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वीरप्पन: कहानी कुख्यात चंदन तस्कर की जिसे दशकों तक ढूंढती रही पुलिस फिर 20 मिनट में हुआ था ढेर

वीरप्पन ने सन 2000 में दक्षिण भारत के मशहूर अभिनेता राजकुमार का अपहरण किया था और वह 100 से ज्यादा दिनों तक वीरप्पन के चंगुल में रहे। बताया जाता कि उसने बतौर फिरौती करीब 50 करोड़ की मांग की थी।

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वीरप्पन का पूरा नाम कूज मुनिस्वामी वीरप्पन था। (Photo Credit – Indian Express)

वीरप्पन..ऐसा नाम जिसके नाम नाम का खौफ सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं बल्कि कर्नाटक और केरल में भी था। वीरप्पन के कारनामों की चर्चा देश का अलावा विदेशों में भी हुआ करती थी। 18 जनवरी 1952 में पैदा हुआ वीरप्पन जब बड़ा हुआ तो तो एक खूंखार चंदन तस्कर के रूप में कुख्यात हुआ। वीरप्पन पर सैकड़ों लोगों को मारने और करीब दो हजार हाथियों की हत्याओं का आरोप था। पुलिस के लिए सिर दर्द बन चुके वीरप्पन की तलाश करीब 20 साल तक चली थी।

18 जनवरी 1952 में पैदा हुए वीरप्पन का पूरा नाम कूज मुनिस्वामी वीरप्पन था। वीरप्पन के बारे में कहा जाता है कि वह 17 साल की उम्र से ही हाथियों के शिकार करने लगा था। इस खूंखार शख्स के बारे एक बात और कुख्यात थी कि वह हाथियों के माथे के बीच में गोलियां मारता था। हालांकि, वीरप्पन को ढूंढने के लिए राज्य सरकार ने पुलिस फ़ोर्स के साथ मिलकर करीब 20 साल करोड़ों रुपये खर्च कर ऑपरेशन चलाया था, लेकिन हर बार बच निकलता था।

वीरप्पन को मारने वाले के. विजय कुमार ने बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में बताया था कि एक बार वन अधिकारी श्री निवास ने वीरप्पन को पकड़ा भी था, लेकिन वह किसी तरकीब से भाग निकला। फिर कुछ दिनों बाद वीरप्पन ने उसी अधिकारी को मौत के घाट उतार दिया था और उसके सिर को काट दिया था। इसके अलावा विजय कुमार बताते हैं कि साल 1993 में एक बार वह पुलिस से घिर गया और जब उसे लगा कि नवजात बेटी के रोने के कारण पकड़ा जा सकता है तो वीरप्पन ने उसका गला ही घोंट दिया था।

वीरप्पन के निशाने पर अधिकतर पुलिस वाले, वन अधिकारी ही रहे। दशकों तक वीरप्पन ने चंदन लकड़ी और हाथी दांत की तस्करी की। एक समय था जब कहा जाता था कि वीरप्पन ने तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के जंगलों को अपनी मूछों में बांध रखा था। वीरप्पन जितना कुख्यात अपने कारनामों के चलते था, उतना ही मशहूर अपनी मूंछों के लिए था। वीरप्पन के साथी भी कम खतरनाक नहीं थे, वह अपने सरगना के एक इशारे पर जान लेने पर उतारू रहते थे।

वीरप्पन से तंग आकर जयललिता सरकार ने एक टास्क फ़ोर्स बनाई, जिसका काम वीरप्पन को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का था। इस काम के लिए के. विजय कुमार को चुना गया था। हालांकि, पहले भी सरकार करोड़ों रुपये वीरप्पन की तलाश और अलग-अलग टास्क फ़ोर्स बनाने पर खर्च कर चुकी थी। लेकिन विजय कुमार को जब मुखबिरों से पता चला कि वीरप्पन की आंख के इलाज के लिए जंगल से बाहर निकलने वाला है। तभी उसे अक्टूबर 2004 में 20 मिनट के एनकाउंटर में ढेर कर दिया गया था।

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