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अनिश्चित राह

इस मौसम में प्रवेश से लेकर सत्र तक की तमाम तरह की परीक्षाएं तापमान को और बढ़ा देती हैं। इस दिमागी तापमान के बढ़ने की असली वजह है भविष्य को लेकर बेहद असुरक्षाबोध और अनिश्चितताएं। बचपन से ही हमें अर्जुन की तरह लक्ष्यधर्मी होने की शिक्षा दी जाती है। लेकिन एक उम्र और समय आने […]

Author June 18, 2015 8:18 AM

इस मौसम में प्रवेश से लेकर सत्र तक की तमाम तरह की परीक्षाएं तापमान को और बढ़ा देती हैं। इस दिमागी तापमान के बढ़ने की असली वजह है भविष्य को लेकर बेहद असुरक्षाबोध और अनिश्चितताएं। बचपन से ही हमें अर्जुन की तरह लक्ष्यधर्मी होने की शिक्षा दी जाती है।

लेकिन एक उम्र और समय आने पर हमारी लक्ष्यधर्मिता भटकती जान पड़ती है। कला विषयों में स्नातक और स्नातकोत्तर के अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों को बहुत करीब से देखने-समझने का मौका मिल रहा है। जिस विद्यार्थी ने अपना लक्ष्य तय कर रखा है, उसे भी ‘बैकअप प्लान’ लेकर चलना पड़ रहा है। मन में एक अनिश्चितता बैठी है कि अगर ये नहीं हुआ तो! ये लोग तमाम तरह की प्रवेश परीक्षाओं और साक्षात्कार से गुजर रहे हैं, यानी विकल्प तैयार करके रख रहे हैं। लेकिन सवाल है कि आज विद्यार्थियों को इस तरह के विकल्पों की जरूरत क्यों है? क्या उनके भीतर आत्मविश्वास में कोई कमी है? दूसरे सवाल पर अलग-अलग राय हो सकती है।

पहला, कुछ लोग इसे सीधे-सीधे आत्मविश्वास की कमी के तौर पर देखेंगे। दूसरे, लोग इसे अनिश्चितताओं से उपज रही अक्षमता के तौर पर भी देखेंगे। लेकिन अगर बारीकी से देखें तो दूसरा मत पहले मत से ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता दिख रहा है जो हमारी शिक्षा प्रणाली से लेकर व्यवस्था तक से सीधे जुड़ा है।

एरिक हॉफर की मानें तो- ‘युवा स्वयं में एक प्रतिभा है।’ ऐसी प्रतिभा जिसे अगर सही दिशा न मिले तो वह आत्मघाती हो सकता है। यह एक ऐसा दौर है जब हिंदुस्तान युवा हो रहा है। तकरीबन आधी आबादी पचास साल से कम उम्र की है। लेकिन विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि भारत की नियामक राजनीतिक-प्रशासनिक, विश्वविद्यालयी और आर्थिक शक्तियां इसके लिए तैयार नहीं हैं।

युवाओं को कैसे और किस दिशा में ले जाना है, इसकी चिंता देश के नेतृत्व-वर्गों के बीच बिल्कुल नहीं दिखती है। विश्वविद्यालयों में न तो सभी इच्छुक विद्यार्थियों के लिए जगह है, न नए विचारों और शोध संभावनाओं के लिए। युवाओं की प्रतिभा को पल्लवित-पुष्पित होने के लिए खुले अनंत आकाश की तरह अवसर मिलना जरूरी है। यह तभी संभव है जब युवाओं को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था मिले। शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जो विविधता, वैज्ञानिक बोध, तार्किकता, आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और उत्तरदायित्वबोध से लैस करे।

आज भी स्नातक और स्नातकोत्तर की अहमियत बनी हुई है। लेकिन इन पाठ्यक्रमों के बूते युवा रोजगार हासिल नहीं कर पाते। दिल्ली विश्वविद्यालय ने चार साल के स्नातक स्तरीय पाठ्यक्रम के पक्ष में विद्यार्थियों को बाजार के लायक बनाने का ही तर्क दिया था, लेकिन गुणवत्ता से समझौता भी कर लिया। दरअसल, युवावस्था उपयोगिता के सिद्धांत के प्रतिरोध के कारण ही विलक्षण है।

युवाओं के जीवन का उद्देश्य किसी खांचे में समा जाना नहीं होना चाहिए। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि इसी जद्दोजहद में युवा संक्षिप्त रास्ते की खोज में लग जाते हैं। उसके लिए स्वस्थ विकल्प न तो बाजार में हैं और न अपने आसपास के इलाकों में। हालत यह है कि पीएचडी की डिग्री लिए हुए शिक्षक भी वर्षों से विश्वविद्यालयों में अनुबंध पर सेवा दे रहे हैं।

जब एक शिक्षक ही अंधेरे में हाथ-पांव मार अपनी अनिश्चितता से संघर्ष कर रहा हो तो ऐसे में विद्यार्थियों के सामने की अनिश्चितता को खत्म करना दिवास्वप्न ही होगा। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि अगर स्थितियां ऐसी ही बनी रहीं तो एक अराजक कल की आशंका से इनकार नहीं किया सकता। देश के युवा को अंधेरे अनंत आकाश में खोने से बचाना होगा।

रोहिण कुमार

 

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