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मुंबई बाल हत्याकांड 1996: बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरोपियों की सजा पर सुनाया बड़ा फैसला

चर्चित बाल हत्याकांड में आरोपी सीमा और रेणुका को साल 2001 में सत्र न्यायालय ने फांसी की सजा सुनाई थी।

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मुंबई उच्च न्यायालय। (Photo Credit – Indian Express)

मुंबई उच्च न्यायालय ने साल 1996 के बाल हत्याकांड पर एक अहम फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने इस हत्याकांड की आरोपी रेणुका शिंदे और सीमा गावित की फांसी की सजा को रद्द कर दिया है। इन दोनों आरोपियों की इस सजा को अब उम्रकैद में बदल दिया गया है।

बता दें कि, नौ बच्चों की हत्या के मामले में फांसी देने में हो रही देरी को लेकर दोनों बहनों ने कोर्ट से अपील की थी कि उनकी फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया जाए। जिसे मानते हुए मुंबई उच्च न्यायालय ने दोनों को उम्रकैद की सजा सुना दी है।

चर्चित बाल हत्याकांड में आरोपी सीमा और रेणुका को साल 2001 में सत्र न्यायालय ने फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद जब 2004 में मामला हाई कोर्ट और 2006 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था तो वहां भी इस सजा को बरकरार रखा गया था। इसके बाद साल 2008 में राज्यपाल के पास मामले में दया याचिका दायर की गई थी, जिसे 2012-13 के दौरान ख़ारिज कर दिया गया था। इसके बाद 2014 में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी दया याचिका को खारिज कर इस फांसी की सजा को स्वीकृत कर दिया गया था।

सभी जगहों से स्वीकृत फांसी के फैसले के बाद भी इस पर अमल किये जाने पर देरी हो रही थी। ऐसे में दोनों बहनों ने कोर्ट में इस देरी पर सवाल करते हुए अपील की थी, जिसे बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंजूर कर दिया है। अब सीमा और रेणुका दोनों बहनें बाल हत्याकांड के मामले में आजीवन कारावास की सजा काटेंगी।

दरअसल, रेणुका शिंदे और सीमा गावित दोनों सौतेली बहनें थी। इन्होंने साल 1990 से 1996 के बीच करीब 13 बच्चों का अपहरण किया था, जिनमें से 9 बच्चों की नृशंस हत्या कर दी गई थी। यह आरोपी इन बच्चों को चोरी और लूटपाट जैसे कामों के लिए उपयोग करती थी और बाद में हत्या कर देती थी। इस बाल हत्याकांड में उनकी मां अंजनाबाई भी आरोपी थी, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया के बीच में उनका निधन हो गया था।

यह दोनों बहनें 1996 में गिरफ्तार होने के बाद 25 सालों से जेल में बंद हैं। वहीं मामले में राज्य सरकार की तरफ से मांग की गई थी कि इनके अपराधों को ध्यान में रखते हुए फांसी की सजा माफ़ कर दी जाए। लेकिन जब तक इनकी मृत्यु न हो जाए, तब तक यह सजा बरकरार रखी जानी चाहिए।

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