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आखिर कैसे पुलिस कांस्टेबल का बेटा बना देश का मोस्टवांटेड अपराधी, जानिए पूरी कहानी

80 से 90 के दशक में मुंबई का डॉन बनने और फिर 1993 के मुंबई बम धमाकों के बाद दाउद के आतंकी कहलाने की कहानी कई आपराधिक किस्सों से सनी है।

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दाउद इब्राहिम कासकर। (Photo Credit – Social Media)

भारत के मोस्टवांटेड अपराधियों की लिस्ट में टॉप पर रहे दाउद इब्राहिम का नाम अक्सर हम सुनते हैं। मुंबई का डॉन दाउद इब्राहिम, 1993 के मुंबई सीरियल बम धमाकों के बाद आतंक का चेहरा बनकर सामने आया। इन बम धमाकों में 250 से ज्यादा लोग मारे गए थे और करीब 800 लोग घायल हुए थे।

मुंबई में 80 से 90 के दशक में माफिया राज के बादशाह रहे इस आतंकी को भारत समेत कई विदेशी एजेंसियां आज भी ढूंढ रही हैं। कई बार रेड कॉर्नर नोटिस जारी होने के बाद भी इंटरपोल जैसी एजेंसी के हाथ आज तक खाली है। माना जाता है कि वह पकिस्तान के कराची में छुपा बैठा है, लेकिन आज आपको बताते हैं कि एक पुलिस कांस्टेबल का बेटा कैसे देश का मोस्टवांटेड अपराधी बन गया ?

दाउद इब्राहिम का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में 27 दिसंबर 1955 को हुआ था। दाउद के पिता शेख इब्राहिम अली कासकर मुंबई पुलिस में हवलदार थे। स्कूल में पढ़ने के दौरान ही दाउद ने जुर्म का रास्ता अख्तियार कर लिया था। तभी घरवालों ने सोचा कि शायद शादी के बाद जिम्मेदारी आएगी तो खुद संभल जाएगा, ऐसे में उसकी शादी जरीना नाम की लड़की से कर दी। लेकिन उसने शादी के बाद भी चोरी, डकैती और तस्करी का धंधा नहीं छोड़ा। इसी दौरान वह एक डकैती के मामले में जेल चला गया। पिता को पता चला तो उन्होंने दाउद को घर से निकाल दिया।

दाउद के पास अब कोई ठिकाना नहीं रहा तो वह मुंबई के डॉन करीम लाला की गैंग से जुड़ गया। अपराध के दांव-पेंच सीखने के बाद उसने भाई साबिर इब्राहिम के साथ अपनी गैंग बना ली, जिसे बाद में डी-कंपनी के नाम से जाना गया। इस गैंग से जुड़े अपराधी ड्रग तस्करी, रंगदारी, जबरन वसूली, पैसा लेकर हत्या करने यानी सुपारी किलिंग जैसे कामों को अंजाम देते थे। इस दौरान वह कई बार पुलिस के हत्थे चढ़ा और जेल भी गया।

उधर डी-कंपनी का बढ़ता प्रभाव देख करीम लाला की पठान गैंग ने मान्या सुर्वे के साथ मिलकर दाउद के बड़े भाई की हत्या करवा दी। कहा जाता है कि इसी हत्या ने मुंबई में खूनी गैंगवार को जन्म दिया था। हिंसक गैंगवार के बीच कई सारे गैंगस्टर मारे गए। लेकिन जैसे ही साल 1982 में मान्या सुर्वे को देश के पहले एनकाउंटर में मार गिराया गया तो करीम लाला भी शांत पड़ गया।

करीम लाला की चुप्पी के बाद दाउद इब्राहिम ने पूरी मुंबई में जमकर आतंक मचाया, लेकिन मुंबई पुलिस हर हालत में इस काटें को नासूर बनने से पहले निकालना चाहती थी। लेकिन पुलिस के हत्थे चढ़ने से पहले ही साल 1988 में दाउद दुबई भाग गया और यहीं से पूरा गिरोह चलाने लगा। पुलिस के मुताबिक, दाउद दुबई में रहने के दौरान सट्टा बाजार, हवाला और मनी लांड्रिंग जैसे धंधों में शामिल हो गया था और करोड़ों रूपये बना रहा था।

दाउद इब्राहिम दुबई में बैठकर ही मुंबई में अपने गुर्गों के सहारे वारदातों को अंजाम दे रहा था। दाउद ने दुबई में ही साल 1993 के मुंबई सीरियल बम धमाकों की योजना बनाई थी और इन्हीं बम धमाकों के बाद वह पूरी दुनिया की पुलिस व जांच एजेंसियों के निशाने पर रहा। धमाकों के बाद भारतीय जांच एजेंसी व इंटरपोल की नजरों से बचने के लिए उसने पाकिस्तान में पनाह ली, लेकिन पाकिस्तान हमेशा उसकी मौजूदगी की खबरों को नकारता रहा है।

वहीं, साल 2021 में भी दाउद को कोरोना होने की खबरें मीडिया में सामने आईं थी, जिसमें कहा गया था कि कोरोना के गंभीर संक्रमण के चलते उसकी मौत हो गई। हालांकि, आज तक उसकी मौत की कोई अधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है।

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