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वीके सिंह की विवाद की बोली

विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह शायद उन लोगों में से हैं जो बिना जरूरत के अपने दूध में नींबू निचोड़ लेते हैं। सोशल वेबसाइट ‘ट्विटर’ पर उनकी हाल की एक टिप्पणी फिर चर्चा में रही,

Author April 17, 2015 7:00 PM
विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह शायद उन लोगों में से हैं जो बिना जरूरत के अपने दूध में नींबू निचोड़ लेते हैं।

विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह शायद उन लोगों में से हैं जो बिना जरूरत के अपने दूध में नींबू निचोड़ लेते हैं। सोशल वेबसाइट ‘ट्विटर’ पर उनकी हाल की एक टिप्पणी फिर चर्चा में रही, जिसमें उन्होंने यमन से भारतीयों को सफलतापूर्वक निकालने को पाकिस्तान दिवस पर पाकिस्तानी दूतावास जाने से कम रोमांचक बताया। इस बात पर मीडिया में जिस तरह की चर्चा सामने आई, उसकी प्रतिक्रिया में उन्होंने पत्रकारों के लिए ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द का इस्तेमाल कर दिया। शायद उनका इशारा ‘प्रॉस्टिट्यूट’ यानी वेश्या की तरफ था। स्वाभाविक ही इस पर विवाद उठ खड़ा हुआ और उनकी बर्खास्तगी की मांग होने लगी।

लेकिन इस सबके बीच जिस वर्ग की महिलाओं की अवमानना हुई है, उनकी ओर किसी ने ध्यान देना जरूरी नहीं समझा। वेश्यावृत्ति मानव सभ्यता की कड़वी सच्चाई है। मनुष्य को विवेकशील सामाजिक प्राणी माने जाने के बरक्स जो चुनौतियां आज भी खड़ी हैं, उनमें हिंसा के अलावा वेश्यावृत्ति का पेशा भी मुख्य है। सभी जानते हैं कि कोई भी स्त्री अपनी इच्छा से इस पेशे को नहीं अपनाती। हमने समाज व्यवस्था ही ऐसी बनाई कि जिसमें इस तरह की खामियां रह गई हैं।

आदिम सभ्यता की बात छोड़ भी दें तो आज जिस सभ्यतम युग में हम जी रहे हैं, उसमें इस पेशे की कुरूपता बढ़ी ही है जो हमारे ‘सभ्य’ होने को आईने में ज्यादा निर्ममता से दिखाने लगी है। किसी भी पेशे की इस तरह हिकारती तुलना दरअसल अपने चेहरे के दाग को छिपाने की विफल कोशिश होती है। यों कह सकते हैं कि हमारा सभ्य समाज अपने को दक्ष ढंग से सहेज ही नहीं पाया, इसलिए स्त्रियों को यह पेशा करने को मजबूर होना पड़ता है। यों भी, किसी अन्य से तुलना या उपमाएं देना अपने आप में एक कमजोर अभिव्यक्ति मानी जानी चाहिए। हम अक्सर ऐसी तुलनाएं कर बैठते हैं या उपमा दे देते हैं, जिसमें किसी बड़े वर्ग या समूह के प्रति हिकारत का भाव दिखलाई देता है।

बहरहाल, वीके सिंह ने अपना आपा पहले-पहल तब सार्वजनिक किया, जब वे थलसेना अध्यक्ष जैसे पद पर थे। जिस जन्म तारीख के आधार पर सभी पदोन्नतियां पाकर इस पद तक वे पहुंचे थे, उसी के समांतर उन्होंने अपनी दूसरी जन्म तिथि पेश कर उसके आधार पर सेवानिवृत्ति इसलिए चाही, ताकि उन्हें पद पर बने रहने का एक वर्ष से ज्यादा का समय और मिल जाए। तब यूपीए सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई और उच्चतम न्यायालय ने भी उनके तर्कों को स्वीकार नहीं किया। कहा जाता है इसी का बदला लेने के लिए वे भाजपा में गए। भाजपा को पिछले चुनाव में ऐसे सनसनीखेज व्यक्तित्वों की जरूरत थी! वीके सिंह उम्मीदवार बने और जीत गए। उम्मीद उन्हें कैबिनेट मंत्री की थी, लेकिन राज्यमंत्री का पद मिला। इसके बाद से ये जब तब इसी तरह अपनी हताशा जाहिर करते रहते हैं।

मेरा आग्रह पत्रकारीय पेशे को दूध का धुला कहलवाने का नहीं है। इस पेशे में उन लोगों की आमद लगातार बढ़ रही है जो या तो अयोग्य हैं या अपनी प्रतिभा का दुरुपयोग कर रहे हैं। समाज के अन्य हिस्सों में जिस तरह कर्तव्यच्युत होने की होड़ लगी है, उससे यह पेशा भी कितने दिन मुक्त रहता! लेकिन मीडिया और न्यायपालिका जैसे लोकतंत्र के महत्त्वपूर्ण अंगों से उम्मीद की जाती है कि वे पेशे की गरिमा बनाए रखें। वरना ये अगर पटरी से उतरते हैं तो सबसे ज्यादा जिम्मेदार इन्हें ही ठहराया जाएगा।

दीपचन्द सांखला

 

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