रिसता हुआ बांध - Jansatta
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रिसता हुआ बांध

कुछ समय पहले मेरी मुलाकात एक ऐसे समूह से हुई, जिसे विकास की प्रक्रिया ने बहुत पीछे छोड़ दिया है। महाराष्ट्र के जंगलों में बसा यह समूह आज मीलों का सफर तय करके कुछ नगरीय व्यवस्थाओं के आसपास छोटी-मोटी मजदूरी कर अपना जीवन बसर कर रहा है। हम एक अनोखे समाज से रूबरू थे।

Author June 19, 2015 5:54 PM

कुछ समय पहले मेरी मुलाकात एक ऐसे समूह से हुई, जिसे विकास की प्रक्रिया ने बहुत पीछे छोड़ दिया है। महाराष्ट्र के जंगलों में बसा यह समूह आज मीलों का सफर तय करके कुछ नगरीय व्यवस्थाओं के आसपास छोटी-मोटी मजदूरी कर अपना जीवन बसर कर रहा है। हम एक अनोखे समाज से रूबरू थे। हमारे सामने तकरीबन दो से ढाई सौ फुट ऊंची र्इंट की दीवार थी। दीवार में कहीं-कहीं छेद था, जिसमें से पानी अपनी जगह तलाशता नजर आ रहा था।

मैं इस बांध के वैभव को देख कर चमत्कृत थी, वहीं अचानक मेरी नजर इसकी तलहटी पर गई और मन में भीतर तक कुछ चुभ गया। दो बच्चे एकदम नंग-धड़ंग टूटे हुए नल से पानी निकालने की कोशिश में लगे थे। मासूम बचपन, उदास आंखें और कुपोषण की गिरफ्त में शरीर…! वे दो बच्चे जैसे अपने समाज के अभावग्रस्त होने और हमारे तकनीकी और अनियोजित विकास के परिणामों का जीवंत उदाहरण थे।

हमारी मुलाकात वहीं के ‘खेल घर’ के शिक्षकों, उनमें पढ़ने वाले बच्चों से हुई। ‘खेल घर’ दरअसल समुदाय, नारी समता मंच और हमारे दल द्वारा बनाया हुआ शिक्षा केंद्र है। यहां बच्चे शिक्षा के साथ-साथ जीवन-कौशल, अपने अधिकार, निजी पहचान और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी हासिल करते हैं। हमारे दल ने बताया कि इस समुदाय की जो चीज सबसे ज्यादा प्रभावित करती है वह है उनकी स्वाभाविक बुद्धि और खेलकूद में उनकी सहज रुचि। जंगल, जनजीवन, प्राकृतिक संपदा और पुराने तरीकों से कैसे कछुआ, मछली, केकड़ा आदि को पकड़ा जाए, इसकी समझ इनमें खूब है।

वे अगर कहीं पीछे छूटते हैं तो वह है विकास की प्रक्रिया और उसकी चकाचौंध, जिसने आज जंगल पर राज करने वाले लोगों को दैनिक मजदूर बनने पर विवश कर दिया है। मेरे पीछे चौदह-पंद्रह वर्ष की राधा खड़ी थी। वह अपने समाज के लिए एक मिसाल है, जिसने ‘खेल घर’ से पढ़ कर स्थानीय सरकारी विद्यालय से दसवीं की परीक्षा पास की। आगे की शिक्षा मुक्त विद्यालय से जारी रखते हुए वह ‘खेल घर’ में बच्चों को पढ़ाती है।

उसकी बस्ती पांच से छह फुट ऊंची झोपड़ियों की एक लंबी-सी कतार थी, जो ऊबड़-खाबड़ जमीन पर फैली हुई थी। उसकी दहलीज लांघते हुए मेरा माथा झुक गया, रिवायतन नहीं, ड्योढ़ी और छत बहुत नीची थी। सब कुछ अंधेरे में लिपटा था, लेकिन बर्तन, गोबर से लिपी जमीन और कमरे के कोने में अलगनी पर टंगे कपड़े, सब कुछ उजला और झकझक साफ-सुथरा था। मुझे कहीं भी कुछ खाने-पीने की चीज नजर नहीं आई। हैरानी से पूरे कमरे को मेरी आंखों ने खंगाल लिया था।

राधा ने शायद मेरी नजर पर गौर कर लिया था। उसके चेहरे पर एक संकोच-सा उभर आया। उसकी पलकों के पीछे एक अंतहीन सन्नाटा भी मैंने पढ़ लिया था। कोठरी के बीचोंबीच एक नन्हा मूसल था। कुछ मुट्ठी भर अनाज कूटने की संभावना उसमें थी। राधा के सिर पर हाथ फेरते हुए मैंने पूछा कि कितना छोटा मूसल? सवालों से बचती उसकी आंखें और देह सकुचाने लगी थी। धीरे से उसने कहा- ‘मैम, अनाज इतना ही होता है।

कभी-कभी नहीं भी होता है। उसको क्या कूटना और क्या बीनना!’ यह कह कर राधा और उदास हो गई थी। मेरा मन भी भारी हो गया था। आज भी कई बार रात में मैं जाग जाती हूं कि राधा और उसके परिवार के रूप में बची सिर्फ उसकी दादी ने क्या खाया होगा! कभी भी वह रिसता हुआ बांध अगर टूट गया तो क्या वह सब कुछ बहा ले जाएगा…!

नुज़हत अली

 

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