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10वीं की परीक्षा देने के बाद पिता की हो गई मौत, पंक्चर के दुकान में काम करने से लेकर IAS बनने का सफऱ…

वरूण की बहन एक शिक्षिका थीं और बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाती थीं लेकिन उनकी आमदनी इतनी नहीं थी कि परिवार की दैनिक जरुरतें पूरी हो सकें। इसलिए वरूण ने कुछ कड़े फैसले लिए और अपनी पढ़ाई रोक दी तथा पिता के साइकिल रिपेयरिंग दुकान को संभालने का फैसला कर लिया।

crime, crime newsIAS वरूण बरनवाल। फोटो सोर्स- फेसबुक, @varun baranwal

यह कहानी है उस लड़के की जिसने बेहद ही कम उम्र में अपने पिता को खो दिया और फिर फैसला किया कि वो अब अपनी पढ़ाई रोक देगा ताकि परिवार की आर्थिक मदद कर सके। वरूण बरनवाल महाराष्ट्र के पालघर जिले के एक छोटे से शहर बॉयसर के रहने वाले हैं। वरूण का सपना था कि वो एक चिकित्सक बनें। वरूण के पिता एक साइकिल रिपेयरिंग दुकान चलाते थे और वरूण तथा उनकी बहन को बेहतर जिंदगी देने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते थे।

साल 2006 में वरूण के पिता का निधन हो गया। उस वक्त वरूण बरनवाल की मैट्रिक की परीक्षा को खत्म हुए महज 4 दिन हुए थे। उनके पिता को हार्ट अटैक आया था और फिर उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि साइकिल रिपयेरिंग दुकान से परिवार को गुजर-बसर करने के लिए आमदनी तो हो जाती थी लेकिन अस्पताल के बिल ने वरूण के परिवार को कर्ज में डाल दिया।

वरूण की बहन एक शिक्षिका थीं और बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाती थीं लेकिन उनकी आमदनी इतनी नहीं थी कि परिवार की दैनिक जरुरतें पूरी हो सकें। इसलिए वरूण ने कुछ कड़े फैसले लिए और अपनी पढ़ाई रोक दी तथा पिता के साइकिल रिपेयरिंग दुकान को संभालने का फैसला कर लिया।

वरूण ने पिता की दुकान पर काम करना शुरू कर दिया। इस दौरान उनकी मैट्रिक परीक्षा का परिणाम आया। वरूण पूरे शहर में दूसरे स्थान पर रहे। वरूण के दोस्तों और उनके शिक्षकों ने उनके बेहतर भविष्य के लिए उस वक्त उनकी हौसलाअफजाई की थी।

वरूण बरनवाल ने एक साक्षात्कार में बताया था कि 10वीं की परीक्षा परिणाम आने के बाद उनके एक दोस्त उनके घर आए और उनसे पूछा कि उन्हें अब आगे क्या करना है। मित्र के सवाल से वरूण थोड़ा निराश हो गये क्योंकि उस वक्त उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था।

उस वक्त वरूण की मां ने बड़ा फैसला किया। मां ने तय किया कि अब वो दुकान चलाएंगी और वरूण अपनी आगे की पढ़ाई करेंगे। लिहाजा वरूण ने पास के एक कॉलेज का एडमिशन फॉर्म खरीद लिया। लेकिन एडमिशन फीस दस हजार रुपए थे लिहाजा वरूण ने एक बार फिर पढ़ाई की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

कुछ दिनों बाद वरूण के दुकान पर डॉक्टर कंपिल पहुंचे। यह वहीं डॉक्टर थें जिन्होंने उनके पिता का इलाज किया था। डॉक्टर कंपिल ने जब वरूण से आगे की पढ़ाई के बारे में पूछा था तब वरूण ने उन्हें जवाब दिया था कि आर्थिक परेशानियों की वजह से उन्होंने अपनी पढ़ाई रोकने का फैसला किया है। लेकिन वरूण की यह बात सुनकर डॉक्टर कंपिल ने उसी वक्त 10,000 रुपए निकाल कर उन्हें दिया और आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज में एडमिशन लेने की सलाह दी।

हालांकि, इस मदद के बावजूद भी वरूण की राह इतनी आसान नहीं था। कॉलेज की फीस प्रतिमाह 650 रुपए थी। वरूण प्रतिदिन अहले सुबह उठते थे, कॉलेज करते थे और फिर ट्यूशन पढ़ाने जाते थे ताकि कुछ पैसे कमा कर परिवार की मदद कर सकें। इसके अलावा वो शाम में अपनी मां की मदद के लिए दुकान पर भी मौजूद रहते थे। दिन भर की कड़ी मेहनत की वजह से वरूण थक जाते और रात में जल्दी ही सो जाते थे।

जब उनके कॉलेज के शिक्षकों को इस बारे में पता चला तब उन्होंने आपस में पैसे जुटा कर उनके कॉलेज का फीस भर दिया। 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद वरूण ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेना चाहा लेकिन फीस ज्यादा होने की वजह से यह संभव नहीं हो सका। इसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग करने का फैसला किया। इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले के लिए परिजनों ने अपनी पैतृक जमीन तक बेच दी।

किसी तरह MIT College, Pune में दाखिला हुआ और वरूण पहले समेस्टर में टॉप कर गए। इसके बाद वरूण ने कड़ी मेहनत से स्कॉलरशीप भी हासिल किया और फिर जब साल 2012 में वरूण फाइनल ईयर में थे तब उन्हें एक मल्टीनेशनल कंपनी से जॉब का ऑफर मिला। उसी वक्त देश में जन लोकपाल बिल को लेकर अन्ना हजारे का आंदोलन काफी चरम पर था। वरूण भी इस मूवमेंट में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। जिसके बाद उनके जीवन में बदलाव आया और फिर वो ना सिर्फ अपने परिवार की बल्कि समाज की बड़ी समस्याओं को हल करने के बारे में सोचने लगे।

साल 2012 में वरूण बरनवाल ने इंजीनियरिंग कॉलेज से अपना ग्रेजुशन पूरा किया। उनके पास मल्टीनेशनल कंपनी को ज्वायन करने के लिए 6 महीने थे और उन्होंने इन 6 महीनों के दौरान यूपीएसी की परीक्षा की तैयारी करने का फैसला किया।

वरूण ने एक कोचिंग क्लास में बतौर फैकल्टी ज्वायन किया और फिर यूपीएससी की तैयारी करने लगे। लेकिन तैयारी के लिए किताबें खरीदने में उन्हें आर्थिक मुश्किलें आने लगीं। एक बार वरूण की मुलाकात एक बुजुर्ग व्यक्ति से ट्रेन में यात्रा के दौरान हुई थी। वो बुजुर्ग ‘Hope’ नाम के एक एनजीओ में काम करते थे। वरूण ने एनजीओ से संपर्क किया और फिर इस एनजीओ ने उनकी आगे की पढ़ाई में मदद की। साल 2014 में वरूण बरनवाल ने आखिरकार यूपीएससी की परीक्षा में 32रैंक हासिल किया।

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