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एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अशोक भदौरिया की कहानी, जिनकी बंदूक ने चंबल के 116 डाकुओं का किया शिकार….

बीहड़ के जंगलों में अशोक भदौरिया का आतंक कुछ ऐसा था कि सिर्फ उनके नाम मात्र से डकैतों औऱ दुर्दांत अपराधियों में भगदड़ की स्थिति पैदा हो जाती थी।

Edited By Crime in Madhya Pradesh Edited By Gwalior Edited By Madhya Pradesh Edited By MP Crime नई दिल्ली | July 22, 2021 3:05 PM
अशोक भदौरिया, रिटायर्ड DSP मध्य प्रदेश पुलिस। Photo Source- @BahBateshwar Facebook

मध्य प्रदेश में चंबल के जगलों को डाकुओं की गिरफ्त से दूर जाने वालों में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अशोक भदौरिया का नाम भी शामिल है। मध्य प्रदेश पुलिस में डीएसपी के पद से रिटायर हुए अशोक भदौरिया के नाम से कई किस्से मशहूर हैं, उनके खाते में 116 एनकाउंटर आते हैं, हालांकि उनका अनुमान है कि यह संख्या ज्यादा भी हो सकती है क्योंकि 116 के बाद गिनना छोड़ दिया था। बीहड़ के जंगलों में भदौरिया का आतंक कुछ ऐसा था कि सिर्फ उनके नाम मात्र से डकैतों औऱ दुर्दांत अपराधियों में भगदड़ की स्थिति पैदा हो जाती थी। भदौरिया को ग्वालियर के बीहड़ों से डकैत गैंगों के सफाई का क्रेडिट दिया जाता है।

आरक्षक के पद पर हुई थी पहली तैनाती: 80 और 90 के दशक में डाकुओं का आतंक हुआ करता था। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के चंबल के इलाकों में डाकुओं का बोलबाला हुआ करता था। अंधेरा होने के बाद लोग घरों में दुबक जाया करते थे। ऐसे समय में अशोक भदौरिया की पोस्टिंग मध्य प्रदेश पुलिस में आरक्षक के पद पर हुई थी। चंबल में पहुंचते ही उन्होंने डकैतों का सफाया करना शुरू कर दिया।

कुछ ही दिनों में भदौरियों को डकैतों का काल कहा जाने लगा। उनके मुखबिरों का नेटवर्क भी जंगल में फैलता चला गया। स्थिति ये हो गई कि भदौरिया डकैतों के इलाकों में बेखौफ होकर धूमते थे और उनकी सूचना मात्र से अपराधी अपना ठिकाना बदल दिया करते थे।

एक ही बंदूक से 100 से ज्यादा एनकाउंटर: अशोक भदौरिया, अपने साथ एके-47 लेकर चला करते थे। वह प्यार से उसे डार्लिंग बुलाते थे। उनका कहना था कि परिवार वाले भी नाराज होते हैं कि आप दिन भर अपनी बंदूक के साथ ही रहते हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि वह एके-47 से 100 से ज्यादा डाकुओं को ठिकाने लगा चुके हैं।

कई कई दिन जंगलों में भटकते थे: भदौरिया बताते हैं कि डाकुओं को पकड़ने के लिए उनकी तरह जीवन भी बिताना पड़ता था। कई-कई दिनों तक जंगलों में भटकने के बाद कई बार स्थिति ऐसी हो जाती थी कि गंदे पानी में सूखी रोटी भिगाकर खानी पड़ती थी।

जब लग गई थी गोली: एक एनकाउंटर के दौरान गोली खुद अशोक भदौरिया को भी लगी थी। पैर में गोली लगने के बाद उन्हें लंबे समय तक बिस्तर पर रहना पड़ा था। उन्होंने कहा कि गोली लगने के बाद मैं इस काम से मुक्ति चाहता था, लेकिन कोई अधिकारी इसके लिए तैयार नहीं था। इस बीच डाकुओं का आतंक बढ़ता जा रहा था। ऐसे में उन्होंने दोबारा बंदूक उठाकर चंबल के जंगलों में उतरना पड़ा।

विवादों से भी रहा है नाता: 2002 में भदौरिया पर एक फर्जी मुठभेड़ का भी आरोप लगा। मामला कई दिनों तक विवाद में रहा। उनके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया लेकिन 2004 में वह बरी कर दिए गए। उनके परिवार को शिकायत है कि देश की सेवा करने के बाद उन्हें कोई पुरुस्कार नहीं मिला। 16 बार राष्ट्रपति के पास एनकाउंटर स्पेशलिस्ट का नाम भेजा गया लेकिन कोई पदक नहीं मिला। फिलहाल वह रिटायर हो चुके हैं और अब राजनीति में अपनी जगह तलाश रहे हैं।

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