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शुचिता की कसौटी

ओडिशा में धरती यानी ‘भूदेवी’ भी तीन दिनों के लिए ‘रजस्वला’ होती है तो राज्य में कृषि से संबंधित सभी कामकाज को पूरी तरह निषिद्ध कर दिया जाता है। यहां की पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक देव ‘विष्णु’ (जगन्नाथ) की पत्नी ‘भूदेवी’ आषाढ़ के महीने में तीन दिनों के लिए जब रजस्वला होती है, […]

Author July 17, 2015 8:25 AM

ओडिशा में धरती यानी ‘भूदेवी’ भी तीन दिनों के लिए ‘रजस्वला’ होती है तो राज्य में कृषि से संबंधित सभी कामकाज को पूरी तरह निषिद्ध कर दिया जाता है। यहां की पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक देव ‘विष्णु’ (जगन्नाथ) की पत्नी ‘भूदेवी’ आषाढ़ के महीने में तीन दिनों के लिए जब रजस्वला होती है, तब उस दौरान ही एक त्योहार ‘रज’, जिसे ओड़िया भाषा में जिसे ‘रजो’ कहा जाता है, बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस तीन दिवसीय ‘रजो’ के दौरान घर की स्त्रियों और लड़कियों को घरेलू कामकाज से पूरी तरह स्वतंत्र कर दिया जाता है।

कुंवारी लड़कियां पैरों में आलता लगा कर, नए कपड़े और आभूषणों से सज-धज कर घरों से बाहर निकलती हैं और पेड़ों की मजबूत डालियों से झूले बांध कर खूब झूला झूलती हैं, लूडो या ताश खेलती हैं। स्त्रियों को लगता है कि चलो, इस त्योहार के बहाने तीन दिनों के लिए ही सही, हर दिन के घर के कामकाज से आजादी तो मिली। दरअसल, इस दौरान घर को संभालने की जिम्मेदारी पुरुषों पर होती है। वह चाहे रसोई हो या साफ-सफाई, सब कुछ पुरुष ही संभालते हैं। विश्वास के अनुसार, इस ‘रजपर्व’ के दौरान धरती पर नंगे पैर चलने से सख्त मनाही होती है, क्योंकि ‘भूदेवी’ इस समय ‘मासिक धर्म’ की पीड़ा झेल रही होती हैं!

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दरअसल, धरती प्रकृति की ओर से स्त्री जाति का प्रतिनिधित्व करती है। शायद यही वजह है कि ‘भूदेवी’ के आषाढ़ माह में रजस्वला होने की मान्यता बनी है। और ऐसा है, तो फिर स्त्री के रजस्वला होने से जुड़ी पवित्रता-अपवित्रता की मान्यता इस पर्व से भी स्पष्ट होती है। यहां धरती और स्त्री एकाकार हो जाती है। अपनी भाषा में भी हम उत्पत्ति में सक्षम नहीं होने वाली स्त्री और धरती को ‘वंध्या’ और सक्षम को ‘उर्वर’ कहते हैं। हम उत्पत्ति (संतान और फसल) में अक्षम धरती और स्त्री दोनों को ही उपेक्षित कर देते हैं। कोशिश की जाती है कि किसी उपाय से धरती और स्त्री ‘फलवती’ हों, यानी स्त्री संतान पैदा करे और धरती फसल। अगर शादी के बाद पति संतानोत्पत्ति में अक्षम या नपुंसक हो, तब भी लड़की पर ही दवाब होता है संतानोत्पत्ति का या यह सिद्ध करने का कि वह ‘वंध्या’ नहीं है।

मेरी एक परिचित लड़की को विवाह के बाद जब यह पता चला कि उसका पति ‘यौन अक्षम’ है तो उसने विरोध करना चाहा। उस लड़की के साथ उसी के घर में रह रहे देवर ने उससे शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव बनाया। इसमें उसके पति सहित घर वालों की सहमति थी। साफ है कि स्त्री हो या धरा, उसका अस्तित्व केवल उसके बच्चे जनने से ही माना जाता है।

हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भी महिला रजस्वला होती है, उसके पांचवे दिन बालों को धोकर नहाने के बाद ही पूरी तरह से सभी घरेलू कामों और पूजापाठ के लिए उसे शुद्ध, पवित्र और योग्य माना जाता है और रसोईघर के सभी कामों के लिए उसे इजाजत मिल पाती है। ठीक उसी तरह इस ‘रजपर्व’ को आषाढ़ माह में मनाए जाने के पीछे भी यह नजर आता है कि आषाढ़ के महीने में बारिश होती है और इसी के बाद रजस्वला स्त्रियों की तरह अच्छे से धरा या ‘भूदेवी’ की भी शुद्धिकरण की प्रक्रिया पूरी होती है। साथ ही इसी महीने से हलों को भी धरती में उतार कर कृषि कार्य की शुरुआत हो जाती है। इससे यह भी साबित है कि यह ‘रज पर्व’ स्त्रियों की शुचिता की अवधारणा को एक कील की तरह हमारी स्थावर मान्यताओं की दीवार में ठोंक कर और मजबूती से स्थापित करने में सहायक सिद्ध होता है!

मंजू शर्मा

 

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