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मां का प्यार

अक्सर शनिवार को मैं अपने गांव चला जाता हूं। इस बार भी गया था। बीच में हाशिमपुरा पड़ता है। वहां लोगों से मिलने के लिए रुक गया। शाम को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय चला गया। उर्दू विभाग के अध्यक्ष असलम जमशेदपुरी ने वहां एक ड्रामा रखा था। उसे देखने के बाद गांव तकरीबन बारह बजे रात को पहुंचा। औपचारिक बातचीत के बाद एक पुरानी किताब पढ़ते हुए सो गया। सुबह देर से आंख खुली। छत पर गया।
Author May 4, 2015 17:38 pm

अक्सर शनिवार को मैं अपने गांव चला जाता हूं। इस बार भी गया था। बीच में हाशिमपुरा पड़ता है। वहां लोगों से मिलने के लिए रुक गया। शाम को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय चला गया। उर्दू विभाग के अध्यक्ष असलम जमशेदपुरी ने वहां एक ड्रामा रखा था। उसे देखने के बाद गांव तकरीबन बारह बजे रात को पहुंचा। औपचारिक बातचीत के बाद एक पुरानी किताब पढ़ते हुए सो गया। सुबह देर से आंख खुली। छत पर गया।

अम्मी किचेन में कुछ बना रही थीं। मेरी तरफ चाय का कप बढ़ाते हुए बोलीं कि सुबह से तीन बार चाय बना चुकी हूं कि तू उठते ही चाय मांगेगा। मैंने चाय का वही अपना वाला बड़ा कप ले लिया। मुझे वे कुछ परेशान लगीं। पूछने पर कहने लगीं- ‘आते हो और थोड़ी देर हमारे पास बैठ कर अपने कमरे में घुस जाते हो। फिर सुबह होते ही चलने की तैयारी। इससे बेहतर हो कि तुम आया ही न करो। अरे कुछ हमारी भी सुना करो, कुछ अपनी कहा करो!’

कुछ खामोश अंतराल के बाद अम्मी बोलीं- ‘मगर तुम हो कि हर वक्त कभी लैपटॉप, कभी मोबाइल तो कभी किताबों में खो जाते हो। तुम्हारे पास दुनिया के लिए वक्त है, हमारे लिए कहां है?’ अम्मी का लहजा जरा सख्त था। बात को टालते हुए मैंने कहा कि आप ज्यादा फिक्र मत किया कीजिए। अगर आपको लगता है कि मेरे आने से आप परेशान होती हैं, तो मैं महीने में एक बार ही आया करूंगा। मुझे लगा कि सुबह उठते ही दिमाग खराब हो गया। मगर यह मां की ममता थी जो एक बेटे के सामने शिकायती अंदाज में झलक रही थी। उस समय मैं नहीं समझ पाया।

फिर मुझे लगा कि मैंने गलती कर दी है और उस वजह से अम्मी से आंख नहीं मिला पा रहा था। मेरे निकलते वक्त अम्मी ऊपर वाले कमरे में ही थीं। एक छोटे बच्चे से मैंने कहा कि जाकर कह दो कि मैं जा रहा हूं। अम्मी हर बार मुझे दरवाजे तक छोड़ने आती हैं। जिस गाड़ी में बैठता हूं, उसे तब तक देखती रहती हैं जब तक वह उनकी आंखों से ओझल न हो जाए। मगर उस दिन वे नहीं आर्इं। मैं भी उनके पास ऊपर नहीं गया और दस मिनट इंतजार करने के बाद गाड़ी में बैठा और दिल्ली आ गया।
मगर एक बात थी जो लगातार खाए जा रही थी कि मुझसे नाराज होने वाली कोई और नहीं, मेरी मां है। यानी मेरी जन्नत मुझसे नाराज है।

पिछले चार दिन से यह सवाल अपने आपसे कर रहा था कि मैं कितना बड़ा गुनहगार हूं। अपनी मां को नहीं मना सका तो दूसरों को कैसे मनाऊंगा! मां की मुहब्बत तो निस्वार्थ है, यह सभी जानते हैं। वह दिखावे की मुहब्बत से बिल्कुल जुदा है। ये बातें मुझे खाए जा रही थीं। सुबह आंखें खुलते ही मैंने घर फोन किया, अम्मी से बात की, उन्होंने फिर वही शिकायत की- ‘तू तो चला गया था न! अब क्यों फोन कर रहा है?’

मगर वह मां है। हर गलती को माफ करने वाली… दुखों के पहाड़ उठा कर हमें पालने वाली… खुद को बूढ़ा करके हमें जवान करने वाली…! उसकी मुहब्बत से कैसे इनकार किया जा सकता है। हम लोग सिर्फ यह सोच कर उसे नजरअंदाज कर देते हैं कि मां ही तो है, मान जाएगी और वह मान भी जाती है।

मैंने भी मना लिया, अब कोई तनाव नहीं है, काम में मन लग रहा है। वे लोग कितने बदनसीब होते होंगे जो मां को नाराज कर देते हैं। घर से निकाल देते हैं, वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं या फिर जिनकी मां गुजर जाती है। बकौल मुनव्वर राणा- ‘लगता है जैसे जिस्म है और जां नहीं रही / वह शख्स जो जिंदा है लेकिन मां नहीं रही।’
वसीम अकरम त्यागी

 

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