूरजभान सिंह। हालांकि इनकी गद्दी भी यहां से अनंत सिंह छीन चुके हैं, लेकिन सूरजभान सिंह का ठिकाना मोकामा ही है।

कभी दिलीप सिंह कांग्रेस नेता श्याम सुंदर सिंह के आदमी थी। विधायक के साथ रहते-रहते दिलीप सिंह भी रातनीति में उतरे और लालू से जा मिले। अब दिलीप सिंह की जगह श्याम सुंदर ने उन्हीं की गैंग के एक लड़के को आगे बढ़ा दिया। नाम था सूरजभान सिंह। पहले क्राइम फिर यहीं से उनकी राजनीति की शुरूआत हुई।

सूरजभान सिंह (Surajbhan Singh) जब राजनीति में उतरे तो उनके सामने वही दिलीप सिंह थे, जिसकी गैंग के साथ सूरजभान सिंह शुरूआत में जुड़े थे। सन् 2000 में सूरजभान सिंह निर्दलीय मैदान में उतर गए। जीत मिली और दिलीप सिंह को उन्हीं के पुराने साथी ने हरा दिया।

एक तरफ सूरजभान सिंह की राजनीतिक यात्रा शुरू हो रही थी, तो वहीं दूसरी ओर उनके खिलाफ मुकदमों की लिस्ट भी लंबी होती जा रही थी। इसके बाद सूरजभान बलिया से लोजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े और जीत भी गए। सूरजभान सिंह ऐसे तो नेता एलजेपी के हैं लेकिन कई मौकों पर उन्हें नीतीश का संकटमोचक भी कहा गया है।

सूरजभान (Surajbhan Singh) की राजीतिक यात्रा पर ग्रहण तब लगा, जब एक हत्या के मामले में उन्हें आजीवन कारावास की सजा हो गई। मामले में जमानत तो मिल गई लेकिन सजा के कारण वो चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। हालांकि इसके बाद एक बार उन्होंने अपनी पत्नी को चुनाव लड़वा कर सांसद बनवा दिया तो अगली बार अपने भतीजे को बिहार के नवादा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव में उतार दिया। यहां से उनके भतीजे चंदन सिंह की जीत हुई और अभी वो सांसद हैं। सूरजभान सिंह अभी पारस पासवान गुट के साथ लोजपा में हैं और कहा ये भी जाता है कि पार्टी में उनकी सलाह के बिना ना तो रामविलास पासवान चलते थे ना ही अब पारस चलते हैं।

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