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कुल्फी वाले प्यारेलाल

सचमुच वे प्यारेलाल ही हैं। लंबा-चौड़ा कद, हमेशा हंसता-मुस्कराता चेहरा। तीखी और कड़क आवाज- ‘मलाई… कुल्फी’। मिनट भर में ढेरों बच्चे उनके आसपास- ‘अंकल दो वाली मुझे… पांच वाली मुझे… दस वाली मुझे…!’ बच्चों के बीच हलकी धींगा-मुश्ती। फिर सब मस्त। प्यारेलाल भी खुश। बच्चों को मलाई-कुल्फी खिला कर अक्सर उनका चेहरा देख कर लगता […]

Author July 20, 2015 7:53 AM

सचमुच वे प्यारेलाल ही हैं। लंबा-चौड़ा कद, हमेशा हंसता-मुस्कराता चेहरा। तीखी और कड़क आवाज- ‘मलाई… कुल्फी’। मिनट भर में ढेरों बच्चे उनके आसपास- ‘अंकल दो वाली मुझे… पांच वाली मुझे… दस वाली मुझे…!’ बच्चों के बीच हलकी धींगा-मुश्ती। फिर सब मस्त। प्यारेलाल भी खुश।

बच्चों को मलाई-कुल्फी खिला कर अक्सर उनका चेहरा देख कर लगता कि वे अंदर से कितने खुश और संतुष्ट हैं। उन्हें और उनके इर्द-गिर्द मौजूद बच्चों को देख कर अक्सर मुझे अपना बचपन याद आ जाता है। कल ही की तो बात थी, जब हम खुद बच्चे थे। प्यारेलाल हमारे स्कूल के पास ही खड़े होते थे, छुट्टी के बाद गली में आ जाते थे।

हम उनकी मलाई-कुल्फी के इतने दीवाने कि स्कूल में तो खाते ही थे, जब गली में आते तब भी जरूर खाते। प्यारेलाल को फिर से एक मौका मिल जाता था, हम बच्चों को देख कर खुश होने का। उनकी आंखों में चमक बढ़ जाती थी। आवाज में और सुरीला-सा कड़कपन आ जाता था। ‘मलाई… कुल्फी’! कुल्फी की आवाज बहुत धीमे से आती थी। प्यारेलाल अब भी आते हैं। थोड़े उम्रदराज हो गए हैं। मगर आवाज में कड़कपन अब भी कायम है। हमारी गली भी बदल गई है। वे अक्सर दोपहर में आते हैं। उस वक्त मैं दफ्तर में होता हूं। उनकी मलाई-कुल्फी को याद करता हूं, पर सुकून इस बात का रहता है कि मेरी बेटियां उसी चाव से उनकी मलाई-कुल्फी खाती हैं।

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पिछले इतवार प्यारेलाल जब गली में आए तो इत्तिफाक से मैं घर में मौजूद था। उनकी वही कड़क ‘मलाई-कुल्फी’ की आवाज सुनते ही तुरंत दौड़ गया लेने। प्यारेलाल का वही हंसता-मुस्कराता चेहरा देख कर तबीयत एकदम उनकी मलाई-कुल्फी की माफिक हो गई। उन्हें देखते ही पूछा- ‘कैसे हो प्यारेलाल?’ ‘ठीक हूं बाबूजी…!’ प्यारेलाल अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ बोले। मैंने कहा- ‘अमां प्यारेलाल, मैं ‘बाबूजी’ कब से हो गया? मैं तुम्हारे लिए आज भी वही हूं, जो आज से तीस साल पहले था। तुम्हारे साथ-साथ तुम्हारी मलाई-कुल्फी के स्वाद ने ऐसा दीवाना बना रखा है कि आज भी दूर नहीं हुआ हूं।’ प्यारेलाल ज्यादा कुछ बोले नहीं। बस मुस्करा भर दिए। मैं भी बिटिया के साथ मलाई-कुल्फी लेकर घर में आ गया।

सही है कि मेरा प्यारेलाल से कोई रिश्ता-नाता नहीं। मगर हमारे बीच स्वाद और स्नेह का एक ऐसा रिश्ता है, जो हर रिश्ते से कहीं अधिक बड़ा है। एकदम प्यारेलाल की मलाई-कुल्फी और उनकी निश्छल हंसी-मुस्कराहट जैसा। हफ्ते में एक दफा दोपहर में उनकी मलाई-कुल्फी वाली आवाज ही सुनने को मिल जाए तो महसूस होता है कि मैं फिर से तीस साल पहले के अपने बचपन में पहुंच गया हूं। वही स्कूल… वही हम सब दोस्त… वही दोपहर… वही ठेला और चाट वाले पंडितजी हमेशा मुस्कराते हुए। इस बीच पंडितजी तो चल बसे, पर उनके चाट का स्वाद जीभ पर आज भी बना हुआ है।

शायद इसीलिए बचपन की यादें बहुत अच्छी होती हैं। समय-असमय हमसे टकरा कर हमें फिर मौका देती हैं, उन दिनों, यादों में लौटने का। कल तक स्वाद और स्नेह का रिश्ता प्यारेलाल का मेरे साथ था, आज वही मेरी बेटियों के साथ है। मेरी तरह दोपहर में उन्हें भी इंतजार रहता है प्यारेलाल के आने और मलाई-कुल्फी खाने का। चाहे जैसा ही सही, रिश्ते का कायम रहना जरूरी है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि बाजार में मिलने वाली तमाम प्रकार की आइसक्रीम के मुकाबले हमारे प्यारेलाल की मलाई-कुल्फी आज भी लाजवाब है। प्यारेलाल की अब उम्र हो चली है, पर उनकी और मलाई-कुल्फी में अपनापन अब भी कायम है। इसीलिए वे हमारे ‘पियारे प्यारेलाल’ हैं।

अंशुमाली रस्तोगी

 

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