कभी पानी के लिए लाइन में लगे तो कभी राशन के लिए, झोपड़ी के अंधेरे से निकलकर IAS बनने का सफर…

झुग्गी में रहने के दौरान हरीश चंद्र ने गर्मी के दिनों में सूरज की तपन, बरसात में पानी और सर्दी में ठंड की सिहरन सही लेकिन मन में इरादा था कुछ बड़ा कर गुजरने का।

crime, crime newsIAS हरीश चंद्र। फोटो सोर्स- वीडियो स्क्रीनशॉट

कहा जाता है कि जिस इंसान के इरादे बुलंद हो और वो मुश्किलों से लड़ने में कभी पीछे नहीं हटता वो जिंदगी में सफलता का स्वाद जरूर चखता है। आज बात एक ऐसे शख्सियत की जिसने झुग्गी की अंधेरे से निकलकर आईएएस अफसर तक का सफर पूरा किया।

दिल्ली के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीश चंद्र के बारे में आपको बता दें कि उनके पिता एक दिहाड़ी मजदूर थे। उनकी मां दूसरे के घरों में जाकर काम करती थी। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। हरीश कभी पीने के पानी की लाइन में लगते थे तो कभी राशन की लाइन में घंटों खड़े रहते थे। यहां तक कि शौच जाने के लिए भी उन्हें लाइन में लगना पड़ा था।

झुग्गी में रहने के दौरान हरीश चंद्र ने गर्मी के दिनों में सूरज की तपन, बरसात में पानी और सर्दी में ठंड की सिहरन सही लेकिन मन में इरादा था कुछ बड़ा कर गुजरने का। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी तो उन्होंने एक किराने की दुकान में काम शुरू कर दिया। खुद अनपढ़ हरीश की मां ने अपने बेटे को पढ़ाने का फैसला किया और उन्हें किराने के दुकान से निकाल कर खुद दूसरे के घरों में झाड़ू-पोंछा करने लगीं ताकि इससे मिलने वाले पैसों से वो अपने बेटे को पढ़ा-लिखा सकें।

एक साक्षात्कार में हरीश चंद्र ने कहा था कि ‘यूं तो मां मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा रही है, लेकिन मैं जिस शक्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ वो थो गोविंद जायसवाल। वहीं गोविंद जिनके पिता रिक्शा चलाते थे और वो साल 2007 में आईएएस बने थे। एक अखबार में गोविंद का इंटरव्यू पढ़ने के बाद हरीश उनसे काफी प्रभावित हुए थे। हिंदू कॉलेज से बीए करने के बाद हरीश को उनके मित्रों से आईएएस के बारे में जानकारी मिली थी।

पढ़ाई के दिनों में खर्च निकालने के लिए हरीश चंद्र ट्यूशन भी पढ़ाया करते थे। हरीश चंद्र ने कहा था कि ‘परीक्षा के दौरान राजनीतिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र मेरे मुख्य विषय थे। विषय चयन के बाद दिल्ली स्थित पतंजली संस्थान के धर्मेंद्र सर ने मेरा मार्गदर्शन किया। उनकी दर्शन शास्त्र पर जबरदस्त पकड़ है। उनका पढ़ाने का तरीका ही कुछ ऐसा है कि सारे कॉन्सेप्ट खुद ब खुद क्लीयर होते चले जाते हैं। उनका मार्गदर्शन मुझे नहीं मिला होता तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता।’ हरीश ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल की है।

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