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गुनाह के चेहरे

अदालत में आखिरी दया याचिका खारिज होने के बाद से ही याकूब मेमन के लिए फांसी का फंदा तैयार करने की खबरें अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियों में रहीं। जो बच्चे मुंबई विस्फोटों के दौरान या उसके बाद पैदा हुए थे, वे अब युवा हो चले हैं। उनमें से कइयों की नजर जब इन सुर्खियों पर गई होगी तो वे इस सवाल से रूबरू हुए होंगे कि याकूब मेमन को किस अपराध के एवज में फांसी की सजा मिली! मुंबई विस्फोटों के बाद शक के घेरे में आकर याकूब मेमन ने कानून के भरोसे खुद को पुलिस के हवाले कर दिया था। उसका यह आत्मसमर्पण उसे जेल तक तो ले गया, मगर फिर वापस नहीं ला सका। जिस वारदात के लिए उसे दोषी साबित करके फांसी पर लटकाने की बात है, उसमें दो सौ सत्तावन लोग मरे थे और सात सौ से ज्यादा घायल हुए थे।

बहरहाल, आतंकी हमलों या दंगों के नाम पर निर्दोष लोगों को मारे जाने की बात उठती है तो कई दूसरे छोर भी दिखाई देने लगते हैं। मुंबई बम विस्फोटों से पहले दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 में मुंबई में भीषण दंगों में मारे गए सैकड़ों लोगों के कई कातिल आजाद मर गए और उनमें से कई आज भी जिंदा हैं। उन्हें शायद उन दंगों पर आज भी गर्व है! 2002 भी सबको याद होगा! कई बार यह भ्रम होने लगता है कि हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां मौत का जश्न मनाया जाता है।

वह मौत किसी राज्य में हुए कत्लेआम में सैकड़ों निर्दोष लोगों की हो या फिर अदालत में दोषी साबित किए गए किसी आरोपी की। एक सवाल यों ही मन में आया है कि मुंबई का गुनहगार कौन-कौन था? मुंबई में विस्फोटों के लिए जमीन तैयार करने वाले उन कुछ नेताओं को किस तरह देखा जाएगा, जिनकी उससे पहले के दंगों में संदिग्ध भूमिका थी और आज वे माननीय हैं? फिर एक दूसरे से जुड़ी घटनाओं में सजा का दायरा इतना छोटा और एक व्यक्ति तक क्यों सिमट कर रह गया? मुंबई दंगों की जांच के लिए श्रीकृष्ण आयोग बना था, जिसने अपनी जांच में महाराष्ट्र के कुछ बड़े नेताओं समेत कई लोगों को मुख्य आरोपी माना था। मुंबई पुलिस के एसपी आरडी त्यागी की टीम पर सुलेमान बेकरी के तीस से ज्यादा मजदूरों को गोलियों से भून देने का आरोप था। आरडी त्यागी की टीम में आरोपी पुलिस वालों को निचली अदालत ने फटकार लगा कर छोड़ दिया।

डॉ असगर अली इंजीनियर अपनी किताब ‘धर्म और सांप्रदायिकता’ में इस बात का उल्लेख करते हैं कि जब उन्होंने दंगों के दौरान दंगाइयों का साथ देने के आरोपी पुलिसकर्मी से कुछ सवाल किए तो उसने कहा कि ‘अगर वह अपनी वर्दी उतार दे तो उसके अंदर एक शिव सैनिक निकलेगा’! कानून की वर्दी पहन कर कानून का मजाक उड़ाने वाले ऐसे पुलिसकर्मी आज भी आजाद हैं। वहीं कुछ नेता पार्टी बदल-बदल कर दूसरी पार्टियों से विधायक और मंत्री तक बन चुके हैं।

ये सब वे लोग हैं, जिन्हें श्रीकृष्ण आयोग ने मुंबई दंगों के लिए दोषी माना। आयोग अपनी रिपोर्ट 1998 में ही सरकार को सौंप चुका है। तब से लेकर हाल तक वहां कथित तौर पर धर्मनिरपेक्ष दलों की ही सरकारें रहीं। मगर उस रिपोर्ट की सिफारिशों को अमली जामा नहीं पहनाया गया। मुंबई हिंसा में सैकड़ों लोगों की जान लेने वाले सत्ता की मलाई खा रहे हैं और कानून को आईना दिखा रहे हैं! मासूमों की जान लेने वाली हिंसा के अपराधियों को टुकड़ों में बांट कर नहीं देखा जाना चाहिए!

वसीम अकरम त्यागी

 

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